शाम के चार बज रहे थे। जवाहर उच्च विद्यालय, भरगामा के मैदान में स्थानीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ी हमेशा की तरह अभ्यास में जुटे थे। हर रोज़ की तरह आज भी किशन मैदान पर आ धमका था। किशन का घर मैदान से लगभग 1 किलोमीटर दक्षिण, सुकेला मोड़ की तरफ था। 13-14 साल का लड़का, घुंघराले बाल और गोरा रंग। गरीबी की मार झेलने के बावजूद उसके चेहरे पर गज़ब की चमक थी। वह रोज़ की तरह मैदान पर आकर अपने काम में जुट गया था। किशन का काम था—बाउंड्री से बाहर गई गेंद को उठाकर खिलाड़ियों को वापस देना। उसे गेंद पकड़ने में खूब मज़ा आता था। हालांकि, उस गरीब बच्चे को गेंद पकड़ने के इस काम के लिए कितनी ज़हमत उठानी पड़ती थी, यह तो वही जानता था। वह माता-पिता से नज़रें चुराकर ही रोज़ खेलने जा पाता था। उसके पिता बीरेंदर दास बच्चों के खेल-कूद के सख्त ख़िलाफ़ थे।
वह खुद हमेशा खेती-बाड़ी में लगे रहते और अपने बच्चों से भी खूब काम करवाते। काम न करने पर वे बच्चों की पिटाई तक कर डालते थे। किशन भी कई बार उनके सितम का शिकार हो चुका था, इसलिए वह काफी सतर्क रहता था। अभावों में पलता जीवन इंसान की सोच ही बदल देता है। पूरी ज़िंदगी बस पेट पालने की चिंता में निकल जाती है और इसी जद्दोजहद में ज़िंदगी सिमट कर ख़त्म हो जाती है।
2
बाउंड्री के बाहर से गेंद उठाकर वापस करने के साथ-साथ उसकी भी इच्छा बैटिंग या बॉलिंग करने की होती थी, मगर वह इच्छा आज तक पूरी नहीं हो पाई थी।कहते हैं, अगर इच्छाशक्ति मज़बूत हो तो दुनिया का कोई भी काम मुश्किल नहीं लगता है । इसलिए कुछ बरसों बाद अपनी इच्छा पूरी करने के लिए किशन ने पड़ोस के मित्रों के साथ मिलकर खुद लकड़ी का बैट बनाया और गांव के खाली पड़े खेतों में क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया। हालांकि, ऐसा करने के लिए उसे घरेलू कामों को समय पर निपटाने के साथ-साथ पिता से नज़रें भी चुरानी पड़ती थीं।
हर बच्चे के अंदर कुछ नैसर्गिक गुण होते हैं, जिन्हें समझने की ज़रूरत होती है। यदि बच्चे के इसी गुण को उसकी रुचि के अनुसार थोड़ा सहयोग मिल जाए, तो परिणाम शानदार हो सकते हैं। किशन की इच्छाशक्ति, लगन और ज़िद ने उसे 17-18 वर्ष की उम्र पार करते-करते एक बेहतरीन खिलाड़ी बना दिया। अब दूसरी टीमों के खिलाड़ी भी किशन को अपनी टीम में रखना चाहते थे। स्थानीय स्तर पर ‘गेस्ट खिलाड़ी’ (बोरो प्लेयर) के रूप में किशन की भारी मांग थी। गज़ब की फील्डिंग और बेहतरीन बल्लेबाजी की शैली ने उसे इलाके का हीरो बना दिया था।
3
