बाबाश्री श्री 10८ श्री बाबा रघुनंदन स्वामी जी महाराज मछुआरों का जाल और बाबा का जलवा उनका धार्मिक आंदोलन एक समाज सुधार की तरह था जो जनमानस को एक अलग ढंग से जीने का उद्देश्य प्रदान कर रहा था। वह सत्य अहिंसा तथा शक्ति के पुजारी थे। एक गांव है मलविगहा जो नालंदा जिला के चंडी प्रखंड में स्थित है वही श्री श्री 10८ श्री बाबा रघुनंदन स्वामी जी महाराज की कर्म स्थली है। एक धर्म के मर्मज्ञ राम लखन बाबू जो गांव के मानिन्दे एवं पढ़े लिखे डेयरी प्रोजेक्ट से सेवानिवृत्त कर्मी थे, उनका कहना है कि गांव के नाम में अपभ्रंश आ गया है, गांव का नाम मल विगहा नहीं बल्कि मल्ल विगहा था क्योंकि यहां कुश्ती का अखाड़ा था जो आज भी है, अखाड़ा बाबा के पदार्पण के पहले से है; जहां एक से एक शूरवीर पहलवान दंगल में अपना किस्मत आजमाएं हैं। रही बाबा की बात, जिन्होंने गांव में विराजते ही मल्लाहों के मुख्य पेशा को बंद करा दिया और उन्हें कंठीमाला पहना दी। इस बरादरी का मुख्य पेशा होता है: मछली मारना और उसे बेचकर, उसी से अपने परिवार का जीविका चलाना। उन्होंने ग्राम वासियों से आह्वान किया कि सभी मछुआरे अपने-अपने घरों से मछली पकड़ने वाला जाल लेकर बगीचे में जमा हो जाएं। मल विगहा में बहुसंख्यक आबादी मल्लाहों की है जो तीन टोलों में बसा हुआ है। दो-चार घर अन्य बिरादरी के लोग हैं जिसमें एक घर कुम्हार पंडित, एक घर महतो जी का परिवार तथा दो-तीन घर गोतिया-भाई पासवान हैं। बाबा के आह्वान पर बगीचे में ग्रामवासियों का हुजूम लग गया। मछुआरों ने स्वामी जी का आदेश मानते हुए अपने-अपने घरों से जाल लेकर बगीचे में पहुंच गए। सभा में एक कौतूहल था कि क्या होने वाला है। जिज्ञासा भरी निगाहों से सभी एक-दूसरे को देख रहे थे। बाबा के माथे पर तेज था और कद-काठी दृढ़। बाबा की काया छरहरा एवं रंग सांवला था। वे अपने ओजपूर्ण एवं रौबदार आवाज में सबों से कहा, “सभी जालों को एक जगह करो।” और फिर उन्होंने आदेश दिया,” इसे जला डालो।” मछुआरों के हृदय में तो अंदर से रुदन-क्रंदन चल रहा था लेकिन बाबा के सामने कुछ नहीं बोल सके। उनका आदेश अंतिम आदेश था। वे सोच रहे थे कि हम लोग अपने बच्चों का जीवन यापन कैसे करेंगे। किसी ने हिम्मत करके सवाल भी किया,” बाबा हम अपने बाल-बच्चों का पेट कैसे भरेंगे।” लेकिन बाबा ने फिर रोबिली आवाज में आदेश दिया,” जालों को जला डालो”। तुम सब के बाल-बच्चों का भरण पोषण मलिक करेगा। जी बाबा, अपने हमनी सब के सिर पर हाथ रख देलथिन हे तब का चिंता?” बाबा के करिश्माई व्यक्तित्व पर सब लोगों ने भरोसा किया और ‘जालों का दहन’ शुरू हो गया, जैसे लंका दहन हो रहा हो। कई दिनों तक जाल जलते रहे। आसपास के गांव के मछुआरों ने भी अपने-अपने जालों को आग के हवाले कर दिया था। बाबा ने कहा, “आज से प्रण करो कि मांस, मछली और मदिरा का सेवन नहीं करेंगे और न ही उसका कारोबार करेंगे। सभी प्रकार के नशा से दूर रहेंगे। ये सभी विनाशकारी हैं, सदाचार एवं सात्विक जीवन जीने में के लिए ये सब व्यसन छोड़ना होगा।” सभी