चौथा प्रमाण - गद्य गुँजन

चौथा प्रमाण

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लघुकथा- “चौथा प्रमाण”
✍️सुरेश कुमार गौरव

  • एक बार एक निजी स़ंस्था के अधिकारी को कार्यालय के लिए एक परिश्रमी और निष्ठावान सचिव की जरुरत पड़ी।उन्होंने इस बात का विज्ञापन कुछ समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाया।समाचार पत्रों में विज्ञापन पढ़कर उस संस्था के यहां उचित प्रमाण पत्र के साथ अभ्यर्थी आवेदन भेजने लगे।साक्षात्कार के लिए सभी को बुलाबा पत्र भेजा गया। फिर सभी लोगों में से साक्षात्कार के बाद एक को चुन लिया गया और बाकी को उनके प्रमाण पत्र के साथ वापस भेज दिया।

जिस वक्त अधिकारी ने सब को वापस जाने को कहा ,उस समय अधिकारी का एक पुराना दिली दोस्त भी उनके पास बैठा था। उसने अपने अधिकारी मित्र से पूछा,”दोस्त! तुमने किस आधार पर इस युवक को चुना जबकि इसके पास पर्याप्त प्रमाण पत्र भी मौजूद नहीं हैं?”

अधिकारी ने शांत स्वर में अपने दोस्त से कहा-” मेरे प्रिय दोस्त! तुम्हारा कहना बिल्कुल असत्य है। इस युवक के पास शिष्टाचार के कई प्रमाण मौजूद हैं। पहला प्रमाण यह है कि इस युवक ने शिष्टाचार का पालन करते हुए अपने पादुका उतारकर ,बोरे में पैर पोछकर,अंदर आने की अनुमति मांगी तब अंदर प्रवेश किया। जबकि अन्य सभी सूट-बूट अच्छे-अच्छे वस्त्रों से सुसज्जित होने के बाबजूद भी शिष्टाचार व अन्य मामलों में बिलकुल कोरे निकले। वे सभी कुर्सी पर बेधड़क ही बैठ गए थे। यह युवक शुरु से अंत तक अनुशासित ढंग से खड़ा रहा। इस युवक का दूसरा प्रमाण यह था कि इस युवक ने जब कार्यालय में प्रवेश किया मैनें जानबूझकर अपनी एक किताब और फाईल टेबुल के नीचे गिरा दी,इस युवक ने झट से मेरी किताब और फाईल को उठाकर टेबुल पर रख दिया जबकि अन्य ठाट से अपनी-अपनी कुर्सी पर बैठे रहे। इसका तीसरा प्रमाण यह है कि इसका पहनावा अन्य की अपेक्षा साधारण था लेकिन उसी में वह अत्यंत शालीन सभ्य और कर्मठ दिख रहा था। इसके अच्छे व्यवहार को देखकर मुझे लगा यह युवक ही मेरा सचिव बनने लायक है। तीन प्रमाण प्रस्तुत करने के बाद मैं चौथा प्रमाण प्रस्तुत कर इसे नौकरी पर रख लिया हूं।”

यह बातें सुनकर अधिकारी के दोस्त का हृदय गदगद हो गया। अपने दोस्त को गले लगा लिया और कहा -“तुम इतने बड़े पद पर आसीन होकर पद की गरिमा से ज्यादा शिष्टाचार, अनुशासन और इंसानियत को ज्यादा महत्व देते हो जबकि आजकल फैशन और झकास को ज्यादा तरजीह दी जाती है। तुम जैसे निष्ठावान, ईमानदार अधिकारी की ही इस देश को जरुरत है!”
इतना कहकर अधिकारी का दोस्त बाहर चला गया और अधिकारी अपने काम में तल्लीन हो गया।

@सुरेश कुमार गौरव, पटना (बिहार)
मेरी स्वरचित मौलिक रचना
@रचना के सर्वाधिकार सुरक्षित

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