स्वामी विवेकानंद के संदेश उपयोगी व ग्राह्य- गिरीन्द्र मोहन झा

स्वामी विवेकानंद का आज निर्वाण दिवस है। आज ही के दिन 4 जुलाई, 1902 को उन्होंने अपने देह का त्याग कर दिया । आज के दिन छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों के लिए उपयोगी उनके कुछ उपदेशों को मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ:

  1. आप पहले स्वावलम्बी और सच्चरित्र बनें । शिक्षा का प्रथम उद्देश्य चरित्र-गठन है। जैसा कि मुंशी प्रेमचंद ने लिखा है, ‘स्वावलंबन ही सभी गुणों का मूल है ।’
  2. ‘उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक रुको मत ।’
    मेरे विचार से, प्रतिदिन का लक्ष्य होना चाहिए। आप जिस कक्षा में हैं, उसमें आप प्रतिदिन के कार्यों की सूची बनाकर उसे उसी दिन पूर्ण करने का प्रयत्न करें।टालमटोल करना(Procrastination) विद्यार्थियों का सबसे बड़ा शत्रु है। ‘बाद में कर लेंगे’ और ‘कल कर लेंगे’ ये दोनों वाक्य विद्यार्थियों का शत्रु होता है। आज कितनी पढ़ाई करनी है और कितना पुनराभ्यास करना है, उसकी सूची बनाकर उसे उसी दिन पूर्ण करना चाहिए । प्रतिदिन के लक्ष्य को पूर्ण करने में आप सफल हो गये, तो आप बड़े से बड़े लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। टालमटोल पर मेरे पिताजी कहा करते थे, ‘Tomorrow tomorrow, but never comes tomorrow. ‘ साथ ही विद्यार्थियों को शिक्षक के द्वारा पढ़ाये गये तथ्यों को उसी दिन घर पर जाकर देखना चाहिए, इससे वह बहुत दिनों तक याद रहता है ।
  3. मानव मन की शक्ति असीम है, जितना यह एकाग्र होता है, उतना ही एक लक्ष्य पर केंद्रित होता है। यही प्रकृति का रहस्य है ।
  4. ‘मन को जो चीज प्रिय लगती है, मन उस पर एकाग्र हो जाता है, मन जिस पर एकाग्र होता है, वही चीज प्रिय लगने लगता है। एक माँ को अपना कुरूप पुत्र संसार में सबसे अधिक सुन्दर और प्रिय होता है, क्योंकि वह उस पर अपने मन को एकाग्र करती है ।’
    आपको पढ़ाई या किसी कार्य में मन नहीं लगता है, तो धीरे-धीरे सतत अभ्यास के द्वारा उसमें मन की एकाग्रता बढ़ती है और आपको पढ़ाई या अन्य किसी कार्य में मन लगने लगता है, फिर आप उसमें बेहतर करने लगते हैं ।
  5. बड़ी-बड़ी योजनाएँ मत बनाओ, छोटी योजना बनाकर कार्य का आरंभ कर दो ।
  6. ‘किसी दूसरे के आदर्श पर चलने की अपेक्षा अपने आदर्श पर चलना श्रेयस्कर होता है। अपने आदर्श पर चलने वाला व्यक्ति यदि एक हजार गलतियाँ करता है, तो बिना आदर्श के पचास हजार गलतियाँ करेगा ।
  7. किसी भी व्यक्ति अथवा राष्ट्र का कायरतापूर्ण अनुकरण उचित नहीं। सीखना चाहिए सबों से, किन्तु अपने वैशिष्ट्य को बचाते हुए, अपनी ही प्रकृति और अपने ही भावों से मेरे आदरणीय प्राध्यापक डा0 कृपाशंकर ओझा सर का कहना है, ‘किसी एक के पथ पर चलना, किसी एक के विचारों के अनुसार चलना अनुकरण है। सबकी अच्छी और सार बातों को लेकर अपना कुछ देना शोध है ।’
  8. तुममें प्रभु का अंश है। हम सब उसी अनंत ब्रह्माग्नि की चिनगारियाँ हैं। अपने आप को कभी दुर्बल, अपवित्र और हीन कभी मत समझो। तुम कुछ भी कर सकते हो।
  9. ‘मैं दुर्बल हूँ’ कहने से दुर्बलता नहीं मिटेगी। इसके लिए बल के चिंतन की आवश्यकता है। रोगों के लिए औषधि की आवश्यकता होती है ।
  10. यदि तुम बार-बार स्वयं को ‘कुछ नहीं’ कहोगे तो तुम कुछ नहीं ही हो जाओगे। पर, कहोगे मुझमें सबकुछ है, मैं सबकुछ कर सकता हूँ ।
  11. पहले अपने आप को मनुष्य बनाओ। जगदंबा से यही प्रार्थना करो, ‘माँ ! मनुष्य बना दो ।’
  12. जो किया, तुमने अच्छा किया और आगे और अच्छा करो ।
  13. प्राचीन धर्म कहता है, नास्तिक वह है, जो ईश्वर में विश्वास नहीं रखता, नया धर्म कहता है, नास्तिक वह है, जो स्वयं में विश्वास नहीं रखता। पहले अपने आप में विश्वास रखो, फिर ईश्वर में। ईश्वर में आस्था रखते हुए अपना कार्य करते चलो ।