ग्रामीण नतमस्तक हो गए, “जी महाराज, आप जैसा कहें।” मछुआरों का जलता हुआ जाल और और महाराज का जलवा, उस गांव के लिए कोई मामूली घटना नहीं थी। यह निर्णय एक विस्मयकारी घटना थी जो वहां के लोगों का जीवन को बदल कर रख दिया। लोग अपनी पुश्तैनी काम को छोड़कर अन्य कार्यों में लग गए। लोग दूसरे धंधों में अपनी जीविका तलाश करने लगे। बाद में तो लोग दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत में भी जाकर रोजगार करने लगे। आज तक मलविगहा गांव में बकरी एवं मुर्गी पालन नहीं होता है कि कहीं बकरी और मुर्गी पालन करते-करते मांस और अंडे का सेवन न करने लगे। बाबा की बातों का असर आज भी इतना है कि मलविगहा के स्कूल में शुक्रवार को अंडों की जगह बच्चों को फल दिए जाते हैं। यह गांव पूरी तरह से निरामिष गांव है। इस मामले में यह गांव अद्भुत एवं अविश्वसनीय है। गांव में कोई भी मांस, मछली और मदिरा का सेवन नहीं करता। इस बात का पालन आज भी लोग कर रहे हैं। हां, अलबत्ता अब गांव से बाहर जो कमाने खाने गए हैं, उन्होंने अपनी जीवन शैली में कुछ बदलाव लाया है लेकिन गांव में जब भी वे आते हैं तो वे गांव के नियम का पालन करते हैं; उन्हें बाबा के कोप का भय होता है। कहीं कोई अनहोनी न हो जाए। बाबा के प्रति लोगों का गांव में इतनी आस्था है कि बाबा ने जो कहा, उसके विपरीत जब हम चलेंगे तो अनर्थ हो जाएगा। बाबा के गुजरे आज अर्ध सदी हो गए, फिर भी उनका असर आज भी है और आगे भी रहेगा। ग्रामीणों की नजर में वे एक सिद्ध पुरुष थे, ज्ञानी थे; वे जो कहते थे, वह हो जाता था। लोगों ने उनके समकालीन बुजुर्गों से उनके यश एवं कृति के बारे में सुन रखा है। उनके शिष्य आज भी कुछ लोग गांव में जिंदा हैं जो उनकी सेवा में लगे रहते थे। उनसे बाबा के बारे में बहुत कुछ जानकारी मिलती है। वे उनकी कृति, यज्ञ और ज्ञान के बारे में बताते हैं लेकिन वाणी के बारे में बहुत कम बता पाते हैं। उन्होंने क्या कहा? संसार के लिए उनका क्या संदेश था? इस पर बहुत ही संक्षिप्त जानकारी मिलती है। उसका कोई लिखित प्रमाण नहीं मिलता है। बस, श्रमण संस्कृति से कुछ जानकारी प्राप्त है। यदि उनके शिष्य भी चले गए तो आगे के लोगों को उनकी कृति की जानकारी नहीं मिल सकेगी। उस पर कोई ठोस कार्य किसी ने नहीं किया। राम लखन बाबू ने भी कुछ उन पर लिखा था जिसका प्रकाशन होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई। बाबा पर फिल्म बनाना भी उनका एक सपना था जो पूरा नहीं हुआ। इस काम को आगे कौन बढ़ाएगा पता नहीं। आज की पीढ़ी ने सुन रखा है बाबा के यश एवं कृति की अनेकों कहानियां जो उनकी महानता की गाथा कहती हैं। बाबा ने अखाड़ा को और विकसित किया। कुटिया का विस्तार किया। कुटिया के लिए आसपास के गांव के लोगों ने जमीन दान किया। कुछ लोगों ने तो बाबा के ओजपूर्ण व्यक्तित्व का सामना ही नहीं कर पाया और अपनी जमीन कुटिया को ही समर्पित कर दिया। बताया जाता है कि बहुतों जगह उनका कुटिया आज भी है जिसके महंत अर्जुन दास हैं। कुछ लोगों का