कलंक-अरविंद कुमार - गद्य गुँजन

कलंक-अरविंद कुमार

कलंक

          “रमेश..जी, अरे! ऐ रमेश..जी.. उठअ..हो..कर्मचारी..साहेब, तनी नींद.. तोड़ल..जाय..हो “रामनगर थाने का दारोगा कुन्दन, रमेश के बांह पर हाथ रख, उसे हिलाते-डुलाते हुए बोला।

दारोगा की जानी-पहचानी आवाज सुन रमेश ऐसे उठकर बैठा मानो जैसे उसने खुद के मौत का कोई बुरा सपना देख लिया हो। आँख मलते हुए जब उसकी नजर सामने टकराई तो, एकाएक उसके दिल की धडकन तेज हो गई, छाती की पसलियाँ टूटकर बाहर निकलने को आतुर हो गई। काटो तो खून नहीं।

उसके चारों तरफ कई बंदूकधारी सिपाही बन्दूक ताने खड़े थे “का..करते कर्मचारी साहेब.. आपको..कई बार विभाग के तरफ..से गबन..वाला पैसा लौटाने..का नोटिस जारी हुआ मगर आपने..पैसा नहीं लौटाया। अंतत: आपकी लापरवाही के कारण..पहले आप पर मुकदमा और अब..गिरफ्तारी..का वारंट , ..मै मजबूर हूँ । सरकारी कर्मी होकर दूसरे सरकारी नौकर को गिरफ्तार करना मुझे अच्छा नही लग रहा है, मगर क्या करें ये मेरी कानूनी मजबूरी है। खैर छोड़िये ऊ सब बात “अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग..गई..खेत” चलिये मेरे साथ, दारोगा ने हाथ चमकाते हुए रमेश से कहा।

रमेश– “ठहरिये दारोगा जी, जरा अन्दर से कपड़ा ले लू “रमेश डरते हुए बोला। गबन के मामले में रमेश जब से आरोपी बना था तब से वह रात में कभी यहाँ कभी वहाँ, कभी घर में, कभी दरवाजे पर सोया करता था मगर आज किसी के गुप्त सूचना के आधार पर की गई छापेमारी में रमेश को पुलिस ने दरवाजे पर ही गिरफ्तार कर लिया। “जा हो पाण्डे जी रमेश जी के साथ अंगना जा, इकरा के तनी कपड़ा ले के बा देखिहअ कोई जगे नहीं, सावधानी से नहीं ते रात के पहर में बखेरा हो..जाई”। दारोगा कुन्दन ने सिपाही पाण्डे जी को समझाते हुए रमेश के साथ उसे अन्दर भेजा।

रात जवान हो चुकी थी, नि:शब्द रात के आगोश में पूरी बस्ती समा गई थी। टिमटिमाते तारे के साथ….टिर्…टिर्..टिर्..टिर् करती झींगुर की आवाजे तथा कभी-कभार..भू..भू ..ऊ…भू ..भू..भू..भू..भूऊऊऊ करते कुत्ते की आवाजें रात की पहरेदारी कर रहे थे।

सरकारी आदमी की गिरफ्तारी व रामनगर थाने में रमेश के लोगों की पैरवी के दबाव से बचने के लिए दारोगा कुन्दन ने रमेश को अहले सुबह ही किशनगंज जेल भेज दिया।

अगले रोज रमेश की गिरफ्तारी की खबर पूरे गाँव में आग की तरह फैल गई। धन और प्रतिष्ठा के अलग-अलग मायने है मगर जब धन के आधार पर ही.. सामाजिक प्रतिष्ठा तय होने लगे तो अंतत: धन ही प्रतिष्ठा का केन्द्र बन जाता है। रमेश के सुख-सुविधा से चिढ़ने वाले जहाँ उनकी गिरफ्तारी पर मानसिक शीतलता का एहसास कर रहे थे वहीं कुछ लोग घाव को कुरेदने के चक्कर में बिना मतलब का ही उनके परिवार के प्रति सहानुभूति जता रहे थे मगर इस घटना से रमेश के कुछ खास लोग बेहद चिंतित भी थे। पत्नी, बेटा, बेटी तथा बूढ़े पिता का रो-रोकर बुरा हाल था। रमेश की गिरफ्तारी सिर्फ उनकी गिरफ्तारी नहीं थी बल्कि उनकी गिरफ्तारी ने परिवार के बरसों की प्रतिष्ठा, गृहस्थी, बेटे अनीश की पढाई, बेटी पल्लवी तथा रूबी की शादी पर भी ग्रहण लगा दिया था।

