लेखनी चलती है—न चाहने पर भी। कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं, जिनका स्मरण आते ही लेखनी स्वयं उनके व्यक्तित्व, कृतित्व, उपलब्धियों और विशेषताओं पर प्रकाश डालने को आतुर हो उठती है। ऐसा लगता है कि जिन महान व्यक्तित्वों ने अपने कर्मों से राष्ट्र, समाज और साहित्य को दिशा दी हो, उनके प्रति कुछ शब्द लिखे बिना लेखनी का ठहर जाना संभव ही नहीं।

मेरे स्मरण में दो हरिश्चंद्र आते हैं—एक राजा हरिश्चंद्र और दूसरे भारतेंदु हरिश्चंद्र। राजा हरिश्चंद्र सत्य, वचनबद्धता और धर्म के प्रति अपनी अडिग निष्ठा के लिए युगों-युगों से स्मरण किए जाते हैं। वहीं भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के ऐसे युगप्रवर्तक साहित्यकार थे, जिन्होंने अपनी लेखनी से हिंदी साहित्य को नई दिशा और नई चेतना प्रदान की। उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक भी कहा जाता है।
आज 9 सितंबर है। यही वह दिन है, जब 9 सितंबर 1850 को काशी (वाराणसी)में हिंदी साहित्य के इस महान महारथी, कवि, लेखक, नाटककार और पत्रकार भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म हुआ था।
भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रतिभा बचपन से ही असाधारण थी। कहा जाता है कि मात्र पाँच वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पिता को एक दोहा सुनाया—
“लै ब्यौड़ा ठाड़े भये, श्री अनिरुद्ध सुजान।
बाणासुर की सैन्य को, हनन लगे भगवान्॥”
अपने छोटे पुत्र के मुख से इतनी कम आयु में काव्य-सृजन सुनकर उनके पिता गोपालचंद्र, जो ‘गिरिधरदास’ नाम से ब्रजभाषा में कविता लिखते थे, अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने बालक की प्रतिभा को पहचानकर उसे आशीर्वाद दिया कि वह आगे चलकर अपना और अपने परिवार का नाम अवश्य रोशन करेगा। साहित्यिक वातावरण और पिता की काव्य-साधना ने बालक हरिश्चंद्र के भीतर साहित्य-सृजन की प्रेरणा को और प्रबल किया। उनकी माता का नाम पार्वती देवी था।
दुर्भाग्यवश, बचपन में ही उनके सिर से माता-पिता का साया उठ गया। कम उम्र में माता-पिता को खो देने के बावजूद उन्होंने परिस्थितियों को अपनी प्रतिभा के मार्ग में बाधा नहीं बनने दिया। औपचारिक शिक्षा सीमित रही, लेकिन उनकी अद्भुत ग्रहणशीलता और स्वाध्याय ने उन्हें अनेक भाषाओं और विविध विषयों का ज्ञान प्रदान किया।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने बहुत कम आयु में ही साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय दिया। कविता हो, नाटक हो, निबंध हो, पत्रकारिता हो या अनुवाद—उन्होंने अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया।
उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘अंधेर नगरी’, ‘भारत दुर्दशा’, ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ और ‘नीलदेवी’ जैसे नाटक विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कविता के क्षेत्र में भी उन्होंने अनेक रचनाएँ कीं। पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने साहित्य के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के प्रति जागरूकता का भाव जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। ‘कवि वचन सुधा’, ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ और ‘बाल बोधिनी’ जैसी पत्रिकाओं से उनका पत्रकारिता संबंधी योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।
भारतेंदु जी केवल साहित्य रचने वाले साहित्यकार नहीं थे; वे अपने समय की सामाजिक और राष्ट्रीय परिस्थितियों को समझने वाले जागरूक चिंतक भी थे। उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर उसे समाज-जागरण और राष्ट्रीय चेतना का माध्यम बनाया। उनकी लेखनी में देश की स्थिति, समाज की विसंगतियाँ, जनजीवन की समस्याएँ और सुधार की आवश्यकता स्पष्ट दिखाई देती है।
उन्होंने हिंदी साहित्य को एक नई दिशा दी। उनके साहित्य में आधुनिक चेतना, राष्ट्रीय भावना और सामाजिक सरोकारों का समावेश दिखाई देता है। हिंदी गद्य को व्यवस्थित और प्रभावशाली बनाने तथा खड़ी बोली को साहित्यिक अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाने में भी उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
यही कारण है कि हिंदी साहित्य के इतिहास में 1857 से 1900 ईस्वी तक के कालखंड को ‘भारतेंदु युग’ के नाम से जाना जाता है। किसी साहित्यकार के नाम पर पूरे साहित्यिक कालखंड का नाम पड़ जाना अपने आप में उनकी असाधारण साहित्यिक प्रतिष्ठा और प्रभाव का प्रमाण है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र के जीवन की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह है कि उन्होंने लगभग 34 वर्षों के अत्यंत छोटे जीवनकाल में साहित्य की अनेक विधाओं को समृद्ध किया। अल्पायु उनके साहित्यिक कर्म के सामने छोटी पड़ गई। उन्होंने जितना लिखा, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने हिंदी साहित्य को सोचने, जागने और समाज से जुड़ने की एक नई दृष्टि दी।
मेरे लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र का स्मरण केवल एक महान साहित्यकार का स्मरण नहीं है। यह उस लेखनी को नमन है, जिसने अपने समय की पीड़ा को पहचाना, समाज को आईना दिखाया और साहित्य को राष्ट्र एवं जनजीवन से जोड़ने का साहस किया।
आज जब हम उनकी जयंती पर उन्हें स्मरण करते हैं, तो यह भी अनुभव होता है कि महान व्यक्तित्व अपने जीवन की लंबाई से नहीं, बल्कि अपने कर्मों की व्यापकता से महान बनते हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जीवन के छोटे से कालखंड में ऐसा साहित्यिक प्रकाश फैलाया, जिसकी आभा आज भी हिंदी साहित्य के आकाश में दिखाई देती है।
शायद यही कारण है कि कुछ व्यक्तित्वों को स्मरण करते ही लेखनी स्वयं चल पड़ती है—और तब उसे रोकना नहीं, बल्कि उनके कृतित्व को शब्दों में नमन करना ही उचित लगता है।
स्वरचित, रचनाकार:-
उमेश कुमार सिन्हा निर्देशक
डिसेंट एकैडमी वाया स्कूल रघुनाथपुर
बिहार सरकार द्वारा पूर्णतः स्वीकृत विद्यालय
अंचल :- ब्रह्मपुर , जिला – बक्सर