गद्य गुँजन Uncategorized सहसा स्मरण में आती वह चहचहाहट… उमेश कुमार सिन्हा

सहसा स्मरण में आती वह चहचहाहट… उमेश कुमार सिन्हा



बसंत का समय था। पेड़ों पर पतझड़ की आहट सुनाई देने लगी थी और कहीं-कहीं हरे पत्ते अपनी उपस्थिति का एहसास कराने लगे थे। मौसम सुहावना था। एक दिन न जाने क्यों मेरी नींद प्रातः पाँच बजे अचानक खुल गई।मैं ऊपर की मंजिल पर बने अपने शयनकक्ष में था। कमरे के चारों ओर खिड़कियाँ थीं और उनमें लगे शीशों से बाहर का दृश्य साफ दिखाई देता था। तभी खिड़की के समीप से एक चिड़िया की मधुर चहचहाहट सुनाई दी। उसकी आवाज इतनी मीठी थी, मानो वह मुझसे कुछ कह रही हो।कुछ देर सुनने के बाद मैं फिर सो गया। शायद उसे मेरा दोबारा सो जाना अच्छा नहीं लगा। थोड़ी देर बाद उसकी चहचहाहट और तेज हो गई। ऐसा लगा, जैसे वह कह रही हो—‘अब उठो, सवेरा हो गया है।’मैं उठ गया और सुबह के अपने कार्यों में लग गया। कुछ देर बाद जब खिड़की की ओर देखा तो वह जा चुकी थी।अगले दिन फिर ठीक पाँच बजे वही मधुर आवाज सुनाई दी। अब उसकी चहचहाहट मेरे लिए केवल किसी पक्षी की आवाज नहीं रह गई थी; वह मेरे लिए सुबह का मधुर संगीत बन चुकी थी। जब भी मैं जागकर फिर से सोने का प्रयास करता, उसकी आवाज और तेज हो जाती। मानो वह मेरी दिनचर्या की छोटी-सी प्रहरी हो और कह रही हो—‘सोते मत रहो, उठो और अपने कर्म-पथ पर चलो।’मेरे मन में जिज्ञासा हुई कि आखिर उसका रैन-बसेरा कहाँ है?अपने कमरे के समीप ही मुझे एक सुंदर वृक्ष दिखाई दिया। उसी वृक्ष पर उसने अपना छोटा-सा घोंसला बना रखा था। घोंसले में उसके दो प्यारे बच्चे थे। उन्हें देखकर मेरे मन में कौतूहल जागा। मैंने सोचा, क्यों न उनके कुछ दृश्य कैमरे में कैद कर लूँ?दूर से मैंने कैमरे में उनकी गतिविधियाँ रिकॉर्ड कीं। उन्हें कोई आपत्ति नहीं हुई। लेकिन जैसे ही मैं उनके बच्चों के थोड़ा पास गया, वह चिड़िया अचानक बेचैन हो उठी। उसने तेजी से मेरी उँगली पर चोंच मारी और मुझे पीछे हटने का संकेत दिया।उस क्षण मुझे ऐसा लगा, मानो वह कह रही हो—‘ये मेरे बच्चे हैं, इनके पास मत आओ।’मैं उसकी ममता समझ गया। उसके उस छोटे-से प्रतिरोध में अपने बच्चों के प्रति एक माँ का विशाल प्रेम दिखाई दे रहा था। मैंने फिर कभी उसके घोंसले और बच्चों के पास जाने का प्रयास नहीं किया।अगली सुबह फिर ठीक पाँच बजे उसकी वही मधुर चहचहाहट सुनाई दी। उसकी आवाज में जैसे कोई शुभ संदेश छिपा था। मन को एक अजीब-सा सुकून मिलने लगा था। वह खिड़की के पास निडर होकर बैठती और चहचहाती रहती। मुझे लगता, जैसे वह रोज मुझे जगाने आती हो—‘उठो, सुबह हो गई है। अपना काम देखो, अपने कर्म-पथ पर आगे बढ़ो।’एक दिन मन में आया कि क्यों न उसे पकड़कर अपने पास रख लूँ। लेकिन तभी मन में एक कविता की पंक्तियाँ कौंध गईं—पंछी को उन्मुक्त आकाश ही प्रिय होता है। पिंजरे का बंधन उसके स्वभाव के विरुद्ध है।मैं रुक गया।तब मुझे एहसास हुआ कि जिसे मैं अपने पास रखना चाहता हूँ, उसके लिए मेरी निकटता ही शायद बंधन बन जाएगी। उसका सौंदर्य उसके स्वतंत्र पंखों में है, उसकी खुशी खुले आकाश में उड़ने में है और उसकी पहचान उसकी स्वच्छंद चहचहाहट में है।मैंने उसे पकड़ने का विचार छोड़ दिया।आज भी जब प्रातःकाल पाँच बजे किसी चिड़िया की मधुर चहचहाहट सुनाई देती है, तो मुझे उस छोटी-सी चिड़िया की याद आ जाती है। वह कुछ दिनों तक मेरी खिड़की पर आती रही, लेकिन उन दिनों में उसने मुझे एक बड़ी सीख दे दी—प्रेम का अर्थ किसी को अपने पास बाँधकर रखना नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्रता का सम्मान करना भी है।वह चिड़िया तो उड़ गई, पर उसकी चहचहाहट आज भी मेरी स्मृतियों की खिड़की पर बैठी हुई है।वह चिड़िया जो मुझे जगाती थी lस्वरचित संस्मरण गद्य रचनाकार :-उमेश कुमार सिन्हा ‘ निर्देशक ‘डिसेंट एकैडमी वाया स्कूल रघुनाथपुरअंचल – ब्रह्मपुर , जिला – बक्सर

Sahasa smran

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