कर्म और विचार- गिरीन्द्र मोहन झा


कहना कठिन है, कर्म पहले आया अथवा विचार? रामायण के किष्किन्धाकाण्ड में केवल विचार है, तो परिणाम कुछ नहीं, लंकाकाण्ड या युद्धकाण्ड में केवल कर्म है, तो परिणाम में पतन है। सुन्दरकाण्ड में श्रीहनुमान जी पग-पग पर विचार के साथ कार्य भी करते जाते हैं, तो सफलता उन्हें मिलती रहती है । केवल सोचते रह जाइए तो वह ठीक नहीं। बिना विचार किए काम करेंगे तो पछताना भी पड़ सकता है। सोच-विचार के साथ कार्य करते जाना सफलता के मार्ग को प्रशस्त करता है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में,
“करने वाला इतिहास निर्माता होता है, सिर्फ सोचते रहने वाला इतिहास के भयंकर रथचक्र के नीचे पिस जाता है। इतिहास का रथ वह हाँकता है, जो सोचता है और सोचे हुए को करता भी है ।”
कहा जाता है,

Most of the problems in life are because of two reasons: First we act without thinking, secondly we keep thinking without acting.
कहा जाता है, “काम करने से पहले सोचना बुद्धिमानी है, काम करते समय सोचना सतर्कता है, काम करने के बाद सोचना मूर्खता है। “इंफोसिस foundation की अध्यक्षा श्रीमती सुधा मूर्ति के शब्दों में,

Vision without action is merely a dream; action without vision is merely passing time; but vision and action together can change the world.”


श्रीमद्भगवद्गीता के अन्तिम श्लोक में, संजय उवाच-

यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:।

तत्र श्रीर्विजयोभूतिर्ध्रुवानीतिर्मतिर्मम।।

(संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं, हे राजन ! जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ महात्मा अर्जुन है, वहीं श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है।) यहाँ श्रीकृष्ण ज्ञान तथा श्रेष्ठ विचार के प्रतीक हैं और अर्जुन कर्म के। जहाँ ज्ञान/श्रेष्ठ विचार तथा कर्म दोनों हों, वहीं सबकुछ है ।
कोई महत्त्वपूर्ण व बड़ा निर्णय लेते समय विचार तो दूसरों से भी लेना चाहिए, किन्तु करना अपने मन से ही चाहिए ।
गिरीन्द्र मोहन झा,

+2 शिक्षक, +2 भागीरथ उच्च विद्यालय, चैनपुर-पड़री, सहरसा

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