गद्य गुँजन दिवस विशेष डॉ. राही मासूम रज़ा :हर्ष नारायण दास

डॉ. राही मासूम रज़ा :हर्ष नारायण दास



हिन्दी के प्रसिद्ध उपन्यासकार, शायर और पटकथा लेखक राही मासूम रज़ा जी का जन्म 1 सितम्बर 1927 को गाजीपुर के गंगौली गाँव में हुआ था।इनके पिता का नाम बशीर हसन आबिदी तथा माता का नाम नफीसा बेगम था। राही मासूम जी की आरंभिक शिक्षा गाज़ीपुर में ही हुई।एक बार जब वे बीमार पड़े तो स्कूल जाना छूट गया।घर में पड़े – पड़े घर में मौजूद सारी किताबें पढ़ गए। किस्सों से उनका दिल बहलाने के लिए एक मुलाजिम कल्लू काका भी रखे गए थे उन्होंने बतलाया कि कल्लू काका नही होते तो उन्होंने शायद कोई कहानी न लिखी होती।आगे की पढ़ाई अलीगढ़ से हुई जहां अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उर्दू में “तिलिस्म ए होशरुबा ” पर पीएच 0डी 0 की उपाधि प्राप्त की।इसके बाद वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बन गए। अलीगढ़ से उनका बेहद लगाव रहा। उन्होंने लिखा था कि उनकी तीन माएं थीं, नफीसा बेगम, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी और गंगा जो गंगोली में बहती थी। अलीगढ़ में ही नय्यरा से मिले जो उनकी जीवनसंगिनी बनी। वहीं पर वे कम्युनिस्ट भी हो गए थे। वे वास्तव में सेकुलर दृष्टिकोण रखते थे।
लेखन का आरम्भ उन्होंने शायरी से किया था और शेरो – सुखन में एक मुकाम भी पाने लगे थे।फिर शायरी छोड़ दिये और गद्य लिखने लगे।वे एक साथ कई चीजें लिखा करते थे। शाहिद अख्तर, आफाक हैदर और आफ़ताब नासिरी उनके ही अलग – अलग नाम थे जो उन दिनों अलीगढ़ में रूमानी और जासूसी नोवेल में चर्चा पा रहे थे। इसके बाद वे अलीगढ़। छोड़ बम्बई चले गए। फिल्मों से उन्हें शुरू से ही आकर्षण रहा था। बम्बई में संघर्ष लम्बा चला।उस वक्त उनकी मदद धरमवीर भारती और कमलेश्वर ने की।बाद में बी 0 आर 0 चोपड़ा और राज खोसला की दोस्ती काम आई जो उन्हें फ़िल्में देने लगे थे।बी0 आर 0 चोपड़ा ने धारावाहिक पटकथा का लेखन उनसे कराया। बम्बई उसके लिए साहित्यिक लेखन के दृष्टिकोण से उर्वर रही है जहां उन्होंने “आधा गाँव,दिल एक सादा कागज, ओस की बूंद, हिम्मत जौनपुरी जैसे उपन्यास लिखे।ये सभी कृतियाँ हिन्दी में थी। इससे पहले वे उर्दू में नज़्म और ग़ज़ल लिखते रहे थे। उन्होंने उर्दू में एक महाकाव्य भी लिखा था जो बाद में हिन्दी में”क्रांति कथा ” शीर्षक से छपी।टोपी शुक्ला,कटरा बि आरज़ू, मुहब्बत के शिवा, असंतोष के दिन,नीम का पेड़ उनके अन्य उपन्यास हैं।
नया साल, मौजे – गुल,मौजे – सबा,रकसे मय अजनबी शहर के अजनबी रास्ते, गरीबे शहर उनके प्रमुख उर्दू काव्य – संग्रह हैं। उनकी उर्दू कविताओं के हिन्दी अनुवाद, मैं एक फेरी वाला, शीशे के मकाँ वाले, गरीबे शहर संकलनों में प्रकाशित किया गया है।
देश में निकला होगा चांद,उनकी बेहद लोकिप्रय नज़्म है, जिसे जगदीश सिंह और चित्रा सिंह ने पहली बार गाया था ,प्रस्तुत है उनकी ये गीत –
हम तो हैं परदेश में देश में निकला होगा चांद।
अपनी रात की छत पर कितना तन्हा होगा चाँद।
जिन आँखों में काजल बनकर तेरी काली रात।
उन आंखों में आँसू का एक कतरा होगा चाँद ।
रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर।
आँगन वाले नीम में जाकर अटका होगा चांद।।
चांद बिना हरदिन यूँ बिता,जैसे युग बीते।
मेरे बिना किस हाल में होगा, कैसा होगा चाँद।
उन्होंने कई फिल्मों और धारावाहिक के लिए पटकथा और संवाद लेखन किया था ।
मै तुलसी तेरे आँगन की ” फिल्म की पटकथा के लिए उन्हें फिल्म फेयर का पुरस्कार मिला था। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित किया था।
उनकी गजलें और नज्में गंगा जमुनी तहजीब, मानवीय संवेदनाओं और गहरे दर्द को बयाँ करती है। उनकी कुछ लोकप्रिय फिल्में – आलाप, कर्ज़, हम पांच,डिस्को डाँसर, अनोखा रिश्ता,लम्हे और आईना, मिली,गोलमाल, बैराग,जुदाई, सरगम,जूली,,आखरी रास्ता इत्यादि हैं।
1976 में फिल्म मिली के लिए सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखन का पुरस्कार मिला था ।उन्हें 300 से अधिक फिल्में और 100 से अधिक धारावाहिक के लिए बेशुमार शोहरत मिली।
उनकी एक गजल –
सब डरते हैं आज हवश के इस इस सहरा में बोले कौन ।
इश्क तराजू तो है, लेकिन इस पे दिलों को तौले कौन ।
सारा नगर तो ख्वाबों की मैयत लेकर श्मशान गया ।
दिल की दुकानें बंद पड़ी है,पर ये दुकानें खोले कौन।
काली रात के मुँह से टपके जाने वाली शुभ का जुनून।
सच तो यही है, लेकिन यारो यह कड़वा सच बोले कौन ।
हमने दिल का सागर मथ कर काढ़ा तो कुछ अमृत आयी,
लेकिन जहर के प्यालों में यह अमृत घोले कौन।।
लोग अपनों के ख़ून में नहाकर
गीता और कुरआन पढ़े,
प्यार की बोली याद है किसको,प्यार की बोली बोले कौन।।
इस महान उपन्यासकार, नग़मा निगार,संवाद लेखक का निधन 15 मार्च 1992 को 64 वर्ष की आयु में हो गया।

प्रेषक-हर्ष नारायण दास
पूर्व प्रधानाध्यापक
मध्य विद्यालयघीवहा
फारबिसगंज, अररिया,बिहार।

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