गद्य गुँजन Uncategorized “रेलवे गेट पर बँधी राखी का दूसरा धागा”

“रेलवे गेट पर बँधी राखी का दूसरा धागा”



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श्रावण की पूर्णिमा थी। सुबह से ही सुनीता के घर में रक्षाबंधन की तैयारियाँ चल रही थीं। आँगन में चाँदनी-सी उजली सफाई थी। पूजा की थाली में रोली, अक्षत, चंदन, दीपक, मिठाई और एक सुंदर-सी राखी सजी थी।

 

सुनीता बार-बार दरवाजे की ओर देख लेती।

 

उसका भाई मोहन अभी तक नहीं आया था।

 

मोहन और सुनीता का रिश्ता केवल भाई-बहन का रिश्ता नहीं था; उसमें बचपन की अनगिनत स्मृतियाँ, स्नेह और एक-दूसरे के प्रति गहरा सम्मान जुड़ा था। मोहन अपनी बहन को बहुत मानता था। बचपन में वह उसके लिए सुंदर-सुंदर कपड़े लाता, स्कूल की किताबें और कॉपियाँ खरीदता और उसकी पसंद की खाने-पीने की चीजें लाना कभी नहीं भूलता।

 

जब सुनीता परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होती, तो मोहन की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। वह बाजार से फल, मिठाइयाँ और उसकी पसंद की चीजें लेकर घर पहुँच जाता।

 

सुनीता भी अपने भाई को बहुत मानती थी। वह उसके कपड़े बड़े मनोयोग से कपडे , साफ करती और इस्त्री करके रखती, ताकि कहीं उसके भाई के सम्मान में कोई कमी न रह जाए।

 

माँ दोनों के इस स्नेह को देखकर फूली न समाती।

 

कभी-कभी वह हँसकर कहती,

“बेटी, शादी के बाद भी अपने भाई को ऐसे ही मान देना। मायके का रिश्ता जीवन भर साथ रहता है।”

 

माँ की बात सुनते ही सुनीता नखरे से मुँह बना लेती।

 

“माँ! अभी से शादी की बात क्यों करती हो?”

 

और फिर माँ-बेटी दोनों हँस पड़तीं।

 

सुनीता अपने माता-पिता की भी खूब सेवा करती थी। आज राखी की थाली हाथ में लिए वह उसी आँगन में बैठी अपने मायके के बीते दिनों को याद कर रही थी। बचपन के वे सारे दृश्य उसकी आँखों के सामने एक-एक करके उतरने लगे।

 

अचानक बाहर मोटरसाइकिल की आवाज सुनाई दी।

 

सुनीता चौंककर उठ खड़ी हुई।

 

“भैया आ गए!”

 

वह दौड़कर दरवाजे तक पहुँची, लेकिन मोटरसाइकिल किसी दूसरे व्यक्ति की थी।

 

उसका चेहरा फिर बुझ गया।

 

वह लौटकर अपनी थाली के पास बैठ गई। मन में चिंता घर करने लगी।

 

“इतनी देर क्यों हो रही है? भैया कहाँ रह गए?”

 

उसने मोबाइल उठाकर फोन मिलाया।

 

“नॉट रीचेबल।”

 

सुनीता की बेचैनी और बढ़ गई।

 

उधर मोहन भी कम परेशान नहीं था।

 

रक्षाबंधन के कारण शहर की सड़कों पर भारी भीड़ थी। वह मोटरसाइकिल से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। कई जगह ट्रैफिक जाम था। किसी तरह जाम से निकला तो रेलवे क्रॉसिंग का फाटक बंद मिला।

 

मोहन ने मोबाइल से सुनीता को फोन करना चाहा, लेकिन नेटवर्क की समस्या के कारण कॉल नहीं लग सकी।

 

वह घड़ी की ओर देखकर बुदबुदाया,

“सुनीता मेरा इंतजार कर रही होगी।”

 

उसी समय उसकी नजर सड़क किनारे खड़ी एक लड़की पर पड़ी।

 

लड़की की उम्र मुश्किल से चौदह-पंद्रह वर्ष रही होगी। उसके कपड़े पुराने थे। चेहरा उदास था और आँखों में एक अजीब-सी विवशता थी।

 

वह धीरे-धीरे मोहन के पास आई।

 

“भैया… आज रक्षाबंधन है न?”

 

मोहन ने उसकी ओर देखा और सहज भाव से कहा,

“हाँ।”

 

लड़की कुछ क्षण चुप रही। फिर धीमी आवाज में बोली,

 

“तो… मुझसे राखी बँधवा लो न!”

