गद्य गुँजन आलेख,दिवस विशेष,शैक्षणिक,संदेशपरक रबीन्द्रनाथ टैगोर : आशीष अम्बर

रबीन्द्रनाथ टैगोर : आशीष अम्बर



व्यक्ति विशेष आलेख

भारत की सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक थे टैगोर ।

रबीन्द्रनाथ टैगोर जो भारत के महापुरुषों में से एक थें । अपने 80 वर्षीय जीवन – काल में करीब 1000 कविताएँ , 8 उपन्यास , 8 कहानी संग्रह , 2200 से अधिक गीत तथा विभिन्न विषयों पर अनेक लेख लिखने वाले गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर एक कवि , उच्च कोटि के साहित्यकार , उपन्यासकार और नाटककार के अलावा संगीत प्रेमी , अच्छे चित्रकार तथा दार्शनिक भी थें । वह विश्व की एकमात्र ऐसी महान शख्सियत थें , जिनके लिखे गीतों की छाप 3 देशों के राष्ट्रगान में स्पष्ट परिलक्षित है । भारत का राष्ट्रगान ‘ जन गण मन अधिनायक’ उन्हीं के द्वारा मूलरूप से बांग्ला भाषा में लिखा गया था, जबकि बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी उन्हीं के गीत से लिया गया है, जिसमें बांग्लादेश का गुणगान है । इसके अलावा श्रीलंका के राष्ट्रगान का एक हिस्सा भी उनके एक गीत से ही प्रेरित माना गया है ।

7 मई , 1861 को कोलकाता में साहित्यिक माहौल वाले कुलीन धनाढ्य परिवार में जन्में रबीन्द्रनाथ टैगोर एशिया के प्रथक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था । उन्हें वर्ष 1913 में विश्वविख्यात महाकाव्य ‘ गीतांजलि’ की रचना के लिए साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार दिया गया था । हालाँकि उन्होंने यह पुरस्कार स्वयं समारोह में उपस्थित होकर ग्रहण नही किया था , बल्कि ब्रिटेन के एक राजदूत ने यह पुरस्कार लेकर उन तक पहुँचाया था । नोबल पुरस्कार में मिले करीब ₹ 1 लाख 8,000 की राशि टैगोर ने किसानों की बेहतरी के लिए कृषि बैंक तथा सहकारी समिति की स्थापना और भूमिहीन किसानों के बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल बनाने में इस्तेमाल की थी । ‘ गीतांजल ‘ का प्रकाशन वर्ष 1910 में हुआ था ।

भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में बंग – भंग विरोधी आंदोलन का बड़ा महत्व रहा है, जिसमें समूचे भारत के देशभक्त नागरिकों ने एकजुट होकर ब्रिटिश सरकार को झुकने पर विवश कर दिया था । उसी दौरान टैगोर ने 1905 में बांग्ला में एक गीत लिखा था ।

आमार शोनार बांग्ला,
आमि तोमाए भालोबाशी ।
चिरोदिन तोमार आकाश ,
तोमार बाताश,
आमार प्राने बजाए बाशी ॥

इसका अर्थ है कि मेरा सोने जैसे बंगाल , मैं तुमसे प्यार करता हूँ । सदैव तुम्हारा आकाश , तुम्हारी वायु , मेरे प्राणों में बाँसुरी सी बजती है । हालाँकि जिस समय उन्होंने इस गीत की रचना की थी , उस समय उन्होंने स्वयं कल्पना तक नहीं की होगी कि करीब 66 वर्षों बाद बांग्लादेश अस्तित्व में आएगा और उनका यही गीत उसका राष्ट्रगान बन जायेगा । उनकी कुछ कविताएँ तो बांग्लादेश के स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा भी है । जहाँ तक भारत के राष्ट्रीय गीत ‘ जन गण मन’ की बात है तो इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के दूसरे दिन का काम शुरू होने से पहले 27 दिसम्बर 1911 को पहली बार गाया गया था ।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तथा रबीन्द्रनाथ टैगोर राष्ट्रीयता , देशभक्ति , तर्कशक्ति इत्यादि विभिन्न मुद्दों पर अलग – अलग राय रखते थे, लेकिन दोनों एक – दूसरे का बहुत सम्मान भी किया करते थे । साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार मिलने के बाद टैगोर को गाँधी जी ने ही सर्वप्रथम ‘ गुरुदेव’ कहा था , जबकि गाँधी जी को महात्मा की उपाधि टैगोर ने दी थी । टैगोर ने खुले प्राकृतिक वातावरण में वृक्षों, बगीचों और एक लाइब्रेरी के साथ केवल 5 छात्रों के साथ छोटे से ‘ शांति निकेतन स्कूल ‘ की स्थापना की , जो 1921 में ‘ विश्वभारती’ नाम से एक समृद्ध विश्वविद्यालय बना । शांतिनिकेतन में ही गुरुदेव ने अपनी कई साहित्यिक कृतियाँ लिखीं और वहाँ मौजूद उनका घर आज भी ऐतिहासिक महत्व का है ।

कविता , गान , उपन्यास , कथा , नाटक , प्रबंध , शिल्पकला इत्यादि साहित्य की शायद ही ऐसी कोई विधा है, जिसमें उनकी रचना न हो । उनकी प्रमुख रचनाओं में गीतांजलि , गीताली, गीतिमाल्य , कथा ओ कहानी , शिशु , शिशु भोलानाथ , कणिका , क्षणिका , खेया है मांति, क्षुदिता , मुसलमानिर गोल्पो आदि प्रमुख हैं । उपन्यास की अगर बात की जाए तो गोरा, चतुरंगा, नौकाइूबी, जोग जोग , घारे बयार , मुन्ने की वापसी , अंतिम प्यार, काबुलीवाला, मास्टर साहब, पोस्टमास्टर इत्यादि प्रमुख है ।

वास्तव में गुरुदेव टैगोर बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे । 7 अगस्त , 1941 को कोलकाता में उन्होंने अंतिम सांस ली ।

आशीष अम्बर
( विशिष्ट शिक्षक)
उत्क्रमित मध्य विद्यालय धनुषी
प्रखंड – केवटी
जिला – दरभंगा
बिहार

संदर्भ :- पुराने अखबार एवं महापुरुषों की जीवनी ।

0 Likes
Spread the love

Leave a Reply