भारतरत्न मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया————————————भारतरत्न मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया आधुनिक भारत के उन महान् निर्माताओं में से एक हैं,जिन्होंने अपनी अभियांत्रिकीय प्रतिभा, कठोर अनुशासन, अद्वितीय राष्ट्रभक्ति और बेदाग ईमानदारी से देश को एक नयी दिशा दी।उनका जन्म कर्नाटक के कोलार जिले के मुद्देनहल्ली गांव में 15 सितम्बर 1861 ईस्वी को हुआ था।उनके अद्वितीय योगदान के कारण ही उनके जन्मदिन को पूरे देश में “अभियंता दिवस ” के रूप में बड़े गर्व के साथ मनाया जाता है।उनके पिता श्री निवासशास्त्री एक संस्कृत विद्वान और आयुर्वेद चिकित्सक थे और माता वेंकचममा एक गृहिणी थी।उन्होंने अपनीशुरूआती शिक्षा चिक्का बल्ला पुर और बेंगलुरू से पूरी की।मद्रास विश्वविद्यालय से कला स्नातक और पुणे के साइंस कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की। मैसूर साम्राज्य और भारत गणराज्य के लिए उनकी सेवाओं के लिए उन्हें 1955 में भारत सरकार द्वारा भारतरत्न से सम्मानित किया गया। उन्हें लंदन स्थित इंस्टीट्यूशन और सिविल इंजीनियर्स से मानद सदस्यता बंगलौर स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान से फेलोशिप और भारत के आठ विश्वविद्यालयों से डी 0एस सी 0, एल 0एल 0डी 0, डी लिट सहित कई मानद उपाधियां प्राप्त हुई।वे भारतीय विज्ञान कांग्रेस के1923 सत्र के अध्यक्ष थे।भारत के डाक विभाग ने 1960 में एक डाक टिकट जारी किया।वे एक कट्टर शाकाहारी थे,जो कभी मांस या अंडा नहीं खाते थे।विश्वेश्वरैया का बचपन अत्यधिक अभावों में बीता।जब वे 12 वर्ष के थे तब उनके पिता का आकस्मिक निधन हो गया।घर की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई।वे उच्च शिक्षा के लिए बेंगलुरु आ गए, लेकिन उनके पास रहने के लिए छत और खाने के लिये पैसे नहीं थे। ऐसी कठिन परिस्थिति यों में भी उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने एक स्थानीय परिवार के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया।वे दिनभर कॉलेज में पढ़ाई करते, शाम को बच्चों को पढ़ाते और रात में सड़क पर लगें म्युनिसिपैलिटी के लैंप पोस्ट की रोशनी के नीचे बैठकर अपनी पढ़ाई पूरी करते थे पैसे बचाने के लिए वे कई बार मीलों पैदल चलते थे ।उनकी इसी एकाग्रता और लगन का परिणाम था कि उन्होंने पुणे के इंजीनियरिंग की परीक्षा में पूरी मुम्बई यूनिवर्सिटी में प्रथम स्थान प्राप्त किया।यह बात प्रेरणा देती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत हों,यदि मन में दृढ़ संकल्प हो और अटूट इच्छा शक्ति हो,तो अभाव भी सफलता का रास्ता नहीं रोक सकते ।उनके जीवन का सबसे प्रसिद्ध और विस्मयकारी प्रसंग है,जो उनकी एकाग्रता और ध्वनि – विज्ञान की गहरी समझ को दर्शाता है।बात उस समय की है,जब देश पर अंग्रेजों का शासन था।एक बार विश्वेश्वरैया अन्य सह यात्रियों जिनमें अधिकांश अंग्रेज थे के साथ एक रेलगाड़ी में सफर कर रहे थे।उनके साधारण पहनावे और साँवले रंग को देखकर डिब्बे में बैठे अंग्रेज उनका मजाक उड़ा रहे थे।और उन्हें अनपढ़ समझ रहे थे।विश्वेश्वरैया शांत मुद्रा में अपनी आँखें बन्द किए बैठे थे। अचानक वे अपनी सीट से उठे और दौड़कर ट्रेन की आपातकालीन जंजीर खींच दी। ट्रेन झटके के साथ रुक गई।सभी यात्री और गार्ड उनपर गुस्सा होने लगे और जंजीर खींचने का कारण पूछने लगे।विश्वेश्वरैया ने शांत स्वर में कहा यहाँ से लगभग एक या डेढ़ फर्लांग आगे रेल की पटरी टूटी हुई है।गार्ड और इंजीनियरों ने जब आगे जाकर पटरी का निरीक्षण किया,तो वे हैरान रह गए। सचमुच आगे की पटरी – नट बोल्ट खुले हुए थे और पटरी अपनी जगह से हटी हुई थी।जब अंग्रेजों ने उनसे पूछा कि उन्हें बैठे बैठे यह कैसे पता चला,तो उन्होंने उत्तर दिया,जब ट्रेन चल रही थी, तो पहियों की ध्वनि से एक नियमित लय आ रही थी। अचानक उस लय की गति और गूंज में मामूली सा बदलाव आया। कंपन की इस सूक्ष्म विकृति से मुझे आभास हो गया कि आगे की पटरी सुरक्षित नहीं है।यह सुनकर सभी अंग्रेजों ने शर्मिंदा होकर उनसे माफी मांगी और उनकी कुशाग्र बुद्धि का लोहा माना।यह बात प्रेरणा देती है कि अपने काम के प्रति इतनी गहरी एकाग्रता और संवेदनशीलता होनी चाहिए कि आस पास के वातावरण में होनेवाला एक छोटा सा बदलाव भी आपकी नजरों से न बच सके ।उनके लिए समय ही भगवान था ।वे अपने पूरे जीवन में कभी भी किसी बैठक, समारोह या काम के लिए एक मिनट भी लेट नहीं हुए ।उनकी यह बात यह सीख देती है कि अनुशासन समय का सम्मान ही किसी भी व्यक्ति को साधारण से असाधारण बनाता है।वे101 वर्ष केज लंबा, ऊर्जावान और पूर्ण सक्रिय जीवन जिया। वृद्धावस्था भी उनकी कार्य क्षमता को कभी कम नहीं कर सकी ।वस्तुतः सर एम0 विश्वेश्वरैया केवल पत्थरों, सीमेन्ट और लोहे की संरचनाएं बनाने वाले इंजीनियर नहीं थे, बल्कि वे “आधुनिक भारत के विश्वकर्मा ” और एक दूरदर्शी राष्ट्र – निर्माता थे।प्रेषक – हर्ष नारायण दास फारबिसगंज,अररिया,बिहार,854318
भरत रत्न मोक्षमुंडम.. हर्ष नारायण दास
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