समयनिष्ठता-भोला प्रसाद शर्मा - गद्य गुँजन

समयनिष्ठता-भोला प्रसाद शर्मा

समयनिष्ठता

          कुछ दिन पहले की बात है कि मेरा एक साथी अपनी पत्नी के साथ स्नातक की परीक्षा देने जा रहे थे। दोनों मस्ती में झूम रहे थे। ट्रेन में सफर का आनन्द दोनों ही ले रहे थे। कौन नहीं चाहता कि मैं थोड़ा सा अपनों की खुशी में चार चाँद लगा दूँ। फिर घूमने की इच्छा का आनन्द ही कुछ और होता है। दोनों आनंदित होकर सफर तय कर रहे थे। पता ही नहीं चला कि हमारा सफर इतना जल्दी कट जाएगा। प्रथम पाली में परीक्षा होनी थी।

अचानक पत्नी जी की नजर घड़ी पर
पड़ी और वह आवाक रह गई। अरे परीक्षा शुुरू होने में तो सिर्फ पंद्रह मिनट ही बचे हैं जबकि पहुँचने में तो हमें लगभग आधा घंटा और लग जाएगा। दोनों आपस में विचार प्रकट करने लगे। अगर हम लोग स्टेशन पर उतरेंगे तो वहाँ काफी भीड़ भी होगी साथ ही स्टेशन पर जाने में भी समय लगेगा। क्यूँकि सिग्नल आने वाली है। फिर ट्रेन की गति काफ़ी धीमी भी हो जाएगी। लगता है हमारे खुशियों पर ग्रहण सा लग गया। पता नहीं क्या होगा, समय पर पहुँच पाएँगे या नहीं। देखो ईश्वर की मर्जी क्या होता है। अचानक दोनों ने प्लान बनाया। देखो अभी
ट्रेन की गति काफी धीमी है। हम लोग चाहे तो छलांग लगाकर उतर सकते है। इससे हमारा समय बच जाएगा। फिर हम समय से पहुँच भी जाएँगे। अच्छा बाबा ठीक है, पत्नी ने कही।
कहा जाता है अगर दिन खराब हो तो हाथी पर बैठे को भी कुत्ता काट जाता है। पर होनी को कौन टाल सकता है। बस दोनों ने छलांग लगा दी। पति  ने तो अपना संतुलन बना लिया लेकिन बेचारी पत्नी ट्रेन की विपरित गति को
संभाल पाई। कोशिश तो बहुत की पर वो जान की दुश्मन फैशन की भूत ऊँचे हील वाली सेंडिल, एक काले कलुठे सर्दियों में धूप खाने
वाले काले पत्थर से टकराकर धड़ाम से जा गिरी। उनके पैर में काफी मोच आ गई। अहा!अहा! ऊई अम्मा ये क्या हो गया। अरे मेरी सेंडिल ये देखो ये तो टूट ही गया। अब मैं कैसे जाऊँगी? अरे देखो मेरी सारी चूड़ियाँ भी
टूट गई। कितनी अच्छी चूड़ियाँ थी, मैनें कितने शौक खरीदी थी। ऐजी सुनते हो, देखिये तो मेरा पर्श भी निकल गया। उसमें कुछ फैशन का सामान भी है, कहीं टूट तो नहीं गया। पर वह यूँ ही बैठी रही। उसे पता ही नहीं कि मेरा
पैर ठीक है भी या नहीं। इधर पति देव का तो होश उड़ा जा रहा है कि ये क्या हो गया है। करने हम क्या जा रहे थे और हो क्या गया। पता नहीं उसका पैर टूट तो नहीं गया। सच में उनका पैर टूट ही गया। जब वह खड़ी होना चाही तो खड़ी नहीं हो पा रही थी। उसने रोना
शुरु कर दी। अरे ये क्या? मेरे माथे से पसीना चू रहा है पर यह तो लाल है। लगता है ज्यादा पसीना के कारण सिंदूर ने पसीने को लाल कर दिया है। इस तरह बोल कर वह बेहोस हो जाती है। उसे अस्पताल ले जाया गया। पैरों पर पटटी बाँधी गई। जब वह होस में आई तो कहने
लगी अरे मुझे किस सेेण्टर पर ले आए हो? मुझे तो परीक्षा देनी थी। आपको क्या हो गया है?आप तो मुझे डॉक्टर को दिखाने लाए हैं। अरे मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ। मुझे कोई परेशानी
नहीं है। अभी तो हमारी नई-नई शादी हुई है। पति ने कहाअब तुम्हें एक साल और इन्तजार करना पड़ेगा। किस बात की, अरे परीक्षा
की। तुम अभी परीक्षा देने की स्थिति में नहीं हो। चलो अब घर चलते हैं।

निष्कर्ष-
इसलिए कहा जाता है कि हमें सही समय का पालन करना चाहिए। जल्दबाजी में कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए कि हमें नुकसान हो और संकट का सामना करना पड़े।

भोला प्रसाद शर्मा
पूर्णिया (बिहार)

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