शीर्षक :- अद्भुत अभियंता- उमेश कुमार सिन्
संसार में कला का होना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, क्योंकि कहा गया है—
साहित्यसंगीतकलाविहीनः साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः।
तृणं न खादन्नपि जीवमानस्तद्भागधेयं परमं पशूनाम्।।
आज 17 सितंबर, 2026 है—विश्वकर्मा पूजा। यह पर्व कन्या संक्रांति के अवसर पर होता है, जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है।
भगवान विश्वकर्मा को हिंदू धर्म में सृष्टि का पहला शिल्पकार, वास्तुकार और इंजीनियर माना जाता है। हमारे देश के अनुभवों के अनुसार, तीन गुणवान लोगों पर बहुत कुछ निर्भर करता है—इंजीनियर, लॉयर और डॉक्टर। इन लोगों की भूमिका हमारे दैनिक जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
श्री विश्वकर्मा जी को अस्त्र-शस्त्र, महल और दिव्य नगरियों का निर्माता कहा जाता है।
इनकी उत्पत्ति के बारे में मुझे यह जानकारी मिली कि पौराणिक कथाओं और ग्रंथों, जैसे विष्णु पुराण और मत्स्य पुराण, में भगवान विश्वकर्मा की उत्पत्ति के संबंध में धार्मिक मान्यताएँ मिलती हैं। कहा जाता है कि सृष्टि के निर्माण के समय भगवान ब्रह्मा ने अपनी नाभि या मानस-विचार से विश्वकर्मा को प्रकट किया। ब्रह्माजी ने उन्हें संपूर्ण ब्रह्मांड के निर्माण, उसकी रूपरेखा और शिल्पकला की जिम्मेदारी सौंपी।
भगवान विश्वकर्मा की अद्भुत महिमा उनके द्वारा किए गए अद्भुत निर्माणों से जुड़ी है। कहा गया है—
अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः।
यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते।।
सृष्टि के निर्माण के अंतर्गत भगवान ब्रह्मा जी ने रचना तो कर दी, मगर लाजवाब और सुंदर व्यवस्थित रूप देने के लिए उन्हें एक महान शिल्पकार और इंजीनियर की आवश्यकता थी। वेदों और पुराणों के अनुसार, विश्वकर्मा के बिना संसार की रचना पूरी नहीं हो सकती थी, क्योंकि वे ही आदि शिल्पी, फर्स्ट इंजीनियर हैं।
मैंने पढ़ा है कि भगवान विश्वकर्मा जी की अत्यंत सुंदर पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्य देव से हुआ था। सूर्य देव की गर्मी और तेज इतनी अधिक थी कि संज्ञा उसे सहन नहीं कर पाती थीं। वह झुलसने लगीं। यह बात जब पिता भगवान विश्वकर्मा को पता चली, तो उन्हें चिंता हुई। अपनी बेटी के कष्ट को दूर करने के लिए उन्होंने सूर्य देव को एक यंत्र पर चढ़ाया। इससे सूर्य देव का रूप शांत और सुन्दर हो गया, जिससे संज्ञा का जीवन सुखी हुआ।
भगवान विश्वकर्मा ने सूर्य देव के शरीर से जो दिव्य और अत्यंत शक्तिशाली तेज काटकर निकाला था, उसे उन्होंने व्यर्थ नहीं जाने दिया। उस तेज से ब्रह्मांड के सबसे विनाशकारी और अजेय अस्त्र-शस्त्र बनाए गए।
भगवान विष्णु के लिए सुदर्शन चक्र, भगवान शिव के लिए त्रिशूल, देवराज इंद्र के लिए वज्र, जिसे दधीचि की हड्डियों के साथ मिलाकर बनाया गया, तथा धनपति कुबेर के लिए पुष्पक विमान आदि बनाए गए, जो देवताओं के लिए महत्वपूर्ण थे।
