"चलो विद्यालय चलें"-श्री विमल कुमार - गद्य गुँजन

“चलो विद्यालय चलें”-श्री विमल कुमार

Bimal Kumar

ओपनिंग दृश्य

गाँव का दृश्य-बहुत सारे बच्चे-
बच्चियाँ खेल रहे हैं।कुछ बच्चे गाय-बकरी चराने जा रहे हैं।इसी समय कुछ बच्चे जिनके कपड़े फटे-पुराने हैं जो कि उसी रास्ते से होकर विद्यालय पढ़ने जा रहे हैं।
तभी एक खेलने वाला बच्चा दूसरे से अरे रामू कहाँ जा रहे हो।
रामू-पढ़ने जा रहा हूँ,चलोगे क्या?
मोहन-नहीं,जिसे सुनकर रामू कहता है,क्यों?
मोहन-(दुःखी मन से) मेरे घर में खाना नहीं बनी है।माँ सेठ जी के
यहाँ काम करती है,रात का बचा हुआ कुछ भोजन लायेगी तब न खाना खाऊँगा,फिर शंकर चाचा का गाय चराने जायेंगे।
रामू- चलो मेरी माँ नाश्ता दी है तुम उसको खा लेना,मेरे पास काॅपी,स्लेट,पेंसिल भी है,तुम इसी से लिख-पढ़ लेना।फिर मोहन रामू के साथ विद्यालय चल जाता है।

“प्रथम अंक,प्रथम दृश्य”

गाँव का दृश्य-बहुत सारे बच्चे खेल रहे हैं।बच्चों में अधिकतर
निर्धन परिवार के हैं,उसमें कुछ के घरों में खाने को अन्न भी नहीं हैं,कुछ के माता दूसरे के घर में काम करने गई हैं।कुछ बच्चे गाय- बकरी चराने जा रहे हैं।इसी बीच
रामू नामक एक बालक साधारण
पहनावा पहने हुये विद्यालय जा रहा है।
खेलने वाले बच्चे-(आश्चर्य से)कहाँ जा रहे हो रामू,रूको न!खेलोगे नहीं।
रामू-विद्यालय जा रहा हूँ,पढ़ने के लिये।चलोगे क्या?
एक बच्चा-(बहुत सोचकर)पढ़ने जाने का तो मन कर रहा है, लेकिन क्या करूँ?
रामू(बीच में बात काटते हुये)काहे
क्या हुआ,जो कि तुम अफसोस कर रहे हो?कुछ तो बताओ।
बच्चा जिसका नाम मोहन है,घर में खाने को कुछ भी नहीं है।माँ दूसरे के घर में चौका बर्तन करने गई है।वहीं से कुछ रात का बचा हुआ खाना लेकर आयेगी तो फिर खाऊँगा।
रामू-(अपने आप पर अफसोस करते हुये)मोहन मेरी बात सुनो।मैं
भी एक गरीब माता-पिता का बेटा हूँ।मेरी माँ मुझे दोपहर में नाश्ता करने के लिये कुछ रात की बची हुई रोटी दी है,उसे खा लो,और तुम मेरे साथ विद्यालय चलो।
मोहन-ठीक है(कहकर रामू के साथ विद्यालय चला जाता है)।

“प्रथम अंक,द्वितीय दृश्य”


सड़क का दृश्य-(समाज के कुछ लड़के बैठकर जुआ खेल रहे हैं, तो कुछ नशा का सेवन कर रहे हैं तभी रामू,मोहन तथा कुछ बच्चे विद्यालय जा रहे हैं।इसी बीच कुछ खेलने वालों में से एक)-अरे रामू पढ़ने जा रहा है।लगता है पढ़ -लिखकर बहुत बड़ा विद्वान बन जायेगा।बाप तो दूसरे का मजदूरी करते-करते इस दुनियां से चला गया और माँ तो दूसरे के यहाँ चौका-बर्तन करके अपना जीवन चलाती है।लाज नहीं लगती है, किसी के यहाँ मजदूरी करो तो भोजन का व्यवस्था हो जायेगा।
रामू-(सोहन नामक जुआरी से) अरे भाई तू मुझे और मोहन को तो विद्यालय जाने दे।तू भी मेरे साथ चलकर तो देखो,क्या मजा
आता है।
सोहन-अरे रामू तू मुझे समझाने की कोशिश मत कर।तेरे जैसा पढ़ने वाला हमने बहुत देखा है।किसी के घर पर जाकर मजदूरी कर ले तो खाने-पीने को कुछ मिल जायेगा।तुम जो सोंचते हो कि पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बन जायेंगे,ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है।
रामू-(अफसोस के साथ)काहे,तू
ऐसा क्यों कहता है?
सोहन-क्योंकि तुम्हारे पास न तो आगे बढ़कर पढ़ने के लिये रूपया हैऔर न ही कोई सहयोग करने वाला।इसलिये मेरी बात मान लो और किसी के यहाँ मजदूरी कर लो।
रामू(चिल्लाकर)नहीं मुझे और मोहन को विद्यालय जाने दो।हमलोग पढ़-लिखकर अपना, अपने परिवार तथा देश का नाम रौशन करेंगे।

“द्वितीय अंक,प्रथम दृश्य”