  14. गीता-पाठ करने की अपेक्षा फुटबॉल खेलते हुए स्वर्ग के नजदीक पहुँच जाओगे। अध्यात्म की ओर जाने के लिए पहले शरीर और मन का मजबूत होना और मन की एकाग्रता आवश्यक है ।
  15. छात्रों को वैज्ञानिक प्रतिभासम्पन्न और जिज्ञासु प्रवृत्ति का होना चाहिए ।
  16. परस्पर सहयोग-भावना, जरूरतमंदों की मदद करना, न करने की स्थिति में नम्रता आदि।
  17. निंदा सुनना तक महापाप है। यदि कोई करे तो नम्रतापूर्वक हट जाओ ।
  18. प्राचीन ऋषि कहते थे, जो पहले से है, उसे हम नष्ट करने नहीं आये हैं, उसे हम पूर्ण बनाने आये हैं।
  19. तापस नहीं, स्वाभाविक बनो।(श्रीकृष्ण-वचन उन्हीं के द्वारा कहा गया)
  20. कर्त्तव्य-दृष्टि से राजा और नौकर में कोई भेद नहीं ।(श्रीकृष्ण-वचन)
  21. अपने दिव्य स्वरूप(असली स्वरूप) को पहचानो ।
  22. निंदा- स्तुति आदि शब्दों के गुलाम मत बनो ।
  23. अपने आप में मस्त रहो। धुन के पक्के बनो। अपने आदर्श पर चलते रहो ।
  24. सदा स्वयं में स्थित रहो।(आत्मभाव में स्थित रहो।)
  25. प्रत्येक कर्त्तव्य पवित्र हैं। कर्त्तव्यनिष्ठा भगवद्पूजा का सर्वोत्कृष्ट रूप है।
  26. शिक्षा जहाँ से भी मिले, चरणों में बैठकर ले लो ।
  27. हमेशा सभी में अच्छा देखने का प्रयत्न करो न कि किसी के दोष को देखो और न ही किसी के दोष की चर्चा करो। किसी के दोष दिखाकर तुम उसका भला नहीं कर सकते। तुम उसके गुण को दिखा दो, वह खुद ही बेहतर होकर और बेहतर करते चला जाएगा ।
  28. यदि आप किसी बच्चे को मूर्ख और गधा कहेंगे तो वह मूर्ख और गधा ही हो जाएगा ।
  29. यदि आप गुफा के भीतर भी कोई अपराध, दुष्कर्म करते हैं तो समय आने पर वह आप ही पर चक्रवृद्धि ब्याज के साथ टूटेगा। यदि आप कोई सत्कर्म करते हैं, तो वह कई देवताओं की शक्ति लेकर आपकी सहायता करेगा ।
  30. आप जीवन की मुश्किलों से जितना भागेंगे, वह उतना ही आपको भगाएँगी। एक बार आप डटकर खड़े हो जाएँगे, वह अपने आप भाग जाएँगी ।
  31. सभी व्यक्तियों में प्रभु के अंश को देखो ।
  32. तृण से लेकर ब्रह्मा तक में वही ब्रह्म व्याप्त है ।
  33. हमें चाहिए तीव्र कर्मण्यता और अनंत शांत भाव।
  34. उद्योगी बनो। उद्योग से सारे दोष छूट जाते हैं । उद्योगिनम्पुरषसिंहमुपैति लक्ष्मी:। अर्थात् उद्योगी मनुष्यों को ही लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।(भर्तृहरि)
  35. अपना पुरुषार्थ प्रकट करो ।
  36. यदि तुम कहीं असफल होते हो, तो दूसरे पर दोषारोपण मत करो। अपनी कमी देखो और उसमें सुधार करो । एक बार और प्रयास करो ।
  37. A constant practice is better than ton of tall talks. निरंतर अभ्यास से कठिन से कठिन कार्य को सरल बनाया जा सकता है ।
  38. परमात्मा से माँगने योग्य वस्तु केवल सद्बुद्धि है ।
  39. छोटे-से-छोटे कार्यों को तल्लीनता और निष्ठा के साथ करो। इससे तुम्हारी कार्य-शक्ति बढ़ेगी। हो सकता है, एक दिन तुम्हें समाज का प्रतिष्ठित कार्य करने का अवसर मिले ।
  40. “किसी पद के योग्य जो व्यक्ति नहीं है, वह उस पद पर अधिक दिनों तक नहीं टिक सकता।” आप अपने जीवन में जो भी पद प्राप्त करना चाहते हैं, पहले उस पद के योग्य खुद को बनाइए। आपकी योग्यता और आपका निरंतर प्रयास आपको बेहतर स्थान पर ले जा सकता है ।
  41. यदि तुम संसार में आये हो, तो कुछ अमिट चिह्न छोड़कर जाओ, अन्यथा तुममें और वृक्षादि में क्या अन्तर रह जाएगा? वे भी जन्म लेते हैं, बढ़ते हैं और परिणाम को प्राप्त हो जाते हैं ।
    तुलसी आये जगत् में, जग हँसे तुम रोय। ऐसी करनी कर चलो, तुम हंसो जग रोय।।( गोस्वामी तुलसीदास)
  42. काम-वासना, क्रोध, मद, लोभ आदि चीजों में उलझोगे, तो श्रेष्ठ विषयों पर कैसे चिंतन करोगे?