“आप चिंता मत कीजिएगा, आपको छुड़ाने के लिए बड़े से बड़े वकील करेंगें, राजवीर भैया की कुछ वकील से बात भी हुई है। आपको जल्द ही बाहर निकाल लेंगें” कुछ दिनों बाद जेल में रमेश से भेंट करने पहुँची उसकी पत्नी पुष्पा उसे दिलाशा देते हुए बोली।

“मुझे माफ कर देना पुष्पा, मैं तुमलोगों का ख्याल नहीं रख पाया” रमेश उदास होकर बोला।

सलाखों के बीच मुलाकात का ये चन्द पल न जाने कब पूरा हो गया इसका पता भी नहीं चला।

पुष्पा रमेश से भेंट कर बेटे अनीश के साथ वापस रामनगर लौट रही थी।

सफर के दौरान पुष्पा अपने पुराने ख्यालों में खो गई, वह आँखों में आँसू लिए उस दिन को कोस रही थी, जब वो अपने पति को सच्चाई व ईमानदारी, के रास्ते पर चलने के लिए कहने के बजाय, सिर्फ अपनी जरूरत शान-शौकत व दूसरों से बेहतर दिखने के लिए, उसपर
अनावश्यक पैसों का दवाब डालती रहती थी। इंसान हर कुछ बर्दाश्त कर भी ले मगर पत्नी व बच्चों का मुरझाया चेहरा बर्दाश्त नहीं कर पाता है। आमदनी से ज्यादा खर्च करने की आदतों ने रमेश को ऊपर की गलत कमाई करने का आदि बना दिया था।

गलत कमाई ने अय्याशी को जन्म दिया, फिर क्या था समय के बढ़ते प्रभाव के कारण अब तो कोई शाम ही नहीं बचती थी जो रमेश की रंगीनियत से छूट जाय। यहाँ तक कि अब नींद ने भी उसके साथ बेवफाई करना शुरू कर दिया था जो बगैर शराब का उसके पास फटकती भी नहीं थी। गलत तरीके से अर्जित धन की ताकत वो ताकत होती है जो इंसान के आँखों पर अहंकार की पट्टी भी डाल सकती है, जो उसे सच्चाई से दूर करने लगता है, इन्सान रिश्ते-नातों से कटने लगता है। फिर उनके जीवन में नये-नये दोस्त व नए रिश्तों का पदार्पण होता है, जिस रिश्ते की बुनियाद ज्यादातर पैसों पर ही टिकी होती है। यही हालत रमेश का हो चला था। धनवान व अय्याशी की आतंरिक इच्छा से वशीभूत होकर उसने ऊपरी कमाई के साथ लाखों के सरकारी राशि का भी गबन कर लिया था। फलस्वरूप परिवार के हरेक सदस्यों को मनमाफिक सुख-सुविधा की सारी चीजें देने में वह सक्षम भी हो गया था। मगर समय पर गबन की राशि की वापसी नहीं होने के कारण रमेश कानूनी गिरफ्त में आज किशनगंज जेल के अंदर अपनी सजा काट रहा था।

ख्यालों मे खोई पुष्पा की जब तंद्रा टूटी तो वह तबतक में रामनगर लौट आई थी।

6 महीने तक गृहस्थी का खर्चा तथा वकील के चक्कर में पैसै की बर्बादी ने पुष्पा के सामने आर्थिक संकट पैदा कर दिया था मगर रमेश को तत्काल जेल से रिहा नहीं करवाया जा सका।

इधर बुजुर्ग ससुर कन्हैया लाल की देखभाल, दो-दो जवान बेटीयों के विवाह की फिक्र के साथ ही अनीश का गाँव के गलत लड़कों के संसर्ग में जाने की चिंता ने पुष्पा को अन्दर से और कमजोर बना दिया था।