जिस तरह हनुमान जी अपने प्रभु श्रीराम के परम भक्त बनकर संकट हरने के कारण संकटमोचन कहलाए, उसी तरह भगवान विश्वकर्मा भी देवताओं के संकटमोचक बने।
जब-जब देवताओं पर असुरों और राक्षसों ने आक्रमण किया और उनके महल नष्ट किए, तब-तब भगवान विश्वकर्मा ने ही आगे आकर देवताओं के लिए स्वर्गलोक, अमरावती नगरी और विभिन्न सुरक्षित नगरों का निर्माण किया।
लंका कहें, द्वारका कहें या हो इंद्रप्रस्थ—संसार के हर दिव्य और भव्य निर्माण के लिए उन्हीं की बुद्धिमता थी।
आपने देखा होगा, दूरदर्शन पर दुर्योधन को आगे बढ़ते हुए इंद्रप्रस्थ के महल में पांडवों के यहाँ एक ऐसी जगह दिखाई गई थी, जहाँ फर्श को इतने चमकदार पत्थरों और मणियों से बनाया गया था कि वह बिल्कुल शांत बहते हुए पानी की झील जैसा दिखाई देता था। दुर्योधन को लगा कि वहाँ पानी है, इसलिए वह पानी से बचने के लिए अपने कपड़े ऊपर उठा लेता है, जबकि वह ठोस जमीन थी।
आगे बढ़ने पर साफ पानी का कुंड था। उस कुंड की कारीगरी ऐसी थी कि वह बिल्कुल ठोस और सूखी जमीन जैसा दिखाई देता था। दुर्योधन को लगा कि यह भी सूखी जमीन है और छपाक! की आवाज के साथ वह उसमें गिर पड़ा।
सही कह रहा हूँ—हँसिए मत! 😄
ये सब कारीगरी भगवान विश्वकर्मा की ही देन थी। भगवान श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी और महल भी इस तरह की काबिलियत से बनाए गए कि कोई भी दुश्मन उस पर आसानी से चढ़ाई नहीं कर सकता था।
रामायण में भगवान श्रीराम की सेना के लिए पुल बाँधने में दो भाई नल और नील थे। वे भी भगवान विश्वकर्मा के ही पुत्र माने जाते हैं। भगवान विश्वकर्मा के संरक्षण में ही उन्होंने एक ऋषि के आशीर्वाद कहें या शाप के कारण यह विद्या प्राप्त की थी।
भगवान विश्वकर्मा की सबसे निराली और प्रसिद्ध कथाएँ वेद-पुराणों में मिलती हैं। वे सभी कहानियाँ हमें बताती हैं कि वे किस तरह सृष्टि के निर्माता बने और देवताओं के कष्टों को दूर करने के लिए अपनी कला का उपयोग किया।
अंत में हम यह स्पष्ट देख रहे हैं कि केवल पराक्रम दिखाने से संसार सुंदर नहीं बनता। विनाश और युद्ध से संसार नहीं चल सकता, बल्कि निर्माण, कला, विज्ञान और शिल्पकला ही इस संसार को सुंदर और प्रगतिशील बनाती है। इसलिए हर कारीगर, इंजीनियर और वैज्ञानिक उन्हें अपना गुरु मानता है और उनके चरणों में पुष्पमाला, धूप, दीप, फल-फूल आदि अर्पित कर आशीर्वाद माँगता है।
साहित्य और कला में हम भी एक श्रमिक हैं। इसलिए हमें भी आज के इस दिवस-विशेष पर अद्भुत इंजीनियर, भगवान श्री विश्वकर्मा, जो विश्व की शिल्पकला के शिल्पी हैं, निम्नलिखित श्लोकों से नमन करना चाहिए—
विश्वकर्मन् नमस्तुभ्यं विश्वात्मा विश्वसंभव।
शिल्पाचार्य महाबुद्धे विधातः सर्वकर्मणाम्।।
जय श्री विश्वकर्मा! 🙏
विश्वकर्मा पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ।
स्वरचित, रचनाकार:-
उमेश कुमार सिन्हा निर्देशक
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल
तुलसी पथ लालापुल रघुनाथपुर
अंचल – ब्रह्मपुर, (बाबा श्री ब्रह्मेश्वर नाथ धाम )
जिला – बक्सर