नदी का दृश्य-ट्रैक्टर से बालू का उठाव हो रहा है,तभी रामूऔर मोहन का प्रवेश)
रामू-(बालू घाट वाले मुंशी से)हम
दोनों को भी कुछ काम दे दो भैया
आज कई शाम से भूखा हूँ,कुछ भी नहीं खाया हूँ।आह भूख लगी है।
मुंशी-चलो जब तुम कहते हो तो काम देता हूँ,लेकिन एक दिन का पचास रूपया ही पगार मिलेगा।
रामू-ठीक है भैया हम दोनों काम करने के लिये तैयार हैं।(फिर दोनों
बालू घाट में रात में मजदूरी करने लगता है तथा दिन को विद्यालय पढ़ने जाता है)।
रामू-(मोहन से)-चलो हमलोग विद्यालय पढ़ने चलते हैं,पढ़ लिखकर अपने उज्जवल भविष्य का निर्माण करेंगे,एक नये विश्व का निर्माण करेंगे।विद्यालय जाकर लोगों को पढ़ने के लिये कहेंगे।
बालू घाट का मुंशी-रामू और मोहन की गतिविधि को देखकर) रामू और मोहन सुनो,तुमलोगों के पठन-पाठन के कार्य को देखकर मुझे बहुत अच्छा लगता है और
मैं तुमलोगों को एक सौ रूपया प्रतिदिन के दर से पगार देने जा रहा हूँ,खुब पढ़ो-लिखो जीवन में तरक्की करो।मैं तुमलोगों को पढ़ने में सहयोग करता रहूँगा।

“तृतीय अंक,प्रथम दृश्य”

गाँव का दृश्य-बहुत सारे बच्चे खेल रहे हैं,कुछ नशा पान कर रहे हैं तो कुछ जूआ खेल रहे हैं।इसी बीच एक बिमार आदमी जो कि उस रास्ते से पार कर रहा था , गिर पड़ता है तथा तबीयत अचानक अधिक खराब हो जाती है।तभी उस रास्ते से रामू और मोहन विद्यालय जा रहा है,जो उस व्यक्ति को देखकर रूक जाता है।
रामू-(आश्चर्य से)अरे इसे क्या हो गया,जल्दी चिकित्सक के पास ले चलते हैं।(रामू उस आदमी के पाॅकेट में चिकित्सक की पर्ची देखता है।)(वहाँ के लोगों से) देखिये न,इनकी तो तबीयत बहुत खराब है।पाॅकेट में तो चिकित्सक की पर्ची रखी हुई है।इसको जल्दी चिकित्सक को दिखाना जरूरी है।
सभी लोग-हाँ,हाँ रामू तुम ठीक ही कह रहे हो।हम लोग तो कुछ समझ ही नहीं पा रहे थे कि इस बिमार आदमी को क्या हो गया है।यदि रामू न आता और चिकित्सक की पर्ची नहीं देखता तो शायद बेचारा बिमार व्यक्ति तड़प-तड़प कर मर जाता।इसलिये हमलोगों को भी अपने बच्चे-बच्चियों को विद्यालय पढ़ने के लिये भेजना चाहिये।(सभी
मिलकर एक साथ)हम अपने बच्चों को विद्यालय पढ़ने के लिये भेजेंगे।”चाहे जो भी हो परेशानी
पढ़ा-लिखा परिवार ही होगी मेरी निशानी”।”शिक्षा जीवन का अमूल्य रत्न है,जिसे प्राप्त करना हम सबों का है अधिकार”।शिक्षा से जीवन सुखमय होगा,बिना शिक्षा जीवन अधूरी है।(रामू के द्वारा बिमार व्यक्ति के पाॅकेट से निकाली गई पर्ची को देखकर पढ़ने के बात की चर्चा सभी लोगों ने अपने-अपने समाज में मुक्त कंठ से की ओर सबों ने अपने- अपने बाल बच्चों को विद्यालय में नामांकन कराकर पढ़ाने की बात अपने-अपने मन में ठान ली।)

“अंतिम-दृश्य”


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विद्यालय का दृश्य- विद्यालय में
नामांकन कराने के लिये ग्रामीणों की भीड़ सी उमड़ पड़ी है।
सभी ग्रामीण एक-एक करके अपने बच्चे-बच्चियों का नामांकन कराने के लिये बहुत उत्साह के साथ विद्यालय पहुँचना प्ररंभ कर दिये।एक ग्रामीण-“शिक्षा है अनमोल रत्न,पढ़ने का तुम करो जतन”।
दूसरा ग्रामीण-“पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नबाब,खेलोगे-कूदेगो होवोगे खराब”।
तीसरा ग्रामीण-“गैया-बकरी चरती जाय,मुनिया बेटी पढ़ती जाय।”
इस प्रकार लोगों ने घर-परिवार, समाज,देश एवं विश्व की समस्याओं से मुक्ति हेतु अपने- अपने बाल बच्चों को विद्यालय में नामांकन कराने का संकल्प लेकर देश को साक्षर बनाने में अहम् भूमिका निभाने का संकल्प लिया और शिक्षा के महत्व को समझा।
आलेख साभार-श्री विमल कुमार
“विनोद”प्रभारी प्रधानाध्यापक राज्य संपोषित उच्च विद्यालय
पंजवारा,(बाँका)।

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