इकलौते बेटे की याद में बुजुर्ग रमेश के पिता कन्हैया लाल का स्वास्थ्य भी धीरे-धीरे गिरने लगा था।

1 वर्ष बाद हालात इतना बिगड़ गया कि आर्थिक तंगी से आजादी पाने के लिए अनीश पढाई-लिखाई छोड़ गाँव में ही नशा, अपराध, गैंगवार से अपना नाता जोड़ लिया था।

आखिर वही हुआ जिसका डर था। एक रोज शाम के 8 बजे दारोगा कुन्दन एक दर्जन फोर्स के साथ पुष्पा के घर पर आ धमका “देखिये कन्हैया लाल जी आप एक सम्मानित नागरिक हैं इसलिए मैं आपकी इज्जत करता हूँ, आप अपने पोते को समेट लीजिए। मजबूरन मुझे उसे भी उसके बाप के पास भेजना होगा। उसके अपराध की शिकायतें मुझे लगातार मिल रही है। आप भी सुन लीजिए पुष्पा जी अगली बार मैं उसे छोड़ूँगा नहीं।

बेटे की शिकायत सुन पुष्पा को ऐसा लगा मानो हवाएँ ठहर गई हो, नसों में रक्त का परवाह रूक सा गया हो।

अगले रोज शाम में जब उसने दारोगा की बात पर अनीश को डाँट पिलाई तो उल्टा वह पुष्पा पर ही भड़क उठा तथा सामने पड़ा खाना फेंककर घर से बाहर निकल गया।

घर के हालात बद से बदतर होते जा रहे थे। घर में बैठी दो जवान बेटी की चिंता से पुष्पा दिन-ब-दिन गलती जा रही थी ।

“तुम्हारे कहने पर मैं अररिया रामप्रसाद बाबू के यहाँ गया था मगर उसने अपने बेटे के लिए दहेज की इतनी भारी रकम सुनायी की पूछो मत पुष्पा ” गाड़ी से उतरकर उदास मन से अपनी बहन पुष्पा के हाथ में मिठाई का झोला थमाते हुए राजवीर बोला।

बाद में काफी हाथ-पैर मारने के बाद सुल्तानगंज में एक मध्यम वर्गीय परिवार में पल्लवी की शादी तय हुई। बची-खुची सम्पत्ति बेचकर पुष्पा ने किसी तरह बेटी पल्लवी के हाथ पीले किये।

पल्लवी के बिदाई के बाद घर और काट खाने को दौड़ता था। ऐसे हालात में पुष्पा के उदास मन को रूबी ही ढाढ़स दिया करती थी।

किसी तरह 3 बरस गुजर गए। इसी बीच एक रोज पिता कन्हैया लाल ने बेटे रमेश से मिलने की चाह लिए अपनी पथराई आँखों को सदा के लिए मूँद लिया था।

लगभग चार साल बाद रमेश जेल से रिहा हुआ था। संध्या की बेला थी। रामनगर चौक पर यदुवंशी बस पो…पाय..पो..पाय करती हुई रूकी। रमेश उसी बस से नीचे उतरा तथा धीरे-धीरे बस्ती की ओर चल पड़ा, जहाँ बीमार पत्नी पुष्पा, बेरोजगार बेटा अनीश, दहेज के चक्कर में बैठी बढ़ती उम्र वाली अविवाहित बेटी रूबी तथा एक तंगहाल जिन्दगी, उसके इंतजार में खड़ा था।

अरविंद कुमार, भरगामा, अररिया ✍️✍️✍️✍️

नोट: कहानी के पात्र, घटनाएँ व स्थान काल्पनिक है, इसका किसी व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है।

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2 thoughts on “कलंक-अरविंद कुमार

  1. वर्तमान परिदृश्य में भ्रष्ट कर्मचारियों के आंख पर बंधी पट्टी खोलने पर मजबूर करने वाला बहुत ही सुंदर सामाजिक लेख,,,आप ऐसे ही लिखते रहें।

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