बाल पुस्तकालय की अवधारणा
प्रत्येक पुस्तक एक मिसाल होती है। यह ज्ञान का भंडार होती है। एक जमाना था कि जब समुद्र की गहराईयों में गोता लगाना हो या नील गगन में विचरण करना हो या फिर आसमान को छूना हो, सभी पुस्तकों को पढ़कर संभव था। पुस्तकों में कल्पना की दुनिया अलग है। यदि कोई जासूसी उपन्यास पढ़ रहा हो तो मानो थोड़ा देर के लिए खुद को देश भक्त जासूस समझ रहा हो और दुश्मन देशों में तबाही मचा रहा हो। पुस्तकों की जगह आज को मोबाइल, आईफोन, लैपटॉप,टैब तथा टैबलेट ने ले लिया है। कंप्यूटर की दुनिया सतरंगी है, मनोरंजन ही मनोरंजन है। ज्ञान लेना हो तो गूगल बाबा है न! लेकिन किताबों की दुनिया टिकाऊ है। उसे अलमीरा में सजा कर रख सकते हैं। कुच्छ भूल जाने पर फिर उसे उलट-पलट कर देख सकते हैं। पुस्तकें हमसे बात करती हैं। उसका कवर पेज हो या उस पर लिखे उसके नाम, लोगों को खींचते हैं। रंग-बिरंगी बाल पुस्तकें तो बच्चों को तितलियों की तरह लुभाती हैं। करीब सभी विद्यालयों में बच्चों के लिए पुस्तकें भेजी जाती रही हैं जिनमें से कुछ पुस्तकों में केवल चित्र या चित्र कथा है। उद्देश्य है बच्चों में सुनने बोलने का विकास पहले हो जाए। वहां शिक्षकों की भूमिका विशिष्ट होती है। बच्चों के लिए कौन-सा वातावरण रचा जाए कि वे मुखर हों। चित्र देखकर वह बोल पड़े। वह उसका स्वत: स्फूर्त प्रक्रिया हो एवं मौलिक हो तो जाहिर सी बात है कि बच्चे अपनी भाषा या आंचलिक भाषा में बात करेंगे जिसे हमें मान देना होगा। उनकी कल्पनाशीलता एवं रचनात्मकता पटल पर आनी चाहिए; सब कुछ परनानी की कहानी या स्टीरियोटाइप न हो। हालांकि नाना-नानी तथा परनाना-परनानी जब बच्चे को बगल में सुला कर कहानी कहती थे तो बच्चे हां-हां बीच में कहते थे। उससे पता चलता था कि बच्चे कहानी को रेस्पॉन्ड कर रहे हैं। बच्चे कहानी कहते-कहते सो जाते फिर हां-हां कहना भी बंद हो जाता, ये थी परंपरा। वह भाषा विकास के लिए बहुत अच्छा था। आज तो बच्चों को अभिभावकों के द्वारा दादा-दादी से भी दूर रखा जाता है। आधुनिक युग में आत्मीय लगाव में थोड़ी कमी आई है। अब सीखने-सिखाने का ऐसा माहौल कहां है? बाल पुस्तकालय में सीखने-सिखाने का वातावरण को शिक्षकों के द्वारा रचना होगा। फिर बच्चे बाल पुस्तकालय के उचित वातावरण में उचित शिक्षण कौशल के द्वारा पढ़ना और लिखना भी सीख लेंगे। लेकिन बच्चों में सभी भाषा कौशल लाने हेतु अलग-अलग रणनीतियां एवं गतिविधियां करानी होगी ताकि बच्चे सहज ढंग से उसे ग्रहण कर सकें। पुस्तकालय में बच्चों को पुस्तक स्वयं चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसके लिए कक्षा में ही दीवारों से लगाकर रस्सी टांगकर उस पर किताबें लटकाइ जा सकती है ताकि सभी पुस्तकें बच्चों के पहुंच में हो; लेकिन जब बच्चे पुस्तकालय की पुस्तकों का अध्ययन कर हों तो उन्हें वाच जरूर करना चाहिए। भाषा, गणित, विज्ञान तथा अन्य विषयों में पाठ्य पुस्तकों की अवधारणाओं को बाल पुस्तकालय की पुस्तकों से जोड़कर पठन-पाठन पर ध्यान देना शिक्षकों का काम है। यदि हम पाठ्य पुस्तकों की अवधारणाओं को पुस्तकालय के पुस्तकों में ढूंढते हैं तो वे अवधारणाएं आत्मसात हो जाती हैं। यदि पुस्तकालय कक्ष की व्यवस्था अलग है तो वहां रैक, राउंड टेबल एवं अच्छे फर्नीचर हों, अंदर का वातावरण बाल लुभावन हो, पुस्तके पूरी तरह उनके पहुंच में हो। बच्चे उसका आनंद लेकर पढ़ सकें। पुस्तकालय की दीवारों पर बच्चों के द्वारा बनाए गए चित्र या रचना प्रदर्शित हो, इसकी समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। इस बात का ख्याल रखा जाना चाहिए कि जब बच्चे पुस्तकालय में पढ़ रहे हों तो कम से कम एक शिक्षक पुस्तकालय में जरूर होनी चाहिए ताकि वे बच्चों की रुचि को समझकर सीखने-सिखाने की रणनीतियां बना सके। बच्चों के बीच कहानियां,कविताओं चुटकुलों, चित्रों तथा हंसगुल्ले पर सामूहिक चर्चा होनी चाहिए। बच्चे उसे अपनी भाषा में व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र हों। पुस्तकालय में चर्चा से एक-दूसरे