- प्रकृति का अनुपम सेवक: एक प्राकृतिक वरदान
सदियों से गिद्ध (Vultures) हमारी धरती के सबसे महत्वपूर्ण और सजग प्रहरी रहे हैं। आकाश की अनंत ऊंचाइयों से धरती पर नज़र रखने वाले ये जीव कभी किसी जीवित प्राणी का शिकार (जीव-घात) नहीं करते। ये केवल मृत पशुओं के शवों को अपना भोजन बनाते हैं। यदि प्रकृति ने इन्हें यह ‘वज्रतुंड’ (मजबूत चोंच) और अचूक दृष्टि दी है, तो इसके पीछे एक गहरा विज्ञान है। - महामारी के दानव से रक्षा
जब कोई पशु मर जाता है, तो उसका शव सड़ने लगता है जिससे एंथ्रेक्स, रेबीज और हैजा जैसी जानलेवा महामारियाँ फैलने का खतरा बढ़ जाता है। गिद्ध इन सड़ते शवों को पल भर में साफ़ कर देते हैं। उनके पेट में मौजूद शक्तिशाली एसिड हानिकारक बैक्टीरिया को भी नष्ट कर देता है। इस प्रकार, वे इस वसुधा को महामारियों से बचाकर पर्यावरण के प्रति अपनी अचल वफ़ा निभाते हैं। - मानव की एक भूल: ‘डाइक्लोफेनाक’ का ज़हर
जब तक आकाश में गिद्धों का पहरा था, हमारी ज़मीन और पर्यावरण सुरक्षित था। लेकिन मानव की एक अनजानी भूल ने इस रक्षक को मौत के मुहाने पर ला खड़ा किया। पशुओं के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दर्द निवारक दवा ‘डाइक्लोफेनाक’ (Diclofenac) गिद्धों के लिए काल बन गई।
जब गिद्धों ने ऐसी गायों या भैंसों के मांस को खाया जिन्हें मरने से पहले यह दवा दी गई थी, तो उनके गुर्दे (किडनी) नाकाम हो गए। इस दूषित मांस के कारण नभ के ये राजा पल भर में असहाय होकर दम तोड़ने लगे और देखते ही देखते इनकी आबादी 99% तक घट गई। - दोहरी मार: कीटनाशक और कटते पेड़
गिद्धों की बर्बादी केवल एक दवा तक सीमित नहीं रही। खेतों में बढ़ते कीटनाशकों के ज़हर और जंगलों में ऊंचे पेड़ों के अंधाधुंध कटान ने उनसे उनका आशियाना भी छीन लिया। आज प्रकृति अपने इस सच्चे मित्र को खोकर रो रही है और आकाश की राहें सूनी हो चुकी हैं।
हमारा संकल्प (निष्कर्ष)
गिद्धों का गायब होना केवल एक पक्षी का लुप्त होना नहीं है, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का असंतुलित होना है। आज समय की मांग है कि हम सब मिलकर संकल्प लें:
- डाइक्लोफेनाक जैसी खतरनाक दवाओं पर पूरी तरह रोक का समर्थन करें।
- गिद्ध संरक्षण केंद्रों को बढ़ावा दें।
- ऊंचे पेड़ों और उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा
- धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया
- धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
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