जहर - संजीव प्रियदर्शी - गद्य गुँजन

जहर – संजीव प्रियदर्शी

Sanjiv

सुखाराम ने बजरंगी को अपने घर बुलवाकर कहा-‘ बजरंगी भाई, इस बार कपास की खेती कर लो,चाँदी काटोगे। और हां, खेती में जितने भी रुपये लगेंगे सब मैं दे दूंगा। वह भी मात्र पांच के ब्याज पर। तुम मेरे पुराने असामी हो इसलिए कम दर पर दिए देता हूं, वरना दस से कम पर हरगिज नहीं देता।’
बजरंगी बैंक का डेढ़ लाख कर्ज तीन साल से नहीं चुका पाया है, ऊपर से साहूकार- महाजनों का उधार है सो अलग। सुखाराम से कर्ज का नाम सुन बजरंगी के तो जैसे प्राण सूखने लग गये। उसे तो पिछला कर्ज ही जहर लग रहा था। पिछले साल की स्मृति उसकी ताजी हो गई थी,जब वह सुखाराम से खेती के लिए चालीस हजार उधार लिया था। परन्तु ओले में फसल नष्ट हो जाने पर भी वह सारा रूपया कलेजे पर चढ़कर वसूल ले गया था।
दो साल पूर्व ईख की खेती से उसे मूल भी नहीं लौट पाया था।तब अगल-बगल के किसान कहने लगे थे कि अब ईख की खेती में पहले जैसी बरकत नहीं रह गई है। हालांकि ईख तो कट्ठा फाड़ हुई थी लेकिन फैक्ट्री वाले ने ऐन वक्त पर दगाबाजी कर दी थी। प्रारंभ में तो ईख सरकारी मूल्य पर खरीद की, परन्तु बाद में यकायक क्रय कम कर दिया। फिर क्या था, जो ईख ढ़ाई- तीन सौ रुपये क्विंटल बिकती थी, अब सौ में कोई नहीं पूछता।ईख से महाजनों के रुपये भी चुकते नहीं हुए थे। फिर बैंक का उधार कहां से देता । एक बार तो वह खेती से उबकर अपनी ही इहलीला समाप्त कर देना चाहता था, परन्तु पड़ोस के किसानों ने यह बोलकर उसकी हिम्मत बढ़ाई थी कि खेती में तो नफा- नुकसान होता ही रहता है इसलिए तो किसानी को जुआ भी कहा जाता है।’
बजरंगी अभी सुखाराम से बतिया ही रहा था कि उसकी पत्नी जुली उसे ढूंढ़ती हुई आ गई। देखते ही बरस पड़ी -‘ तुम यहां गप्पे लड़ा रहे हो,उधर शंकर तुझे शहर ले चलने के लिए ढूंढ रहा है। वह बोल रहा है,अब खेती-पथारी में जरा भी दम नहीं रहा। बप्पा को बोलो कि सुखाराम को उसका खेत लौटा दे।हम शहर में मंजूरी करके कर्जा चुका देंगे।’
सुखाराम अभी जुली को कुछ समझता, इसके पहले वह पति को लेकर वहां से खिसक गई थी।

                    संजीव प्रियदर्शी
          फिलिप उच्च माध्यमिक विद्यालय,बरियारपुर, मुंगेर
                           (मौलिक)
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