तरकीब-संजीव प्रियदर्शी - गद्य गुँजन

तरकीब-संजीव प्रियदर्शी

Sanjiv

उस रोज मुझे रात की ट्रेन से घर लौटना था। चूंकि मैंने जाते समय ही यह सोच कर वापसी का टिकट आरक्षित करवा लिया था कि डेढ़-दो सौ रुपए की खातिर साधारण डिब्बे की रेलमपेल में कौन परेशान होने जाता है? यहां उनींदी और भीड़ दोनो से मुक्ति मिल जाएगी।
मैं समय से कोई घंटा भर पहले स्टेशन पहुंच गया था। अभी कुछ वक्त गुजरा होगा कि शायद सुमन की नजर मुझ पर पड़ गई थी। वह कभी स्कूल में मेरा सहपाठी रह चुका था और इस समय किसी सरकारी दफ्तर में एक मुलाजिम के रुप कार्यरत था। काफी अरसे बाद हम दोनों मिल रहे थे। इसलिए मुझे देखते ही वह उछल पड़ा। फिर चहकते बोला- ‘ कैसे हो समीर? घर चल रहे हो क्या?’
‘हाँ, मैं ठीक हूँ। और तुम—— ?’ – मैंने भी पूछ लिया ।
‘ मैं भी तुम्हारे साथ चल रहा हूँ।’- वह बोला।
फिर हम दोनों के बीच घर-परिवार, बचपन की यादों से लेकर देश- दुनिया की चर्चा होने लगी। एक बार तो वह देश के सभी नेताओं और अफसरों के चरित्र पर खूब भला-बुरा सुनाने लगा। उन्हें चोर-भ्रष्टाचारी कहने में भी गुरेज नहीं किया । जैसे वही एक मात्र सत्य और ईमान का प्रतिमूर्ति हो। मैंने कहा भी कि सभी बुरे नहीं होते। यदि ऐसा है तो फिर देश-जहान चल कैसे रहा हैै?’
अभी हम आपस में बतिया ही रहे थे कि ट्रेन आ गई। मैं अपनी शयनयान वाली सीट पर आ गया। पर सुमन किस कंपार्टमेंट में घुस गया, पता नहीं चला।
सुबह जब ट्रेन स्टेशन पहुंचने को थी तो सुमन भी मेरे पीछे उतरने को तत्पर था। उसे देखकर मैंने शिकायत के लहजे में बोला- ‘ जब तूने मेरे ही कंपार्टमेंट में सीट आरक्षित करवा रखी थी फिर मुझे बताया क्यों नहीं?’
मेरी बातें सुनकर पहले तो वह हंसा। फिर कहने लगा- ‘अरे यार,मेरा तो सप्ताह में आना-जाना लगा ही रहता है। नित कितना टिकट कटाता रहूंगा? इसलिए मैंने एक तरकीब ढूंढ ली है। यह कि टी टी ई को सौ रुपए देकर किसी खाली वर्थ पर सोते हुए आराम से घर आ जाया करता हूँ।बस मंहगे टिकट और भीड़ दोनो के झंझट खत्म।’
ट्रेन से उतरने पर शायद वह मुझसे कुछ कहना चाहता था, पर मैं उसकी बातों को अनसुनी करते हुए प्लेटफार्म से चुपचाप बाहर निकल गया था

संजीव प्रियदर्शी

फिलिप उच्च माध्यमिक विद्यालय बरियारपुर, मुंगेर

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