प्रत्युपकार-जैनेन्द्र प्रसाद रवि - गद्य गुँजन

प्रत्युपकार-जैनेन्द्र प्रसाद रवि

प्रत्युपकार

          एक लड़का चौराहे से गुजरते हुए एक दंपत्ति के सामने गिड़-गिड़ाकर बोला- माता जी मैं दो दिनों से भूखा हूँ एक रूपया दे दें। आपकी बहुत मेहरबानी होगी। महिला के साथ वाले सज्जन ने झिड़कते हुए बोला- कोई काम क्यों नहीं करते, किसी के सामने हाथ फैलाते शर्म नहीं आती? इतना कहते हुए आगे बढ़ गये।साथ वाली महिला को दया आ गई, उसने चुपके से अपने गले में पड़ी लाकेट उसे देते हुए कहा- इसे बेचकर कोई काम कर लेना।
बहुत दिनों के बाद अखबार में एक मकान नीलामी का विज्ञापन छपा था जिसका बोली लगाया जाना था।

अगले दिन मकान मालिक के कुछ आदमी आकर उस मकान में रहने वाली एक बूढ़ी महिला का सामान बाहर फेंकते हुए कहा- इसे जल्दी खाली करो, इसके नये मालिक इसमें आकर रहने वाले हैं। मेरे मालिक ने इसे बेच दिया है। बूढ़ी महिला कांपती जुबान में रोती हुई बोली- कुछ दिनों की और मोहलत दे दो बेटा! मैं कहाँ जाऊँ? भगवान के लिए दया करो, इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है जो सहारा दे सके।
संयोग से उसी समय डाकिया ने आकर उस बूढ़ी महिला के हाथों में एक लिफाफा थमाया जिसमें लिखा था,” जब तक चाहें आप इस मकान में रह सकती हैं। आपको इससे कोई नहीं निकाल सकता क्योंकि इसका मालिक अब आप ही हैं।

दरअसल जिस लड़के को वर्षों पहले जिस महिला ने अपनी लाॅकेट दिया था, उस लड़के ने उसे बेचकर छोटी सी फल की दुकान कर लिया था। समय ने करवट बदली और वह बहुत बड़ा व्यापारी बनता गया जिसने उसके उपकार का बदला बूढ़ी महिला के सिर पर छत देकर दिया।

प्रकृति का नियम है कि एक अन्न का बीज बोने पर हमें हजारों पौधे मिलते हैं, एक पेड़ लगाने पर हजारों फल प्राप्त होते हैं उसी प्रकार की गई भलाई के बदले हमारे पास हजारों गुणा वापस लौट कर आता है।
कहा भी गया है-

डाल है तो फूल, पत्ते भी आएँगे।
आज दिन खराब है तो कल अच्छे भी आएँगे।

जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’
म. वि. बख्तियारपुर
(पटना)

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