कहना है कि जो जमीन वाले खेती करने के लिए आते थे, उन्हें कुछ न कुछ नुकसान पहुंचता था। अतः उन्होंने वे जमीन बाबा को ही दान में दे देने का फैसला किया। इस तरह उनका आश्रम बड़ा हो गया। इस आश्रम की जमीन में ही वर्तमान उत्क्रमित मध्य विद्यालय मलविगहा बना हुआ है। अभी भी कुटिया में पेड़-पौधे ढेर लगे हुए हैं: आम, कटहल, जामुन, बरगद और पीपल आदी। बाबा के कुटिया में उनकी प्रतिमा है जिसके सामने छतमन वृक्ष के चारों तरफ गोल चबूतरा है। उस पर दिन-रात 20-25 लोग गप-शप करते मिल जाएंगे। दिन में वहां देसी एसी का मजा मिलता है। जाड़ा, गर्मी, बरसात, सभी मौसम में बहुतों लोग वहां मिल जाएंगे। कोई सोया हुआ होता है तो कोई बैठा हुआ होता है तो कोई पूजा अर्चना में लगा रहता है तो कोई निर्गुण गाता रहता है तो कोई भगवान का सिमरन करता है। किसान लोग कुछ अपना काम लेकर भी वहां पर आते हैं और करते रहते हैं। समाज के झगड़ों का निपटारा भी बाबा के पास ही पहले होता था और आज भी होता है। अलबत्ता, पहले बाबा का निर्णय अंतिम आदेश होता था। अब समझा-बूझाकर होता है। बाबा सभी ग्रामीण को एक सूत्र में पिरोकर रखते थे। बाबा के फरमान के बाद वहां के लोगों का मुख्य पेशा खेती करना, गाय-भैंस पालन था। उन्होंने जोर देकर कहा कि गाय, भैंस पालो और दूध, दही, मक्खन और घी खाओ तथा पहलवान बनो। अखाड़े में लड़ो। बाबा को पहलवानी कराने का बड़ा शौक था। वह कुश्ती लड़वाते थे। शरीर से सुदृढ़ और मोटे-ताजे मल्लाह पहलवान अपने इल्म के बदौलत अपने गांव से दूर-दूर तक जाकर अखाड़े में किस्मत आजमाते तथा अपना हुनर दिखाते। वे अपने शिष्यों को दाव-पेंच सिखाते, जैसा कि यह गांव के मानिन्दे एवं समाज सेवक फौजदारी प्रसाद बताते हैं। गांव के ही एक सम्मानित व्यक्ति मनमौजी व्यास का कहना है कि यहां के लोगों ने उनकी कृति-यश को ही देखने में रह गये लेकिन उनकी वाणी को कोई नहीं पकड़ा, नहीं तो उनका संदेश दूर-दूर तक फैला होता। थोड़ा बहुत राम लखन बाबू ने उनके संदेश को पकड़ा लेकिन वे भी उनके संदेश और उपदेश को मरते दम तक पूरी तरह से कलमबद्ध नहीं कर सके। बाबा की वाणी को जनमानस तक लाने में सफलता उन्हें नहीं मिली। हालांकि बाबा के कृति, यश एवं उपदेशों का फिल्मांकन उनकी सशक्त मनसा थी। राम लखन बाबू एक लेखक थे। उन्होंने ‘गौ सेवा’ पर दो पुस्तकें लिखी थीं। सुनने में आया है कि बाबा के संदेशों की पांडुलिपि कोई साहनी साहब फिल्म बनाने के लिए ले गए लेकिन काफी परिश्रम एवं लंबी प्रक्रिया तथा अर्थाभाव के कारण फिल्म निर्माण वाला काम नहीं हुआ। राम लखन बाबू की डायरी में क्या है? शायद उसमें बाबा के बहुत सारे रहस्य हैं। राम लखन बाबू के पुत्र यदि साहनी जी से डायरी प्राप्त कर लाएं तो उस पर बहुत कुछ काम किया जा सकता है। फौजदारी प्रसाद, सुरेश दास तथा रामप्रीत केवट आदि ग्रामीणों ने बतलाया कि बाबा ने अपने जीवन में 62 यज्ञ किए। अभी तकियापर, बिहार शरीफ और राजगीर आदि जगहों पर बाबा का आश्रम है। मलविगहा ग्राम की कुटिया बढ़ौना और राजन विगहा