को लाभ होगा। भाषा एवं साहित्य में बड़े बच्चों को भी रुचि बढ़ेगी। बड़े बच्चों के द्वारा कहानियों का नाटक रूपांतरण तथा उसका संवाद लेखन भी किया जा सकता है। कविता का भाव या सारांश बतलाया जा सकता है। कहानियों को कविता में भी रूपांतरित किया जा सकता है। कविता को हाव-भाव से पढ़ा जा सकता है। माहौल सीखने सिखाने का बन जाए तो पुस्तकालय में ही अनेकों गतिविधियां करवाई जा सकती हैं। किसी एकांकी का मंचन भी छोटे स्तर पर किया जा सकता है। यह प्रदर्शन बड़ा धांसू हो सकेगा और बच्चे अनायास ही बहुत कुछ जान चुके होंगे जो शायद साधारण वर्ग-कक्ष में न सीख सके होंगे। कभी-कभी विभिन्न प्रतियोगिता में यथा, कहानी लेखन, कविता रचना, गाना सुनना, भाषण प्रतियोगिता आदि का आयोजन करवाया जा सकता है। इसमें स्लो साउंड सिस्टम का उपयोग भी किया जाना चाहिए। ‘आंखों देखा हाल सुनाने’ के अनुभव को उसकी भाषा में व्यक्त करने का अवसर प्रदान करना चाहिए,उदाहरण के तौर पर, यदि गांव में किसी की बकरी ने बच्चा दिया हो तो उसकी भी चर्चा हो। अभी जूनियर और सीनियर बच्चों के लिए बाल पुस्तकालय में मैगजीन भी आ रही है। ‘उड़ान’ और ‘चुनमुन’ बहुत उपयोगी है इसमें कोर्स स्टडी से संबंधित आलेख भी होते हैं, विभिन्न प्रकार की विधाएं; सामान्य ज्ञान पहेलियों से लेकर विज्ञान एवं गणित उसमें होता है। मैगजीन में समझाने का एप्रोच ग्राह्य है। पाठ्य पुस्तकों की अपेक्षा उसमें आसान तरकीबें है। बिहार शिक्षा परियोजना परिषद द्वारा प्रकाशित ‘उड़ान’ में रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, जीव विज्ञान, गणित,विज्ञान क्विज, अंग्रेजी, कंप्यूटर,अंतरिक्ष यात्री, ओलंपियाड, आईआईटी फाउंडेशन, नीट फाऊंडेशन, रोबोटिक्स, लॉजिकल रीजनिंग तथा पर्यावरण कौशल प्रशिक्षण संबंधी आलेखों की भरमार है। ‘चुनमुन’ पत्रिका में मोटे अक्षर / चित्र, कहानी, कविता, सुडोकू, आओ मिलान करें, गतिविधियां, सामान्य ज्ञान, ज्ञान का भंडार, रोचक तथ्य, पजल वर्कशीट, चित्र देखकर लिखो कहानी, रोचक आलेख, मोरल स्टोरी, गोलू भोलू और हर घर तिरंगा, गणित, क्रॉसवर्ड, फाइंड 10 डिफरेंस इन द पिक्चर हैं, फिर अंत में उत्तरमाला भी होता है। कुछ चीजें बच्चे स्वयं पढ़कर सीखेंगे और कुछ चीजों को शिक्षकों के द्वारा वातावरण निर्माण कर सीखाना होगा। गतिविधि आधारित शिक्षण-अधिगम प्रदान करना होगा। अब बच्चों में मासिक पत्रिका पढ़ने के प्रति रुचि जगाने का कार्य शिक्षकों का है। शिक्षक स्वयं भी पत्र-पत्रिकाएं पढ़ें और अपने अनुभव को बच्चों से बांटने का प्रबंध करें। ऐसा बिल्कुल न हो कि मासिक पत्रिका धरी की धरी रह जाए। बाल पुस्तकालय की पुस्तकें कई जगह धूल फांक रहु हैं। अनुश्रवण में देखा गया है कि पुस्तकों का बंडल अभी खुला ही नहीं है। बिहार शिक्षा परियोजना परिषद द्वारा एक समृद्ध बाल पुस्तकालय की परिकल्पना है। पुस्तकों में प्रेमचंद का ‘ईदगाह’ मीर नजावत अली का ‘विज्ञान के उपहार’ निलेश कुमार का ‘ऐसे बनता है बादल ऐसे बरसता है पानी’ रवींद्रनाथ टैगोर का ‘काबुलीवाला’ किलकारी से प्रकाशित ‘बच्चों की दुनिया’ निशांत जैन की पुस्तक शादी बंदर मामा की राजेश गुप्ता का ‘तेनालीराम की कथाएं’ राज आर्यन का ‘रसगुल्ला का पेड़’ दीपक कुमार कलिता का ‘प्यारा दोस्त: योगेंद्र नाथ शर्मा अरुण का ‘धैर्य की जीत’,’चबर चबर (गिजुभाई बधेका),हाथ मिलाओ’ (मलयश्री हाश्मी),एकलव्य प्रकाशन की अनेकों पुस्तकें पुस्तकालय को समृद्ध बनती हैं। कुछ किताबें ऐसी हैं जिसमें कहानी हिंदी और अंग्रेजी, दोनों में हैं। यह बच्चों को ट्रांसलेशन सीखाने में बहुत उपयोगी है। ‘मक्खीचूस (The Miserly Father), गधे ने ओढ़ी बाघ की खाल (The Donkey in a Tiger Skin), पेड़ क्या है (What is a tree); ये सभी दो ही पृष्ठ में हैं जिसमें एक या दो पंक्तियां ही हैं लेकिन पिक्टोरियल है और जबरदस्त है जो बच्चों के लिए प्रभावोत्पादक है।
मो.ज़ाहिद हुसैन
प्रधानाध्यापक
उत्क्रमित मध्य विद्यालय मलह बिगहा,चण्डी,नालन्दा

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