तबाही-श्री विमल कुमार "विनोद" - गद्य गुँजन

तबाही-श्री विमल कुमार “विनोद”

Bimal Kumar

कास्टिंग सीन-बचाओ,बचाओ,
अरे कोई तो बचाओ,बचने का कोई भी उपाय तो बताओ।चारों ओर तबाही ही तबाही नजर आ रही है।(नेपथ्य से आश्चर्य पूर्वक )तबाही ,अरे किस बात की तबाही।बताओ,
बताओ।बचाओ,बचाओ कोरोना से बचाओ।(पर्दा गिरता है)।

प्रथम अंक,प्रथम दृश्य

मैदान का दृश्य,सुबह का समय।
मैदान में पेड़,पशु-पक्षी,नदी,भूमि,
पहाड़,पत्थर,हवा,मनुष्य सभी चिंता की मुद्रा में परेशान नजर आ रहे हैं।सभी चिंतित मुद्रा में एक दूसरे को दर्द भरी,व्याकुल मुद्रा में देख रहे हैं।(सभी मिलकर)बचाओ,बचाओ,तबाही,
तबाही,पर्यावरण की तबाही।हाँ,
हाँ पर्यावरण की तबाही,बचाओ।
मनुष्य-बचाओ,बचाओ,बचाओ,
अरे कोई तो बचाओ।
कुत्ता-अरे क्या हुआ,किस बात की तबाही की चिंता हो रही है।
नदी-जल की चिंता।
पेड़-(आश्चर्य जनक मुद्रा में)अरे नदी,तुम तो जल का भंडार हो,फिर जल की कमी।नहीं,नहीं
ऐसा हो नहीं सकता है,तुम झूठ बोल रहे हो।(इतने में बालू का प्रकट होना)।
पेड़-अरी बहन नदी देखते हैं,
तुम्हारा प्रिय बालू कराह रहा है,इसे क्या हो गया?
नदी-इसे विकास बाबा ने निगल लिया है।
पेड़-विकास बाबा ने तो मुझे भी
निगल लिया है।बड़े-
बड़े आम,जामुन,पीपल,वट
के वृक्षों को भी काट दिया।
पशु-हे,बहन नदी,तुम तो हमलोगों की जीवन दायिनी हो,सबों की प्यास बुझाती हो,तेरे पानी से संसार के फसल की सिंचाई होती है,तुम्हारे जल के बिना तो जीवन जीना दुर्लभ है।
नदी-क्या करें मित्रगण,इस संसार का सबसे बुद्धिजीवी जीव मनुष्य
जिसने इस संसार को तबाही के शिखर पर पहुँचा दिया।मनुष्य ही एक ऐसा स्वार्थी जीव है जो कि अपने हित के लिये संपूर्ण पर्यावरण को तबाही के शिखर पर पहुँचाने का प्रयास कर रहा है।
(पेड़-पौधे,पशु-पक्षी,पहाड़-पत्थर
नदी,भूमि,हवा सभी मिलकर)हाँ,
हाँ,मनुष्य ही इस पर्यावरण को सबसे ज्यादा आघात पहुँचाने वाला जीव है,जिसने अपने हित के लिये जल,जंगल,जमीन,हवा,
पशु-पक्षी को तबाही के शिखर पर पहुँचा दिया है।(सभी मिलकर,
आश्चर्य जनक मुद्रा में)तो अब क्या होगा?(सभी)कोरोना,तबाही,
तेजी से जलवायु परिवर्तन,भूकंप,
बाढ़ आदि,इस संसार को तबाह कर देगी,लोग कोरोना जैसी भयानक बिमारी के चपेट में
आकर मर जायेंगे।

द्वितीय अंक,प्रथम दृश्य

पेड़ के नीचे का दृश्य-(सभी जीव
जंतु,मनुष्य)आह,आह,अब जीना
मुशकिल लग रहा है।गर्मी,गर्मी
बचाओ,गर्मी से जान चली जायेगी।(सभी एक दूसरे से)भाई इस गर्मी का करण क्या है?इतने में पेड़ कहता है-दुष्ट मानव ने मेरे जैसे जामुन,आम,नीम,पीपल,वट जैसे वृक्षों को काट दिया।
हाथी-दुष्ट मानव ने मेरे घर को काट दिया,जंगल को नष्ट कर दिया,इसलिये मैं अपने घर को उजाड़ने का बदला इन पापी,दुष्ट
बुजदिल मनुष्यों से ले रहा हूँ,इनके निवास स्थलों को ढाह रहा हूँ,इसे तबाह कर रहा हूँ।मैं अपना बदला लेकर ही रहूँगा।
दृश्य परिवर्तन
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दोपहर का समय-(मंच पर सन्नाटा छाया हुआ है,सारे जीव पानी,गर्मी
प्रदूषण,कोरोना वायरस के संकट से परेशान होकर,तबाही के शिखर पर पहुँच कर त्राहिमाम-
त्राहिमाम कर रहे हैं।इसी बीच
(नेपथ्य से एक गीत बजती है)
ओ दुनियां के रखवाले,सुनो दर्द भरे मेरे नाले”।(इतने में)गोरैया कहती है,बंद करो ऐसे गीत को,
सभी जीवों के साथ दुष्ट मानव को भी मरने दो,मरने दो,मरने दो।
थोड़ी देर में आकाश में तेज गर्जन के साथ आकाश फटती है,आग के गोले की बरसात होती है और
सृष्टि के सभी जीव,जल,जंगल,
जीव-जंतु सभी जलकर नष्ट हो जाते हैं।

अंतिम दृश्य

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शमशान का दृश्य-वीरान सी दुनियां,सभी जीव जंतु यत्र-तत्र मृत अवस्था में पड़े हुये है,धरती आसमान अपनी तबाही पर रो रही है,दुनियां जल रही है।पर्यावरण के भक्षक मनुष्य द्वारा बनायी गई बड़ी-बढ़ी अट्टालिकायें
मानव के बिना ढह कर गिर रही है।दुनियां वीरान सी लग रही है।
(पटाक्षेप)
आलेख साभार-श्री विमल कुमार “विनोद”प्रभारी प्रधानाध्यापक राज्य संपोषित उच्च विद्यालय,पंजवारा
बांका(बिहार)।

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