हमारी प्रकृति एक शिक्षक-हर्ष नारायण दास - गद्य गुँजन

हमारी प्रकृति एक शिक्षक-हर्ष नारायण दास

Harshnarayan

हमारी प्रकृति एक शिक्षक

          प्रकृति इस दुनिया को भगवान का दिया हुआ एक अद्भुत उपहार है। हर सुबह एक सुन्दर सूर्योदय होता है, एक खूबसूरत साफ नीला आकाश और इसमें चमकते इन्द्रधनुष को कैसे भुलाया जा सकता है।झरने से गिरते हुए मनमोहक पानी सेल्फी लेने को मजबूर कर देते हैं। प्रकृति खुशी और आनन्द का भण्डार है। यह दिव्य सौन्दर्य का एक शाश्वत स्रोत है।प्रकृति परमात्मा का स्वरूप है। प्रकृति की विशाल सुन्दरता मानवता के लिए आशीर्वाद से भरी है। प्रकृति हमारे जीवन को वास्तविक आनन्द, अच्छाइयाँ और खुशियों से भर देती है। आजतक मनुष्य ने जो कुछ हासिल किया है वह सब प्रकृति से सीखकर ही किया है।

प्रकृति हमें निष्काम भाव से सेवा करने का संदेश देती है। जैसे सूर्य बिना किसी लाभ के अपनी ऊर्जा समस्त प्राणी जगत को देता है और सम्पूर्ण प्राणी जगत उसकी निष्काम भाव से सेवा का अनुशरण करते हैं और इस क्रम को आगे ले जाते हैं।

पृथ्वी- पृथ्वी से धैर्य और क्षमा की शिक्षा लेनी चाहिए।हम मनुष्य पृथ्वी पर अनेक उत्पात, आघात करते हैं, किन्तु वह न तो किसी से प्रतिशोध लेती है और न ही शोकातुर होकर विलाप करती है। अतः मानव को यह सीख मिलती है कि धीर पुरुष को दूसरे की विवशता को समझकर न तो धैर्य खोए और न ही किसी पर क्रोध करें। डटे रहें, धैर्य मत त्यागे। अपने लक्ष्य और निर्णय पर अडिग रहने का गुण हमें पृथ्वी सिखलाती है। यह सफल व्यक्तित्व का आधार है।

वायु- वायु जो हमारे प्राण दायिनी है, उससे यह सीख लेनी चाहिए कि वायु जब अपनी सीमा तोड़ती है तो आँधी बन जाती है। मनुष्य जब अपनी सीमा तोड़ता है तो जीवन में भूचाल आ जाता है। ऐसे कुचाल से बचनी चाहिए।

चन्द्रमा- चन्द्रमा से यह शिक्षा ग्रहण की जानी चाहिए कि काल के प्रभाव से चन्द्रमा की कलाएँ घटती-बढ़ती रहती है, तथापि चन्द्रमा तो चन्द्रमा ही है, वह न घटता ही है और न बढ़ता ही है। चन्द्रमा को भी ग्रहण लगता है तो हम मनुष्यों की क्या विसात।

आकाश- आकाश हमें खुलकर उड़ना सिखाता है।इसी तरह आकाश जितने विस्तार पाते हुए हम भटक न जाए, इसलिए जरूरी है कि हम अपने उद्देश्य को न भूलें।

समुद्र- समुद्र से हमें यह सीखनी चाहिए कि हमें सर्वदा प्रसन्न और गम्भीर रहना चाहिए। हमारा भाव अथाह, अपार और असीम होना चाहिए। किसी भी निमित्त से इसमें क्षोभ न होना चाहिए। समुद्र वर्षा ऋतु में नदियों की बाढ़ के कारण न तो बढ़ता है और न ग्रीष्म ऋतु में घटता ही है। इसी प्रकार हमें सांसारिक पदार्थों की प्राप्ति से प्रफुल्लित होना चाहिए और न ही उनके घटने से उदास ही होना चाहिए।

आग यानी ऊर्जा- जब आग का पैमाना बिगड़ता है तो दावानल होता है। इसी तरह किसी भी कार्य में अति उत्साह या ज्यादा ऊर्जा लगाना उस काम को बिगाड़ देता है। यह हमें सिखाता है कि कहां कितनी ऊर्जा निवेश करें।

फूलों के झुकी हुई पेड़ हमें विनम्र होना सिखाते हैं।जिस पेड़ में ज्यादा फल होता है उसकी डालियाँ झुक जाती है।

बादल- बादलों से हमें प्रेरणा मिलती है कि जिस प्रकार बादल पानी वर्षा कर धरती को तृप्त करता है उसी प्रकार हमें परोपकारी होना चाहिए।

पुराणों में कहा गया है कि जो मनुष्य नए वृक्ष लगाता है वह स्वर्ग में उतने ही वर्षों तक फलता फूलता है जितने वर्षों तक उसके लगाए गए वृक्ष फलते फूलते हैं।

इस प्रकार प्रकृति हमारे श्रेष्ठ गुरु हैं। उनके किए कार्यों का अवलोकन करें। उनसे सच्ची शिक्षा प्राप्त करें।

हर्ष नारायण दास
मध्य विद्यालय घीवहा (फारबिसगंज)

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One thought on “हमारी प्रकृति एक शिक्षक-हर्ष नारायण दास

  1. कवि सुरेश कंठ बथनाहा फारबिसगंज अररिया बिहार says:

    आपका यह संदेश पढ़कर मन होता है दो – चार दिन और इसे पढ़ूं।
    बहुत ही सुन्दर और आकर्षक आदर्श विचार से भरा पूरा है।
    धन्यवाद

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