 

मोहन थोड़ा चौंका।

 

लड़की ने अपनी आँखें झुका लीं।

 

“मेरा कोई बड़ा भाई नहीं है। बस माँ है… और एक छोटा-सा भाई। बहुत गरीब हैं हम।”

 

मोहन के मन में एक क्षण के लिए कई विचार उठे। वह पहले ही देर से परेशान था। सुनीता उसकी राह देख रही होगी। फिर भी उस लड़की की आँखों में उसे अपनी बहन की ही तरह एक उम्मीद दिखाई दी।

 

उसने धीरे से कहा,

 

“ठीक है।”

 

लड़की के चेहरे पर पहली बार मुस्कान आई।

 

उसने अपनी मुट्ठी से एक पतली-सी सूती डोरी निकाली। वही उसकी राखी थी।

 

मोहन ने अपना हाथ आगे कर दिया।

 

लड़की ने काँपते हाथों से वह डोरी उसकी कलाई पर बाँध दी।

 

मोहन ने जेब से कुछ रुपये निकाले और उसकी हथेली पर रख दिए।

 

लड़की ने संकोच से पूछा,

 

“भैया, इतने पैसे क्यों?”

 

मोहन मुस्कराया।

 

“राखी का नेग है।”

 

लड़की की आँखों में चमक आ गई।

 

मोहन ने कुछ क्षण उसे देखा, फिर गंभीर होकर पूछा,

 

“तुम मुझे अपना बड़ा भाई मानती हो?”

 

लड़की ने सिर हिला दिया।

 

“हाँ।”

 

मोहन ने कहा,

 

“तो आज इस राखी को साक्षी मानकर मुझे एक वचन दोगी?”

 

लड़की थोड़ी घबरा गई।

 

“कैसा वचन, भैया?”

 

मोहन ने स्नेह से कहा,

 

“आज से तुम पढ़ाई नहीं छोड़ोगी। स्कूल जाओगी। मन लगाकर पढ़ोगी। अपनी मेहनत से अपने पैरों पर खड़ी होगी। अपनी माँ और छोटे भाई का सहारा बनोगी। जीवन में कितनी भी कठिनाई आए, मेहनत करना नहीं छोड़ोगी।”

 

लड़की की आँखें भर आईं।

 

उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा,

 

“वचन देती हूँ, भैया।”

 

मोहन ने उसका नाम और पता अपनी डायरी में लिख लिया।

 

“और हाँ, अगले रक्षाबंधन पर मैं तुमसे तुम्हारी पढ़ाई के बारे में पूछूँगा।”

 

लड़की के चेहरे पर ऐसी खुशी थी, जैसे उसे आज केवल कुछ रुपये नहीं, बल्कि पूरा भविष्य मिल गया हो।

 

वह हाथ जोड़कर बोली,

 

“भैया, मैं आपका वचन कभी नहीं तोड़ूँगी।”

 

और फिर वह खुशी-खुशी अपनी राह चली गई।

 

उधर सुनीता की आँखें राह देखते-देखते थक चुकी थीं।

 

तभी दूर से मोटरसाइकिल की आवाज सुनाई दी।

 

इस बार आवाज कुछ जानी-पहचानी-सी लगी।

 

सुनीता तेजी से बाहर आई।

 

मोटरसाइकिल रुकी।

 

मोहन सामने था।

 

सुनीता के चेहरे पर एक साथ राहत, खुशी और शिकायत उतर आई।

 

“भैया! इतनी देर क्यों कर दी?”

 

मोहन मुस्कराया।

 

“रास्ते में बहुत जाम था।”

 

सुनीता ने तुरंत कुर्सी खींचकर भाई को बैठाया, पंखा चलाया और पानी तथा जलपान सामने रख दिया।

 

“पहले आराम कर लो। फिर बताना।”

 

मोहन ने रास्ते की सारी परेशानियाँ सुनाईं। ट्रैफिक जाम, रेलवे फाटक और फोन न लग पाने की बात भी बताई।

 

फिर उसने उस अनजान लड़की का प्रसंग सुनाया।

 

सुनीता ध्यान से सुनती रही।

 

जब मोहन ने बताया कि उसने उस लड़की को पढ़ने और आत्मनिर्भर बनने का वचन दिया है, तो सुनीता की आँखें भर आईं।

 

वह मुस्कराकर बोली,

 

“तो अब मैं एक नहीं, दो बहनों की बहन हो गई!”