दूसरी तरफ, खेल से अनभिज्ञ बीरेंदर दास की नज़र में किशन दिन-प्रतिदिन विलेन ही बनता जा रहा था। उन्हें यह खेल-कूद सब फ़ालतू लगता था। दिसम्बर के महीने में भरगामा में युवा क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन किया गया। इस टूर्नामेंट में दूर-दराज की टीमों ने हिस्सा लिया था। कई लीग मैचों के बाद अंततः भरगामा और मधेपुरा की टीमों के बीच फाइनल मुकाबला तय हुआ। 2 जनवरी सुबह 10 बजे से जवाहर हाई स्कूल के मैदान में इस टूर्नामेंट का फाइनल मुकाबला खेला जाना था। मैदान को दुल्हन की तरह सजाया गया था। हर कोने में लाउडस्पीकर की आवाजें गूंज रही थीं और दर्शकों से मैदान खचाखच भरा था। ज़िले से लेकर प्रखंड स्तर तक के अधिकारियों व बिहार सरकार के स्थानीय मंत्री की मौजूदगी ने उस फाइनल मुकाबले को और भी रोमांचक बना दिया था।
उधर, भरगामा टीम की जान और कड़ी मेहनत से टीम को फाइनल तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाने वाला किशन अभी तक मैदान पर नहीं पहुंचा था, जिससे कप्तान मनीष की बेचैनी लगातार बढ़ रही थी।
4
यहाँ किशन के पिता बीरेंदर दास उसे खेत पर आने को कहकर आगे बढ़ गए थे। किशन ने भी सहमति में सिर हिला दिया, लेकिन बीरेंदर दास के जाते ही पिंजड़े से आज़ाद पंछी की तरह वह मैदान की तरफ दौड़ पड़ा। किशन को देखकर कप्तान मनीष ने राहत की सांस ली। टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए मधेपुरा की टीम ने निर्धारित 20 ओवरों में 160 रनों का मजबूत लक्ष्य रखा। बाद में बल्लेबाजी करने उतरी भरगामा की टीम का दर्शकों ने तालियों से अभिवादन किया। जीत की उम्मीद लिए भरगामा के दर्शक हर चौके-छक्के पर तालियां बजा रहे थे।
मगर कुछ ही देर में मैदान पर खामोशी छा गई। मधेपुरा की घातक गेंदबाजी के सामने भरगामा की टीम बौनी नज़र आ रही थी—5 विकेट के नुकसान पर सिर्फ 46 रन ही बने थे। लेदर (ड्यूज) बॉल आज भरगामा के लिए घातक साबित हो रही थी । अगर थोड़ी-बहुत उम्मीद की किरण बची थी, तो वह किशन था, जो 18 रन बनाकर खेल रहा था। दर्शक दीर्घा में उदासी छाई हुई थी, मगर किशन हार मानने को तैयार नहीं था। वह अपनी टीम की आन-बान-शान के लिए विरोधियों के सामने डटा हुआ था।
किशन को लग रहा था कि मैच हाथ से निकल रहा है और दर्शकों की खामोशी भी इस बात की गवाही दे रही थी।हार जब करीब होती है ,तो जोखिम उठाना लाजमी हो जाता है । जोखिम से बल्लेबाज अपने स्वाभाविक खेल की ओर मुड़ जाते हैं। देखते ही देखते किशन ने ताबड़तोड़ बल्लेबाजी शुरू कर दी। उसके शॉट अब हवा को चीरते हुए बाउंड्री के बाहर जाने लगे थे। किशन के हौसले ने साथी खिलाड़ी कार्तिक में भी नई ऊर्जा का संचार कर दिया। वह भी किशन का भरपूर साथ दे रहा था। दर्शकों में अब उम्मीद जग चुकी थी, विरोधियों के हर दांव फेल हो रहे थे और किशन चौकों-छक्कों से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन कर रहा था।
5
उधर, समय पर खेत न पहुंचने के कारण बेटे को दंड देने बीरेंदर दास भी गुस्से में मैदान में पहुंच चुके थे। मगर मैदान पर पहुंचते ही उन्हें नज़ारा कुछ और ही दिखा।बड़ी मशक्कत के बाद उन्हें दर्शकों के बीच थोड़ी जगह मिली। बेटे के चौकों-छक्कों पर झूमते लोगों को देखकर आज अनायास ही गरीब बीरेंदर दास का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।
अरविंद कुमार, भरगामा, अररिया की कलम से