चिराग-विजय सिंह "नीलकण्ठ" - गद्य गुँजन

चिराग-विजय सिंह “नीलकण्ठ”

चिराग

          एक छोटे से गाँव के मैदान में एक छोटा सा रंगमंच तैयार था। उद्घोसक महोदय न थकते हुए लगातार लोगों को आवाज लगा रहे थे। छोटे बच्चे इधर-उधर उछल-कूद कर रहे थे क्योंकि उन्हें तो बस मौज-मस्ती से मतलब था। मंच पर क्या होने वाला है उसे क्या? बड़े बुजुर्ग धीरे-धीरे आपस में बातें करते मैदान की ओर बढ़ रहे थे। महिलाएँ और बहन-बेटियाँ भी मैदान की ओर जाती दिख रही थी। सबों के चेहरे पर एक अजीब खुशी थी। प्रतिदिन मजदूरी पर जाने वाले और अपने खेतों में अनाज उपजाने वाले किसान भी इस उत्सव में भाग लेने के लिए काम पर नहीं जाने का कोई न कोई बहाना बनाकर मैदान में पहुँच रहे थे। पशु-पक्षी भी आश्चर्यचकित होकर गाँव के लोगों का चेहरा निहारते हुए मूक प्रश्न पूछ रहे थे कि आज सभी कौन सा उत्सव मनाने की फिराक में है? मुखिया जी ग्रामीण धोती कुर्ते पहन एक सफेद गमछे के साथ मंच की ओर बढ़ रहे थे। ऐसा लग रहा था कि बिना तिथि का कोई खास त्योहार मनाने की तैयारी की जा रही है। चाय दुकानदार मुफ्त का चाय पीने के लिए सबों से आग्रह कर रहे थे और बच्चों को मनचाही चाॅकलेट भी दे रहे थे। बड़े किसानों के द्वारा दूध, शरबत और लस्सी की व्यवस्था की गई थी। सब मिलाकर खुशनूमा और उत्सवी माहौल का साम्राज्य फैला दिख रहा था। सभी उस समय की प्रतीक्षा में थे कि कब और किस गाड़ी से गाँव के नाम को देश के पटल पर अंकित करने वाले “चिराग” का आगमन होगा और जिसे देख कर सब को गर्व होगा। कोई “चिराग” से हाथ मिलाना चाहते थे, तो कोई अँगुली पकड़ना, कोई उनकी ओर देखकर मुस्कुराना चाहते थे तो कोई अपनी हाथ पर कुछ लिखवाना चाहते थे।
तभी दो चम-चमाती कार मैदान में घुसी जिसमें एक से तीन लोग बाहर आए और दूसरे से कुछ सुरक्षा बल। तीनों मंच की ओर गए और मंचासीन हुए। कार के मैदान में प्रवेश करने से लेकर तीनों आगंतुकों के मंचासीन होने तक तालियों की गड़-गड़ाहट होती रही। उद्घोसक महोदय की आवाज दोगुणी हो गई और “चिराग” की बड़ाई में पुल बाँधने लगे। फिर एक बूढ़ी माता कार से उतरी और धीरे-धीरे मंच पर बैठे नव आगंतुकों के बगल में जाकर बैठ गई। तभी कुछ बुजुर्गों ने आवाज लगाई देखो-देखो मंगली ताई मंच पर है। बहुत दिनों के बाद दिखाई दे रही है। सबकी आँखों में एक ही प्रश्न था यह सब क्या है? तभी गाँव के मुखिया उठ खड़े हुए और नव आगंतुकों का परिचय देने लगे। मंच पर बैठी महिला हम सबके प्रेरणा प्रतीक मंगली ताई है जिनके बगल में हमारे जिले के डी.एम. साहब, एस.एस.पी. साहब और एस.पी. साहब बैठे हैं। आपलोगों को पता है कि हमारे डी.एम. साहब अपने ही गाँव के “मंगली ताई” का पुत्र “चिराग” है जिन्होंने चिराग की तरह निरंतर जलने वाले आग की ज्वाला के रूप में गाँव को ही नहीं पूरे जिले को प्रकाशित कर दिया है। यह सुनकर उपस्थित सभी तालियाँ बजाने लगे और “चिराग जिंदाबाद” “मंगली ताई जिंदाबाद” के नारों से पूरा मैदान गूंज उठा।
