विकास की दौड़ में कहीं हम प्रकृति की चेतावनियों को तो नजरअंदाज नहीं कर रहे?
हिमालय केवल पर्वतों की श्रृंखला नहीं, बल्कि एशिया की जीवनरेखा है। गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु जैसी अनेक महान नदियों का उद्गम इसी क्षेत्र से होता है। करोड़ों लोगों की कृषि, पेयजल और आजीविका हिमालयी पारिस्थितिकी पर निर्भर है। इसलिए इस क्षेत्र में होने वाला कोई भी बड़ा मानवीय हस्तक्षेप केवल स्थानीय नहीं, बल्कि व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
चीन द्वारा तिब्बत में यारलुंग सांगपो नदी पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक का निर्माण शुरू किया जाना इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यही नदी भारत में प्रवेश करने के बाद ब्रह्मपुत्र कहलाती है। इतनी विशाल परियोजना से नदी के प्राकृतिक प्रवाह, तलछट, जैव-विविधता और निचले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर संभावित प्रभाव को लेकर भारत और अन्य पड़ोसी देशों की चिंताएं स्वाभाविक हैं।
हाल की नेपाल त्रासदी ने हिमालय की संवेदनशीलता को फिर सामने ला दिया है। हालांकि उपलब्ध प्रारंभिक वैज्ञानिक सूचनाओं के आधार पर इसे सीधे चीन के बांध या बादल फटने का परिणाम कहना उचित नहीं होगा। वहां हिमनद या बर्फ-चट्टान के टूटने तथा उसके बाद आई बाढ़ को संभावित कारणों के रूप में देखा जा रहा है। वास्तविक कारणों का निर्धारण वैज्ञानिक जांच के बाद ही संभव होगा।
इसी तरह बादल फटना भी केवल किसी जलाशय से उठी जलवाष्प के पहाड़ से टकराने का परिणाम नहीं है। अत्यधिक नमी, वायुमंडलीय संवहन, पर्वतीय भू-आकृति और विशेष मौसमीय परिस्थितियां मिलकर कम समय में अत्यधिक वर्षा की स्थिति पैदा कर सकती हैं।
लेकिन इन वैज्ञानिक तथ्यों के बावजूद एक बड़ा सवाल हमारे सामने है—क्या हम हिमालय की प्राकृतिक क्षमता से अधिक उस पर दबाव डाल रहे हैं?
बड़े बांध, सुरंगें, सड़कें, पेड़ों की कटाई और अनियोजित निर्माण हिमालय जैसे भूकंपीय एवं पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में जोखिम बढ़ा सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों और हिमनद झीलों में हो रहे बदलाव इस खतरे को और गंभीर बना रहे हैं।
इसलिए आवश्यकता विकास रोकने की नहीं, बल्कि सतत और वैज्ञानिक विकास की है। हिमालयी परियोजनाओं के लिए कठोर पर्यावरणीय एवं भूकंपीय अध्ययन, सीमा-पार नदियों के आंकड़ों की पारदर्शी साझेदारी, आधुनिक मौसम पूर्वानुमान और हिमनदों की निरंतर निगरानी आवश्यक है।
प्रकृति को चुनौती देकर विकास की इमारत खड़ी करना अंततः महंगा पड़ सकता है। नेपाल की त्रासदी को किसी एक परियोजना से जोड़ना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसे हिमालय की नाजुकता की गंभीर चेतावनी अवश्य माना जाना चाहिए।
प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर किया गया विकास ही वास्तविक विकास है। यदि मानव प्रकृति की सीमाओं से लगातार छेड़छाड़ करता रहेगा, तो उसका दुष्परिणाम किसी न किसी रूप में सामने आएगा। हिमालय हमें आज ही चेतावनी दे रहा है—विकास की गति चाहे जितनी तेज हो, प्रकृति की सहनशीलता से तेज नहीं होनी चाहिए।
राकेश कुमार,
विज्ञान शिक्षक,
मध्य विद्यालय, अमौना।