गद्य गुँजन विचार महिला स्वातंत्र्य…रिंजु कुमारी

महिला स्वातंत्र्य…रिंजु कुमारी



क्या महिलाएँ सच में स्वतंत्र होकर अकेले जी सकती हैं?

कहने को तो बहुत आसान है कि हम महिलाएँ किसी पर निर्भर नहीं हैं, अकेले जी सकते हैं, अपनी जिंदगी अपने दम पर संभाल सकते हैं। हमारे भीतर हिम्मत भी है, आत्मविश्वास भी और कुछ कर गुजरने का जज्बा भी। लेकिन जिंदगी केवल हिम्मत और आत्मनिर्भरता के सहारे नहीं चलती।
एक महिला जब स्वतंत्र होकर जीने का फैसला करती है, तो उसके सामने सिर्फ अपनी जरूरतें पूरी करने की चुनौती नहीं होती, बल्कि समाज की सोच, लोगों के सवाल, रिश्तों की अपेक्षाएँ और हर कदम पर खुद को साबित करने की मजबूरी भी होती है।

कभी मन थक जाता है, कभी परिस्थितियाँ कमजोर कर देती हैं और कभी ऐसा लगता है कि काश कोई ऐसा होता, जिसके सामने बिना कुछ कहे मन की सारी बातें रख पाते। क्योंकि आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना और भावनात्मक रूप से अकेले सब कुछ संभालना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
स्वतंत्र महिला होना आसान नहीं, यह हर दिन खुद से एक नई लड़ाई लड़ने जैसा है।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि महिला अकेले नहीं जी सकती। वह जीती है, आगे बढ़ती है, गिरकर संभलती है और अपनी पहचान बनाती है। बस उसे भी कभी-कभी सहारे की नहीं, समझने वाले साथ की जरूरत होती है।

रिंजु कुमारी
फॉर्बेसगंज अररिया
बिहार

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