इसके बाद “चिराग” ने माईक पकड़ी और वहाँ उपस्थित गाँव वासियों से आर्शिवाद लेकर अपने बचपन से लेकर डी.एम. बनने तक की कहानी सुना डाली। उन्होंने कहा कि माँ कह रही थी कि जब मैं तीन माह का था तभी मेरे पिताजी का देहांत हो गया था फिर गाँव के ही हिम्मत लाल काका ने हम दोनों माँ-बेटे को पास के शहर में ले जाकर अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ काम पर रखवा दिये और पास ही झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों के बगल में अपने संबंधियों की मदद से एक झोपड़ी भी बनवा दी। मैं वहीं बड़ा हुआ। जब छः वर्ष का हुआ तब माँ ने एक सरकारी विद्यालय में मेरा नामांकन करवा दिया जहाँ बिना पुस्तक के ही कक्षा दो तक की पढ़ाई की। माँ किसी तरह कॉपी और कलम खरीद देती थी। तीसरी कक्षा से मैं अपनी कक्षा के बच्चों से पुस्तकें माँग कर पढ़ने लगा। चौथी कक्षा जाते-जाते मुझे अपनी गरीबी का अहसास होने लगा लेकिन मैंने शिक्षा से ही गरीबी दूर करने का मन ही मन में संकल्प ले रखा था। किसी तरह दिन-रात मेहनत कर मैट्रिक की परीक्षा पास की और कॉलेज में पढ़ाई शुरू की। चुँकि मैैं पढ़ने में तेज था इसलिए कॉलेज के छात्र मुझसे ईर्ष्या रखते और विनती करने पर भी पुस्तकें पढ़ने को नहीं देते। इसके लिए मैं हर दिन पुरानी किताब कॉपी खरीदने वाले की दुकान पर जाता और उनका कुछ काम कर देता जिसके बदले में वह मुझे मेरी जरूरत की एक पुस्तक दे देता। इस तरह मैंने बी.ए. तक की पढ़ाई पूरी की। उसी दुकानदार चाचा की मदद से मैं उस दुकान से मैट्रिक के बाद से ही एक पुरानी प्रतियोगिता दर्पण हर सप्ताह लेता जिसे पढ़कर वापस कर देता। एक पेपर विक्रेता से भी दोस्ती हो गई थी क्योंकि वह भी गरीब था हमारे घर के पास ही उसकी भी झोपड़ी थी। हर शाम मैं उसके पास बचे दो-तीन तरह के समाचार पत्रों को लेकर पढता और जो मुख्य बातें होती तथा सम सामयिक घटनाओं को अपनी कॉपी में लिख लेता। बी.ए. के बाद मैंने आई.ए.एस. की प्रतियोगिता पास करने का संकल्प लिया। चुुँकि कॉलेज नहीं जाता था इसलिए दिन-भर प्रतियोगिता दर्पण पुस्तक मेें लिखी गई बातों को प्रतिदिन पढ़ने लगा। एक दिन अखबार में एक पुस्तकालय के बारे मेें पढ़़ा। अगले दिन मैं वहाँ पहुँच गया और पुस्तकालय अध्यक्ष से पुस्तक पढ़ने की इच्छा प्रकट की। पुुस्तकालय अध्यक्ष भी हिम्मत काका की तरह ही थे। उन्होंने मुझे पुस्तकालय में बैठकर पुस्तक पढ़ने की इजाजत दे दी। फिर क्या था हर प्रकार की पुस्तकों को पढ़ने लगा। पुस्तक में जो महत्वपूर्ण बातेें होती उसे साथ में रखेे काॅॅॅॅपी में लिख लेताा और घर आकर पढ़ते रहता था। पुस्तकालय से बच्चों द्वारा ली गई और जमा की गई पुस्तकों के बारे में लिखने का काम भी करता जिससे अध्यक्ष महोदय निःशुल्क पुस्तक पढ़ने देते। इस तरह दिन-रात मेहनत कर मैंने आई.ए.एस की परीक्षा उत्तीर्ण की और आज आप सबके सामने हूँ। ऐसा कहते ही फिर तालियाँ बजने लगी। यहाँ उपस्थित सभी बच्चों से मेरा कहना है कि यदि दृढ़ संकल्पित होकर कोई भी लक्ष्य पाना चाहेंगे तो वह अवश्य मिलेगा। इसके लिए आने वाली कठिनाइयों का सामना करना ही पड़ेगा। जब आप कठिनाइयों से लड़ने लगेंगे तो बड़ी से बड़ी समस्या भी छोटी लगेगी। सच्ची लगन और मेहनत से हर मुकाम हासिल होता है।
अंत में उन्होंने हिम्मत काका, पुस्तक की खरीद-बिक्री करने वाले दुकानदार, पेपर बेचने वाले लड़के और पुस्तकालय अध्यक्ष सबों को मंच पर बुलाया और अपनी माँ के साथ-साथ सबों का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया फिर उन्हें गले भी लगाया और कहा कि हर जरूरतमंदों के लिए इन जैसे लोंगों से दुनियाँ भरी पड़ी है और सबों का अभिवादन कर कार में बैठ गए।

विजय सिंह नीलकण्ठ


सदस्य टीओबी टीम 
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3 thoughts on “चिराग-विजय सिंह “नीलकण्ठ”

  1. अति सुंदर सारगर्भित रचना इस भाव को प्रेरित करती हुई कि कोशिश करने वालो की हार नहीं होती

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