  43. व्यक्ति अपने संस्कार का गुलाम होता है। अच्छा संस्कार आपको जल्दी बुरा नहीं करने देता और बुरा संस्कार जल्दी अच्छा नहीं करने देता। निरंतर सद्विचार और सत्कर्म से ही अच्छे संस्कार का निर्माण होता है। क्रिया-शक्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण चिंतन होता है। चिंतन बहुस्थायी होता है ।
  44. लगातार पवित्र विचार करते रहो, बुरे संस्कारों को दबाने का यही उपाय है।
  45. किसी की श्रद्धा नष्ट करने का प्रयत्न मत करो ।
  46. अपने शरीर को मजबूत और मन को बलवान बनाओ । संसार में पद्मपत्र(कमल के पत्ते) के समान जीवन जीयो।
  47. खूब धनार्जन करो, पर उसमें आसक्त मत होओ। कुछ धन दुर्दिन के लिए बचाकर रखो। आदि ।
  48. सुख-दुख, जय-पराजय आदि में समभाव रखो । स्थितप्रज्ञ बनो ।
  49. राग-द्वेष, जातिवाद-सम्प्रदायवाद आदि सभी संकीर्णताओं से सदा ऊपर रहो।
  50. हमें महावीर के जीवन को अपना आदर्श बनाना होगा । कैसे वे श्रीराम का स्मरण करते ही सिन्धु लाँघ गये थे । वे परम जितेन्द्रिय हैं। एक तरफ बल में सिंहविक्रम के समान, दूसरी ओर महान सेवादर्श के प्रतीक। सफलता के दो ही कारण हैं- अटूट ब्रह्मचर्य(सच्चरित्र होना) और गुरु की आज्ञा का सर्वतोभावेन पालन ।
  51. सफलता के दो ही मंत्र हैं -दृढ़संकल्प मेहनत और आत्मविश्वास।
  52. ‘In a day, when you don’t come across any problems- you can be sure that you are travelling in the wrong path.’
  53. कोई मनुष्य चाहे वह एक भी दर्शनशास्त्र न पढ़ा हो, किसी प्रकार के ईश्वर में विश्वास न किया हो और न करता हो, चाहे उसने अपने जीवन भर में एक बार भी प्रार्थना न की हो, परन्तु केवल सत्कार्यों की शक्ति द्वारा उस अवस्था में पहुँच गया है, जहाँ वह दूसरों के लिए अपना जीवन और सबकुछ उत्सर्ग करने को तैयार रहता है, तो हमें समझना चाहिए कि वह उसी लक्ष्य को पहुँच गया है, जहाँ भक्त अपनी उपासना द्वारा तथा दार्शनिक अपने ज्ञान द्वारा पहुँचता है। इस प्रकार तुम देखते हो कि ज्ञानी, कर्मी और भक्त, तीनों एक ही स्थान पर पहुँचते हैं और वह स्थान है- आत्मत्याग। लोगों के दर्शन और धर्म में कितना ही भेद क्यों न हो, जो व्यक्ति अपना जीवन दूसरों के लिए अर्पित करने को उद्यत रहता है, उसके प्रति समग्र मानवता श्रद्धा और भक्ति से नत हो जाती है ।
  54. आध्यात्मिक व्यक्ति पर बगल में हो रहे विघ्नदायी घटनाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है ।
  55. जो कुछ भी तुम्हें शरीर, मन और बुद्धि से दुर्बल बनाए, उसे विष के समान त्याग कर दो ।
  56. हम जितना ही अध्ययन करते हैं, उतना ही हमें अपनी अज्ञानता का आभास होता है ।
  57. अनुभव द्वारा प्राप्त ज्ञान ही यथार्थ ज्ञान है ।
  58. शिक्षकों के लिए: एक आदर्श शिक्षक अपने आप को हजारों में बाँटने की क्षमता रखता है। वह विद्यार्थी के भीतर ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित करता है। वह उसके मस्तिष्क के बंद दरवाजे खोल देता है। किसी की श्रद्धा नष्ट मत करो, उनके वचनों का संकलन वाली पुस्तक, शिक्षा का आदर्श और व्यक्तित्व का विकास ये तीनों पुस्तकें मुझे बहुत अच्छी लगीं। अन्य शिक्षकों को भी इसका लाभ उठाना चाहिए।
  59. गिरीन्द्र मोहन झा
  60. +2 शिक्षक+ 2 भागीरथ उच्च विद्यालय चैनपुर, पड़री, सहरसा
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