देवदूत-विजय सिंह नीलकण्ठ - गद्य गुँजन

देवदूत-विजय सिंह नीलकण्ठ

देवदूत

         एक बार शाम के समय ट्यूशन पढ़ाकर आ रहा था तो देखा कि एक ठेला वाला अपने ठेले को जोर से खींच रहा है लेकिन ठेला चढ़ाई पर नहीं चढ़ने की मानो कसम खाकर खड़ा था। ऐसा लग रहा था जैसे ठेले के पहिये को किसी अदृश्य चुंबक ने इस प्रकार जकड़ा हो जैसे उससे दो प्रेमियों की तरह आपस में प्रेम हो गया हो। मैं अपनी साईकिल रोककर जैसे हीं उतरा तो देखा कि ठेलावाला मेरी ओर हीं निहार रहा है। मुझे लगा कि बेचारा मुझसे मूक भाषा में सहायता मांग रहा हो। मैं वहाँ पहुँचा और ठेले के पीछे हाथ लगाकर धक्का देने लगा और ठेले वाले से कहा भाई थोड़ा जोर लगाओ। फिर दोनों के कठिन मेहनत और जोर लगाने से ठेला सड़क पर चढ़ गई। इस बात से मैं काफी खुश था कि आज मैंने कठिनाई में फँसे किसी व्यक्ति की मदद की। कुछ दिन के बाद मैं भी उसी सड़क से आ रहा था जिस समय लगभग शाम के 8:00 बज रहे होंगे तभी सामने के एक ट्रक के हेड लाइट मेरे आँखों पर पड़ी और मैं साइकिल लेकर हर-बड़ा कर गिर पड़ा और बेहोश हो गया। जब आँखें खुली तो मैंने अपने आप को एक बड़ी नाली में पाया। साइकिल मेरे ऊपर थी मैं नीचे। सीने में भी दर्द हो रहा था। साइकिल के हैंडल से सीने में चोट लग गई थी जिस कारण शायद दर्द महसूस हो रहा था। धीरे-धीरे मैं उठकर बैठा, फिर दीवार पकड़कर खड़ा हुआ और साइकिल को भी खड़ा किया।अब दूसरे से मदद की आशा लगाए मैं नाली में पड़ा हुआ था। आवाज लगाने पर भी कोई सुन नहीं रहे थे क्योंकि लगातार ट्रकों का आना-जाना लगा हुआ रहता। लगभग 15 से 20 मिनट के बाद एक ट्रक वहाँ आकर खड़ी हुई जिससे ड्राइवर और खलासी दोनों निकले। नाला इतना गहरा था कि वे अपना हाथ बढ़ाकर मुझे खींच नहीं सकते थे। फिर उन लोगों ने कहा कि साहस कर आप अपने साइकिल को दीवार से लगाइए और उस पर चढ़कर हाथ बढ़ाइए, मैंने ऐसा ही किया। फिर उन लोगों ने मेरा हाथ पकड़कर मुझे नाले से बाहर निकाल दिया। फिर ट्रक से एक लंबा सा राॅड निकाला और उसके हुक के सहारे से साइकिल भी बाहर निकाल दिया और कुशल क्षेम पूछकर वहाँ से चले गए। चुँकि मेरे सीने में दर्द हो रहा था इसलिए मैं थोड़ी देर के लिए सड़क किनारे ही आराम करने की सोची, तभी मैंने देखा कि वही ठेला वाला खाली ठेला लेकर मेरे पास आकर खड़ा हुआ और बोलने लगा कि भैया आपको कहीं अधिक चोट तो नहीं लगी। मैंने कहा नहीं भाई बस थोड़ा लगा है कुछ देर के बाद अपने ठीक हो जाएगा। फिर उसने कहा कि नहीं भैया चलिए मैं आपको आपके डेरा तक पहुँचा देता हूँ। फिर उसने मेरी साइकिल को अपने ठेले पर लाद लिया और मुझे भी अपने ठेले पर बैठा कर मेरे घर तक पहुँचा दिया। मैंने उसे कुछ पैसे भी देना चाहा लेकिन उसने लेने से मना कर दिया और मेरे द्वारा की गई मदद की याद दिलाई। मैं यह सोचने पर मजबूर हो गया कि मदद करने वालों की मदद करने ईश्वर किसी न किसी बहाने दूत भेज हीं देते हैं। मैंने उसे बहुत-बहुत धन्यवाद दिया और चाय नास्ता कराकर विदा किया।

विजय सिंह नीलकण्ठ 
सदस्य टीओबी टीम 

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