नशा का लत- श्री विमल कुमार "विनोद" - गद्य गुँजन

नशा का लत- श्री विमल कुमार “विनोद”

Bimal Kumar

कथा सार-मोनू एक 12 वर्ष की आयु का लड़का जो कि सातवाँ वर्ग में पड़ता है।गाँव में शाम के समय प्रतिदिन”ताड़ी खाना”के पास चक्कर लगाते हुये धीरे-धीरे ताड़ी पीना शुरू कर देता है,पर आधारित श्री विमल कुमार”विनोद”लिखित लघुकथा”नशा की लत”प्रस्तुत है।
कथा विस्तार-मोनू एक ग्रामीण परिवेश में रहने वाला एक गरीब गुरूबा लड़का जो कि अभी लगभग बारह वर्ष की अवस्था में पहुँचा है।गाँव में ताड़ के गाछ पर ताड़ी चुआने वाला ताड़ी बेचकर कुछ रूपया अर्जन करने के लिये ताड़ी बेचता है।जहाँ पर उस गाँव के बहुत सारे ग्रामीण ताड़ी पीने जाते हैं।इसे देखकर रामू जो कि महज बारह वर्ष का है,उसे भी ताड़ी पीने की इच्छा जागृत होती है और वह “ताड़ी खाना”में ताड़ी पीने चला जाता है।उसे देखकर उसके आसपास के बहुत सारे उसी उम्र के लगभग प्रतिदिन ताड़ी पीने जाते हैं।सभी बच्चे मिलकर दिन में कुछ अर्जन करने की कोशिश करते हैं तथा शाम में”ताड़ी खाना”में जाकर मस्ती करते हैं।ताड़ी पीते-पीते उनमें “नशा करने की लत” जगने लगती है और धीरे- धीरे उनलोगों का झुकाव देहाती हाट की ओर होने लगता है जहाँ लोग महुआ का दारू तथा हटिया में पोलट्री एवं आंध्र प्रदेश वाली मछली भुनवा कर चखना के रूप में पीने का मजा लेते हैं।चूँकि जब लोगों को कोई चीज खाने का चस्का लग जाता है तो फिर उसका क्या कहना।अपने समाज के वैसे ही लोगों के साथ रामू को भी पहले ताड़ी खाना में फिर देहाती ग्रामीण हाट में भी अपने समाज के किशोरों के साथ”नशा पान की लत”सी लग जाती है।किशोरावस्था की चौखट पर खड़ा रामू की तरह अनगिनत बच्चे जो कि”नशा का लत”का शिकार होता जा रहा है,जिसमें लड़कों के साथ -साथ लड़कियां भी इसकी शिकार होती जा रही है।आज के समय में जब लाॅकडाउन लगा हुआ है,जहाँ पर ग्रामीण हाट लगने पर पाबंदी लगी हुई है।इसके बाबजूद भी”नशा का लत”लगे हुये पियक्कड़ों की कमी नहीं है।ऐसा देखा जाता है कि नशा करने वाले हाट के बहाने बैहारों में भी नशा का आनंद लेने पहुँच जाते हैं।कहा जाता है कि “नशा नाश का जड़ है भाई,इसकी कथा बड़ी दुःखदायी”वाली बात होती है।
“रामू”जो कि “नशा का लत” का शिकार हो चुका है,जब हाट से महुआ पीकर चलता है तो कभी देश का सबसे बड़ा राजनीतिज्ञ होने की बात करता है तो कभी विश्व के सबसे बड़े दार्शनिक होने की बात करता है तो कभी समाज को बदल देने वाले आदर्श को समाज के सामने प्रस्तुत करने की बात करता है। बदलते परिवेश में जब किशोरों को नशा का लत लग जाता है तो उसके माता-पिता जी भी बात करने से परहेज करने लगते हैं। दारू पीकर घर आने वाला रामू तथा उसके उम्र के लाखों-लाख किशोर नशा का लत का शिकार होकर अपने माता- पिता के साथ विशेष कर ग्रामीण हाट के दिन लाख और करोड़ की ही बात करते हैं तथा नशे की हालत में समाज तथा परिवार के लोगों के साथ झगड़ा-झंझट तथा मारपीट करना इसकी नियति सी हो गई है।
आज का समाज जो कि भयंकर बेरोजगारी की मार से जूझ रहा है,इधर-उधर से कुछ कमा कर नशापान करके समाज की आने वाली पीढ़ी के लोगों के लिये विनाशकारी सिद्ध होता जा रहा है।
