गरीबी की कब्र पर पनपी हँसी-श्री विमल कुमार" विनोद" - गद्य गुँजन

गरीबी की कब्र पर पनपी हँसी-श्री विमल कुमार” विनोद”

Bimal Kumar

एक बड़े शहर के चंराहे पर सुबह के 10 बजे एक चमचमाती हुई कार ट्रैफिक पर आकर लगती है।उसी समय एक लड़की जो कि फटी हुई सलवार तथा पायजामा पहनी हुई है,हाथ में पुराना कपड़ा है,दौड़कर गाड़ी को झपट्टा मार गाड़ी पोंछने लगती है।इतने में गाड़ी बढ़ाने के लिये सिगनल मिलती है।लड़की बाबू पाँच रूपये दे दो भूख लगी है।इतनी देर में गाड़ी बढ़ जाती है।
तभी दूसरी चमचमाती गाड़ी आकर लगती है,पुनः वह लड़की झपट्टा मारकर गाड़ी पोंछने लगती है तथा कहती है,बाबूजी पाँच रूपये दे दो भूख लगी है, इतने में गाड़ी वाले बाबू पाँच रूपये देकर कहता है,चल हट जा सुबह- सुबह मूड खराब करने आ जाती है,लेकिन वह गरीब लड़की पाँच रूपया पाकर हँसने लगती है।
कथा विस्तार

एक दिन की बात है मोहन एक शहर के चौराहे को पार कर रहा था, जहाँ पर ट्रैफिक के पास एक चमचमाती स्काॅरपियो आकर लगती है।तभी गरीबी की मार से जूझती एक गरीब लड़की,जो कि फटी हुई सलवार तथा पायजामा पहनी हुई गाड़ी की ओर झपट्टा मारकर गाड़ी को पोंछते हुये कहती है कि “बाबू पाँच रूपये दे दो,भूख लगी है”।देखिये समय की मार,इतने में गाड़ी बढ़ाने की सिग्नल मिलती है और गाड़ी वाले साहब धीरे-धीरे अपनी गाड़ी को बढ़ाते हुये आगे निकल जाते हैं तथा वह गरीब लड़की निराश होकर देखती ही रह जाती है।
इसके तुरंत बाद एक दूसरी चमचमाती गाड़ी आकर लगती है तथा वह गरीब लड़की पुनः अपनी भूख को मिटाने के लिए तथा कुछ पैसों के लिये गाड़ी को पोंछने लगती है।इस बार गाड़ी वाले बाबू को कुछ दया आती है तथा पाँच रूपये का एक सिक्का
थमाते हुये गाड़ी बढ़ाने लगता है।वह लड़की उस गाड़ी वाले साहब को अनेकों बार प्रणाम करते हुये उनके मंगलमय की कामना करती है।
उस गाड़ी पोंछने वाली लड़की के हाथों में जैसे ही पाँच रूपये का सिक्का मिलता है,उसके चेहरे पर प्राकृतिक हँसी झलकने लगती है,मानो उसे बहुत कुछ मिल गया है तथा वह बगल के दुकान पर जाकर बिस्कुट खरीद कर खाने लगती है।
इस लघुकथा का लेखक इस घटना को देखकर कुछ महसूस कर रहा था जैसे”मानो गरीबी के कब्र पर पनपी हुई हँसी”जिसमें पाँच रूपये मात्र पाने के लिये वैसे हाथों को जिसके हाथों में किताब तथा काॅपी होनी चाहिये थी गरीबी ने अपने कब्र पर लाकर पाँच रूपये कमाकर पेट भरने को मजबूर कर दिया”।उस गाड़ी को पोंछ कर पाँच रूपये अर्जित करने वाली लड़की की मानसिकता को देखकर लग रहा था कि”गाड़ी वाले साहब के द्वारा दिये गये पाँच रूपये ने उस लड़की के चेहरे पर हँसी ला दिया”।
इस लघुकथा को अपनी कल्पना तथा सकारत्मक सोच का रूप देते हुये लेखक के मन में बहुत सारी बातें उजागर हो रही थी,जैसे-
(1)अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि का होना तथा अशिक्षित लोगों के मन में यह भावना का विकसित होना की बच्चे तो भगवान के द्वारा भेजे गये फल हैं,इस कारण का ही यह एक प्रतिफल हो सकता है।
(2)दूसरी बात यह सोचना कि भगवान ने बच्चे को जन्म दिया है,वही इसके पालनहार भी होंगे।
(3)भिखमंगी की समस्या को कुछ माफिया तत्व के लोग संचालित करते है,जो छोटे-छोटे अनाथ बच्चों से भीख मंगवाने का प्रयास करते हैं तथा उनके द्वारा मांगे गये भीख से अय्यासी भी करते हैं,जो कि दुर्भाग्य की बात है।
(5)भीख मांगना तथा इसी तरह चौक-चौराहे पर छोटी-छोटी काम करके अपना पेट-पालना इनकी नीयति सी हो गई है,जिसे यदि कोई काम भी दिया जाय तो वह करना पसंद नहीं करेगा।
(6)चूँकि ऐसे बच्चों तथा लोगों को अपने भविष्य के बारे में किसी भी बात की चिंता नहीं होती हैऔर न ही जीवन में बचत करके बहुत कुछ करना है।
(7)सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्था के द्वारा कुछ बच्चों को अनाथालय में रखकर उसका विकास करने की बात सोची जाती है,लेकिन तेज गति से इस प्रकार की बढ़ती हुई जनसंख्या लाइलाज सी नजर आती है।
सुझाव-चूँकि “गरीबी की कब्र पर पनपी हँसी” आज के एक विकासशील देश के समाज के लिये अफसोस की बात है,लेकिन ऐसे लोगों को समाज के विकास की मुख्य धारा में लाना तथा रोजगार उपलब्ध कराना भी मुश्किल सा दिखाई पड़ता है।इसके लिये सरकार को ऐसे लोगों को स्वरोजगार उपलब्ध कराये जाने का प्रयास करना चाहिये लेकिन बड़े-बड़े शहरों के चौक चौराहों पर भटकते हुये इस तरह के बच्चों को अबतक उनके जिन्दगी की वास्तविक हँसी नहीं मिल पायी है।
आलेख साभार-श्री विमल कुमार”विनोद”प्रभारी प्रधानाध्यापक राज्य संपोषित उच्च विद्यालय पंजवारा बांका

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