समाज निर्माण में शिक्षक की भूमिका-हर्ष नारायण दास - गद्य गुँजन

समाज निर्माण में शिक्षक की भूमिका-हर्ष नारायण दास

Harshnarayan

समाज निर्माण में शिक्षकों कीभूमिका

          शिक्षक सकारात्मक परिवर्तन का संवाहक होता है। वह अपने विषय एवं जीवन के प्रति जिज्ञासा से भरे अनगढ़ विद्यार्थियों को एक कुम्हार की भाँति अन्दर-बाहर से तराशता है, गढ़ता है। आज जब समाज, राष्ट्र एवं विश्व संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं तो ऐसे में शिक्षकों की भूमिका औरभी महत्वपूर्ण हो जाती है।

          एक अच्छा शिक्षक अपने विषय का जानकार होता है। यह तो उसका प्राथमिक गुण है, जिसके आधार पर उसे शिक्षण के गुरुत्तर कार्य के लिए चुना जाता है। अपने विषय के आधिकारिक विद्वान एवं निष्णात बनने के लिए वह हर कोशिश करता है और अपनी पारंगतता को नित्य और प्रखर करता रहता है। यह कार्य वह शिक्षक के साथ एक विद्यार्थी की भूमिका में भी करता है। एक अच्छा शिक्षक जीवन पर्यंत एक विद्यार्थी होता है। एक शिक्षक में विद्यार्थी भाव का होना आवश्यक है। इसी के आधार पर वह निरन्तर नूतन ज्ञान का अर्जन करता रहता है और अपने विषय का अधिकारी विद्वान बनता है। इसी आधार पर वह विद्यार्थियों में सीखने की ललक पैदा करता है, उन्हें भी जीवन पर्यन्त विद्यार्थी बनाता है। यदि शिक्षक में विद्यार्थी भाव नहीं है तो फिर उसे शिक्षण कार्य भारभूत लगता है, वह अपने पेशे के साथ न्याय नहीं कर पाता, जिसकी उससे अपेक्षा की जाती है। साथ ही ऐसे में विद्यार्थी इसका खामियाजा भुगतने के लिए अभिशप्त होते हैं।

          शिक्षक में संवेदनशीलता एवं बौद्धिक ईमानदारी एक अहम गुण है। शिक्षक बहुत बुद्धिमान या होशियार न भी हो लेकिन यदि वह संवेदनशील है तथा उसमें बौद्धिक ईमानदारी है तो वह अपने पेशे के साथ न्याय करने के लिए आवश्यक तप-त्याग एवं श्रम करता है और देर सबेर अपनी योग्यता सिद्ध करता है। जहाँ वह स्वयं को न्यून पाता है वहाँ अपने विषय की पकड़ बनाने की हर चेष्टा करता है और वह सहज रूप में एक अभिभावक के रूप में अपनी भावपूर्ण भूमिका निभाता है।

          एक अच्छा शिक्षक एक अभिभावक की भाँति अपने सभी विद्यार्थी पर नजर रखता है और पूरी कक्षा को एक साथ लेकर चलने का प्रयास करता है। कक्षा में होशियार बच्चों की जिज्ञासाओं को शांत करता है, मध्यम बच्चों का ध्यान रखता है, साथ ही पिछड़ रहे बच्चों को भी संभालता है। विद्यार्थियों के स्तर के अनुरूप उन्हें अलग-अलग विधियों से सिखाने की कोशिश करता है। सबके साथ एक जैसा व्यवहार करता है। विद्यार्थियों के साथ भेदभाव को वह अपराध जैसा कृत्य मानता है। विद्यार्थियों के बीच भेदभाव असंतोष को जन्म देता है जिससे कक्षा एवं शिक्षण संस्थान का वातावरण बिगड़ता है।

          एक अच्छा शिक्षक अपने विषय के ज्ञान के साथ अपने समाज, संस्कृति एवं इसके सामयिक स्वरूप का भी ज्ञान रखता है। वह लकीर का फ़क़ीर नहीं होता। वह इसके इतिहास की जानकारी रखता है साथ ही चारों तरफ घट रही घटनाओं पर भी सम्यक दृष्टि रखता है। इस तरह वह अपने विषय को जीवन एवं समाज से जोड़ते हुए इसे प्रगतिशील एवं युगानुकूल बनाता है। विद्यार्थियों को अपने विषय की अंतर्विषयक बारीकियों से परिचय कराता है और उन्हें इस दिशा में गहरे उतरने के लिये प्रेरित-प्रोत्साहित करता है। यदि शिक्षक नित्य घट रही घटनाओं से परिचित न हो और न ही समाज और संस्कृति के सूक्ष्म ताने बाने से परिचय रखता हो तो फिर उसे आज के तेजी से परिवर्तित हो रहे जटिल दौर में अपने विषय के साथ न्याय करना कठिन हो जाएगा।

          आज के विज्ञान एवं तकनीकी प्रधान युग में टेक्नोलॉजी जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है और तेजी से बदल रही है। कंप्यूटर, स्मार्टफोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया जीवन के अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में इनके उपयोग की जानकारी से वंचित व्यक्ति बदलते समय की धारा के साथ कदमताल नहीं कर पाएगा। शिक्षक पर भी यह सत्य लागू होता है और विशेष रूप में उसके लिए यह मायने रखता है। आज जब सारा ज्ञान का भण्डार नाना रूप से इंटरनेट और सोशल मीडिया पर उपलब्ध है तो ऐसे में इनका उपयोग न कर पाना एक प्रकार की अपंगता मानी जाएगी। एक प्रगतिशील शिक्षक कुछ समय निकालकर इनपर अपनी न्यूनतम पकड़ अवश्य बनाता है।एक अच्छे शिक्षक में समाज को देने का भाव प्रबल होता है। एक ओर वह अपने छात्र-छात्राओं को इसके लिए तैयार करता है तो साथ ही अपने शोध एवं सृजन कार्यों के माध्यम से समाज के वंचित पिछड़े, जरुरतमंद तबके के लिए विशेष रूप से स्थान देता है। वह उन्हें समाज को संवेदित-आन्दोलित करती समस्याओं से रूबरू करता रहता है और अपने स्तर पर इनके समाधान के लिए प्रयास भी करता है। एक अच्छा शिक्षक एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका में सक्रिय रहता है जो समाज के लिए बिना कुछ किये चैन से नहीं बैठ सकता और विद्यार्थियों को भी इसके लिए प्रेरित करता है।

          एक अच्छा शिक्षक अपने राष्ट्र के प्रति अनुराग के भाव से भरा होता है। इसकी एकता-अखण्डता के लिए सहज-स्फूर्त रूप से सजग, सचेष्ट एवं सक्रिय रहता है। वह एक राष्ट्रभक्त होने के साथ ही विश्वनागरिक की भूमिका में भी होता है। अपने समाज और राष्ट्र की अहर्निश सेवा के साथ वह इनका संस्कृति दूत बनकर अपनी भूमिका वैश्विक पटल पर निभाता है।एक अच्छा शिक्षक अपने विषय में सच्चा नेतृत्व प्रदान करता हैह सच्चा शिक्षक एक योगी की मनोभूमि में जीता है। जीवन एवं विषय के समाधान के सूत्रों को समाधि की गहराइयों में प्राप्त करता है।

          इस तरह समाज एवं देश की सेवा करते हुए शिक्षक ब्रह्मा, विष्णु और महेश की भूमिका को भली भांति बरकरार रख सकते हैं।

हर्ष नारायण दास
प्रधानाध्यापक
मध्य विद्यालय घीवहा, फारबिसगंज(अररिया)

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