नमक हराम -संजीव प्रियदर्शी - गद्य गुँजन

नमक हराम -संजीव प्रियदर्शी

Sanjiv

‘रमेश बिल्कुल नमक हराम निकला। कितना समझाया था कि बाबूजी को घर पर रखकर उनकी अच्छी तरह देखभाल किया करना। परन्तु उसने तो बाबूजी को वृद्धाश्रम में ले जाकर छोड़ दिया है! इतना भी कोई आदमी गिरता है,भला!अब अपने हिस्से की फसल उसे नहीं देकर बाबूजी को अपने पास ही बुलवा लेता हूं।’ – विनोद अपने छोटे भाई के कुकृत्य पर गुस्सा उतारते हुए पत्नी सुधा को सुना रहे थे।
जब विनोद का बोलना खत्म हो गया तब सुधा जरा आँखें तरेरती हुई बोली-‘ खबरदार!जो बुड्ढे को यहां बुलवाया। तुम्हें याद नहीं, तुम्हारी मां ने मरने से पहले मेरा कितना जीना हराम कर दिया था। तुम तो सिर्फ गू- मूत करते थे बाकी तो सब मुझे ही झेलना पड़ता था। फिर उनके आ जाने से हमलोगों को सोने-बैठने में कठिनाई तो होगी ही, बच्चों की पढ़ाई भी डिस्टर्ब होगी।’
विनोद की इच्छा हुई कि वह पत्नी की इस धृष्टता का प्रतिकार करे, परन्तु कई बातों को सोचकर चुप रहना ही बेहतर समझ लिया।

                       संजीव प्रियदर्शी
                             (मौलिक) 
फिलिप उच्च माध्यमिक विद्यालय बरियारपुर, मुंगेर

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