दादी का राष्ट्रीय प्रेम-लवली कुमारी - गद्य गुँजन

दादी का राष्ट्रीय प्रेम-लवली कुमारी

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दादी का राष्ट्रीय प्रेम

          आज सुबह से ही काफी चहल-पहल थी। सबों के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ रही थी क्योंकि कल 15 अगस्त आजादी का दिन जो है। सभी तैयारी में जुट गए थे। सूरज के घर के पास एक बैंक था। जहां झंडा फहराया जाता था। सूरज दादी से अपनी मन की बात कर रहा था कि दादी कल झंडा फहराएंगे और जलेबी खाएंगे, राष्ट्रगान भी करेंगे। कितना मजा आएगा अपने दोस्तों के साथ घूमेंगे। तरह-तरह की बातें करते-करते वह सो गया पर जैसे ही रात होने को आई कि अचानक बहुत जोरों की बारिश शुरू हो गई। इतनी बारिश हुई कि पूरे रास्ते में कमर तक पानी भर गया। रात भर बारिश होने के बाबजुद सुबह में भी बारिश थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। सुबह जब सूरज ने देखा अपनी गली का हाल तो बहुत उदास हो गया, पर दादी ने समझाया कि उदास क्यों होते हो मैनेजर साहब आएंगे और झंडा फहराएंगे, अभी समय नहीं हुआ है। पर मैनेजर साहब तो आए जरूर लेकिन रास्ते का नजारा देखकर उनकी हिम्मत नहीं हुई आगे बढ़ने की। इधर दादी और सूरज इंतजार कर रहे थे कि मैनेजर साहब तो आएंगे ही पर नहीं आए।अब दादी से रहा नहीं गया। वो ठीक से चल भी नहीं सकती थी। उसने किसी को कुछ बताए बिना ही अपनी बैसाखी के सहारे एक कागज का झंडा लेकर झंडोत्तोलन की जगह पहुंच गई और पानी में खड़ी होकर “सारे जहां से अच्छा हिंदुस्ता हमारा” बोलकर जोर-जोर से नारा लगाने लगी। सभी अपने-अपने घरों से देखने लगे कि इस पानी में कौन नारा लगा रहा है। सूरज भी देख रहा था पर वह पानी में नहीं जा सकता था क्योंकि वह बहुत छोटा था और डूब जाता पर वह काफी खुश था कि उसकी दादी झंडा हाथ में लेकर नारा लगा रही है। यह देखकर सभी पानी में उतर आए यहां तक कि मैनेजर भी। उन्होंने आते ही दादी को झुककर प्रणाम किया और माफी भी मांगी और कहा कि सचमुच पानी को देखकर मैं अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ रहा था। इतनी हिम्मत मुझमें नहीं थी लेकिन आपने मुझे यह सीख याद दिला दी। फिर दादी के हाथ से ही इस कार्य का शुभारंभ किया गया। सूरज भी अपने पापा के गोद में “जय हिंद जय भारत बोलकर” ताली बजा रहा था।

लवली कुमारी
उत्क्रमित मध्य विद्यालय अनुपनगर
बारसोई, कटिहार

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