रक्षाबंधन पावन नेह की पहचान का पर्व-देव कांत मिश्र 'दिव्य' - गद्य गुँजन

रक्षाबंधन पावन नेह की पहचान का पर्व-देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

Devkant

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रक्षाबंधन पावन नेह की पहचान का पर्व

पावन रेशम सूत में, देखो अनुपम प्यार।
भगिनी राखी बाँधती, करे भ्रातृ मनुहार।।

               हमारा देश भारत संस्कृति प्रधान देश है। गुरुजनों, निर्बलों एवं अबलाओं की रक्षा करना हमारी संस्कृति का मुख्य ध्येय रहा है। रक्षाबंधन का मूल भाव हमारी संस्कृति के इसी तथ्य से जुड़ा हुआ है।
रक्षाबंधन (रक्षा+ बंधन) यानि सुरक्षा का बंधन, सुरक्षा की गाँठ या किसी को अपनी रक्षा के लिए बाँध लेना। रक्षा सूत्र केवल रेशम की डोर या धागा नहीं अपितु बहन-भाई के अटूट व पावन नेह का बंधन है। जहाँ एक ओर यह दायित्व निभाने का बंधन है वहीं दूसरी ओर बहन भी भाई की लम्बी उम्र के लिए उपवास रखती है। यह त्योहार प्रतिवर्ष श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसी कारण कुछ लोग इसे श्रावणी पूजा भी कहते हैं। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी से चतुर्मास करने के लिए अपने-अपने आश्रमों में लौट आते थे। पुनः चार मास के बाद देश भ्रमण के लिए वे आश्रमों को छोड़ देते थे। आश्रमों से लौटने के बाद राज्य की ओर से उनकी देखभाल का प्रबंध किया जाता था। ऋषि इस समय यज्ञ का आयोजन करते थे जिसकी पूर्णाहुति श्रावण पूर्णिमा को होती थी। इसके बाद राजा लोग आश्रम के अध्यक्ष की पूजा करते थे। ऋषि उनके हाथ में पीले रंग का धागा बाँधते थे। वाकई यह बंधन प्रेम का बंधन था, कर्त्तव्य का बंधन था।

पौराणिक कथा:- इस त्योहार को मनाने के पीछे पौराणिक कथा का उल्लेख करना आवश्यक है। महाभारत काल में जब शिशुपाल और भगवान श्रीकृष्ण के बीच युद्ध हुआ था तो शिशुपाल का वध करते समय उनकी तर्जनी अँगुली कट गई थी तब द्रोपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर उसपर पट्टी बाँधा था और इसके चलते उन्होंने एक भाई की भूमिका निभाते हुए चीरहरण के समय द्रोपदी की रक्षा की थी। विष्णु पुराण के एक प्रसंग में उल्लेख है कि श्रावण की पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लेकर वेदों को ब्रह्मा के लिए फिर से प्राप्त किया था। भविष्य पुराण के अनुसार- देवासुर संग्राम युद्ध में देवताओं की विजय से रक्षा बंधन का अटूट संबंध है। इंद्राणी द्वारा निर्मित रक्षा सूत्र को देव गुरु बृहस्पति ने इंद्र के हाथों में बाँधते हुए अभिष्ट मंत्र का स्वस्तिवाचन किया था।

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।

अर्थात् जिस रक्षा सूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बलि धर्म के बंधन में बाँधे गये थे उसी सूत्र से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। धर्म के लिए प्रतिबद्ध करता हूँ।

हमारे धर्म ग्रंथों में सात तरह के रक्षा सूत्र का उल्लेख मिलता है जो इस प्रकार है: विप्र रक्षा सूत्र, गुरु रक्षा सूत्र, मातृ-पितृ रक्षा सूत्र, भ्रातृ रक्षा सूत्र, स्वसृ रक्षा सूत्र, गौ रक्षा सूत्र तथा वृक्ष रक्षा सूत्र।

खैर जो भी हो, रक्षाबंधन का हमारी संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है। यह त्योहार हमें यह भी संदेश देता है कि व्यक्ति-व्यक्ति के बीच का संबंध बेहतर हो, स्त्री और पुरुष के बीच समभाव हो, लैंगिक भेदभाव समाप्त हो। संबंधों में रंग-रचनाशीलता तथा मिठास हो। तभी रक्षाबंधन के अर्थ की सार्थकता समझ में आएगी। वर्तमान में रक्षाबंधन का स्थान अर्थ बंधन ने ले लिया है और सारे बंधन इसके सामने कमजोर पड़ गये हैं। चाहे पिता-पुत्र का बंधन हो या भाई-बहन का या यजमान-पुरोहित का, सभी अर्थ-बंधन में जकड़े हुए हैं। गहराई से सोचा जाए तो अर्थ के सामने श्रद्धा-भक्ति, कर्त्तव्य निष्प्राण दिखने लगे हैं। सच में रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के स्नेह प्रेम का त्योहार है। हमें नेह के बंधन को मजबूती प्रदान करनी है। रक्षा सूत्र में अद्भुत शक्ति है। इसे भावनात्मक रूप तथा इसकी शक्ति को समयानुकूल पहचानने की आवश्यकता है।

देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

भागलपुर, बिहार

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