मुझे लगता है कि नशापान के कारण लोगों के अंदर सही निर्णय लेने की शक्ति का ह्रास होने लगता है तथा वह विनाशकारी चीजों में अधिक संलग्न होने लगता है।साथ ही समाज में हो रहे बलत्कार जैसी समस्याओं के लिये भी नशापान अपनी अहम भूमिका निभाने का प्रयास करता है।इसके अलावे वैसे किशोर जो कि 12-13 वर्ष की उम्र में ही गाँव में मिलने वाली ताड़ी तथा ग्रामीण हाट, में मिलने वाली महुआ वाली शराब के नशे का शिकार होकर मानसिक विकृति के जाल में उलझ जाते हैं।
इन किशोरों को इस प्रकार की समस्याओं के जाल में उलझाने में विशेषकर समाज के असामजिक तत्वों का बहुत बड़ा योगदान रहता है,जो अपने जीवन की राह में नये-नये नशेड़ियों को शामिल करके अपना एक सुन्दर संगठन बनाने का प्रयास करते हैं।
शहरों में भी जहाँ पर कि मद्यपान निषेध करके रखा गया है,वहाँ पर भी लोग खुलेआम शराब तो नहीं बल्कि गांजा का प्रयोग करते हुये नजर आते हैं जिसमें विशेषकर वहाँ सड़कों के बगल फूटपाथ पर काम करने वाले लोग तथा अन्य लोग भी देखने को मिलते हैं,जहाँ उनका संगठन बना हुआ मिलता है।
“नशा का लत” परिवार,समाज तथा जीवन के लिये घातक होता है।जीवन में यदि लोगों को विकास करना है तो इससे लोगों को बचने का प्रयास करना चाहिये।
(1) सबसे बड़ा कारण बेरोजगारी माना जा सकता है तथा बेरोजगारी का सबसे बड़ा कारण जनसंख्या की अप्रत्याशित वृद्धि मानी जाती है। दूसरा कारण माता का अंधा प्यार तथा पिता की अनदेखी को माना जाता है।जैसे कहावत है कि “घोड़ा क्यों अड़ा,पान क्यों सड़ा और बेटा क्यों बिगड़ा,जिसका एक ही कारण है कि उसका समय पर देखभाल नहीं किया जाना”।
(2) माता-पिता को बच्चे-बच्चियों को शिक्षा और संस्कार सीखाने का प्रयास किया जाना चाहिये।
(3)माता-पिता को यह देखने का प्रयास किया जाना चाहिये कि मेरा बेटा-बेटी जो विद्यालय पढ़ने गया है वह वास्तव में विद्यालय में है या उसके बाहर असामाजिक तत्वों के साथ आवारा गिरी तो नहीं कर रहा है।
आज के समय में तो दुर्भाग्य की बात यह देखने को मिलती है कि बाप,चाचा,छोटा-बड़ा भाई बिना लाज-शर्म के एक दूसरे से खैनी-गुटका भीखमंगे की तरह मांग कर खाने का प्रयास कर रहा है,हाय रे शिक्षा,हाय रे समाज,हाय रे नैतिकता।आज समाज के आने वाले पीढ़ी के लोग इन सारी चीजों को देखकर शर्मसार तथा मर्माहत हो रहे हैं। हमलोग तो शिक्षक हैं,बच्चों को शिक्षा बाँटना हमारा परम कर्तव्य है,लेकिन जब ज्ञान का दीप जलाने वाले भी अपने उन नौनिहाल बच्चों के सामने इन सभी चीजों से अपने को नहीं रोक पाते हैं तो आपका कल का आने वाले भविष्य का क्या होगा इसका क्या कहना?
अंत में मेरा कहना है कि आज के समय में यदि आने वाली पीढ़ी के स्वर्णिम भविष्य का निर्माण करना चाहते हैं तो अपने उन किशोरों की जो कि अपने मार्ग से विचलित हो रहे हैं,कुशल राह दिखाने का प्रयास करें।यदि आप आने वाले भविष्य को”नशा का लत”से मुक्ति दिलाना चाहते हैं नहीं तो ठीक वैसा ही होगा जैसे “नशा का जो हुआ शिकार उजड़ा उसका घर परिवार”वाली बात अवश्यमभावी है।

आलेख साभार-श्री विमल कुमार “विनोद” प्रभारी प्रधानाध्यापक राज्य संपोषित उच्च विद्यालय पंजवारा
बांका(बिहार

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