 

मोहन हँस पड़ा।

 

“और मैं एक नहीं, दो बहनों का भाई!”

 

सुनीता ने प्रेम से भाई की कलाई अपने सामने की।

 

उसने रोली का तिलक लगाया, अक्षत चढ़ाए, आरती उतारी और बड़े प्रेम से राखी बाँध दी।

 

फिर मिठाई खिलाते हुए बोली,

 

“भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे, भैया।”

 

मोहन ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

 

उस दिन उसकी कलाई पर दो राखियाँ थीं—एक सुनीता की, जो बचपन के अटूट रिश्ते का प्रतीक थी; और दूसरी उस अनजान लड़की की, जो मानवता से जन्मे एक नए रिश्ते और एक वचन की निशानी थी।

 

समय बीतता गया।

 

एक वर्ष… फिर दूसरा… फिर कई वर्ष।

 

मोहन हर रक्षाबंधन पर उस लड़की की खबर लेने का प्रयास करता रहा।

 

उधर वह लड़की भी अपने भाई के दिए वचन को भूल नहीं पाई। उसने कठिन परिस्थितियों के बावजूद पढ़ाई जारी रखी। मेहनत की, आगे बढ़ी और अंततः एक जिम्मेदार पद पर पहुँच गई।

 

एक दिन कार्यालय में एक महिला अधिकारी किसी आवश्यक कार्य से मोहन से मिलने आई।

 

बातचीत के दौरान उसकी नजर मोहन की कलाई पर पड़ी।

 

उसकी आँखें अचानक चमक उठीं।

 

“भैया…!”

 

मोहन ने ध्यान से उसकी ओर देखा।

 

महिला की आँखों में आँसू थे।

 

“आपने मुझे पहचाना नहीं?”

 

मोहन कुछ क्षण सोचता रहा।

 

महिला ने मुस्कराकर कहा,

 

“रक्षाबंधन… सड़क किनारे… एक पतली-सी डोरी… और आपका दिया हुआ वचन…”

 

मोहन की आँखें भीग गईं।

 

“तुम!”

 

वह महिला मुस्कराई।

 

“हाँ, भैया। मैं वही हूँ। आपने उस दिन कहा था कि मैं पढ़ूँगी, अपने पैरों पर खड़ी होऊँगी और अपनी माँ तथा छोटे भाई का सहारा बनूँगी। मैंने आपका वचन निभाया।”

 

मोहन के पास कहने के लिए शब्द नहीं थे।

 

महिला ने आगे बढ़कर उसके चरण छूने चाहे, लेकिन मोहन ने तुरंत उसे रोक लिया।

 

“नहीं बहन! भाई के सामने बहन सिर नहीं झुकाती।”

 

दोनों की आँखें भर आईं।

 

महिला ने कहा,

 

“भैया, आपने उस दिन मुझे रुपये से अधिक मूल्यवान चीज दी थी—एक विश्वास। आपने मुझे बताया था कि मैं भी कुछ बन सकती हूँ।”

 

मोहन ने कहा,

 

“मैंने तो केवल एक राखी का वचन निभाया था।”

 

महिला मुस्कराई।

 

“और मैंने उस वचन को अपना जीवन बना लिया।”

 

उस दिन फिर राखी का त्योहार आया।

 

मोहन अपने घर पहुँचा तो सुनीता पहले से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। कुछ देर बाद वही महिला भी अपने परिवार के साथ वहाँ पहुँची।

 

सुनीता ने उसे देखते ही गले लगा लिया।

 

मोहन मुस्कराया और बोला,

 

“अब हमारी एक नहीं, दो-दो बहनें हैं।”

 

दोनों बहनों ने एक साथ उसकी कलाई पर राखी बाँधी।

 

मोहन की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े।

 

उसने दोनों बहनों की ओर देखते हुए कहा,

 

“आज समझ आया कि राखी केवल रक्षा का धागा नहीं होती। यह किसी के जीवन को सँवारने का वचन भी हो सकती है।”

 

आँगन में दीपक जल रहा था। पूजा की थाली फिर सजी थी।

 

लेकिन इस बार उस थाली में केवल राखियाँ नहीं थीं—

 

उसमें एक रिश्ते की स्मृति, एक वचन की शक्ति और मानवता की रोशनी भी सजी थी।

लेखक :- उमेश कुमार सिन्हा ‘ निर्देशक ‘

डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल

तुलसीपथ लालापुल रघुनाथपुर

अंचल- ब्रह्मपुर(श्री ब्रह्मेश्वरनाथ धाम)

जिला – बक्सर

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