के लोगों की रैयती जमीन में बनी हुई है। कुटिया की जमीन में लिखित जमीन रामचंद्र केवट पिता सोमर दास ही की हैं जिसमें कमरा बना हुआ है और उसमें बाबा की प्रतिमा है। कुटिया में घंटा लगा हुआ है, जहां पूजा करने वाले सवेरे-सवेरे घंटा बजाते हैं। साधु-संत के आने पर ग्रामीणों द्वारा लंगर का प्रबंध किया जाता है। लंगर कोई बाबा की चलाई परंपरा नहीं है, गांव वाले बताते हैं कि यह कब से चला आ रहा है पता नहीं। बाबा अपने समय में किसी के घर खाना खाने नहीं जाते थे। उनका भोजन उनके सेवक एवं शिष्य लोग आश्रम में ही बनाते थे। वे दूध और दही का सेवन अधिक करते थे और फिर बाबा भोले नाथ का प्रसाद। आश्रम में महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध था। मलविगहा में हाल ही में 2 सप्ताह का बहुत बड़ा यज्ञ एवं मेला का आयोजन हुआ था, जिसमें प्रतिदिन भंडारा का प्रबंध था, जो आए जो खाए कोई मनाही नहीं। अध्यात्म के अनुसार व्यक्ति में तीन तरह के गुण होते हैं: सत्, रज्, तम्। सतगुण वाले व्यक्ति सात्विक होते हैं। रजगुण वाले व्यक्ति राजसी विचार के होते हैं, बिल्कुल आराम परस्त और तमगुण वाले व्यक्ति व्यभिचारी एवं हर गलत काम में आगे रहने वाला होता है। बाबा का कहना था: दुर्गुणों को छोड़ो। उनका मूल सिद्धांत था: ‘शाकाहार बानो’,’ जीव हत्या मत करो’। श्री श्री 10८ श्री बाबा रघुनंदन स्वामी जी महाराज का सात्विक जीवन ही संसार के लिए सबसे बड़ा संदेश है। उनका जीवन एक दर्पण है। बाबा का घर जहानाबाद के मलह चक में था। वहां भी ठाकुरवादी है और वहां भी भंडारा लगता है। बाबा के शिष्य रामप्रीत जी का कहना है कि उनका जन्म उनके ननिहाल बेलदार बीघा में हुआ था, न कि मलह चक में। बाबा निरामिष बनने के साथ-साथ जुआ और चोरी भी छोड़ने कहते थे। वे कहते, “अंडा, पीव के समान है, मुर्गी नाली में पील्लू-माकर खाता है, मछली सड़े-गले मुर्दे को खाता है। यह बीमारी का घर है।” यह उनका समझाने का अंदाज था। चोरी करने वालों के पास डकैत पहुंचेगें,फिर जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। डकैत शब्द वे पुलिस के लिए इस्तेमाल करते थे। बाबा कुटिया में सांप और बिच्छू काटे व्यक्ति का भी चिकित्सा करते थे। बीमार ठीक होकर जाता। बाबा हमेशा समाज का कल्याण चाहते थे, वैसे यशस्वी संत की गाली भी लोगों के लिए आशीर्वाद के समान था। उन्होंने जिन्हें गाली दे दी, समझो उन्हें आशीर्वाद प्राप्त हो गया और वह धन्य हो गया। बाबा शिक्षा के महत्व को समझते थे। उन्होंने हमेशा लोगों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए कहा और बाल-बच्चों को पढ़ाने- लिखाने के लिए कहा। उनके सानिध्य में चोर भी आए, जिन्होंने उनके समझाने पर चोरी करना छोड़ दिया। कुछ बात थी उन में जो औरों से अलग थी। उनकी आभा से लोग प्रभावित हो जाते। उन्हें दूसरों की परेशानियां समझते देर नहीं लगती। वे दो बातें उन्हें कहते, सुनने वाले का जैसे दुख-दर्द दूर हो जाता। पहलवानों में बुलकन पहलवान, चमारी पहलवान, केशो पहलवान, शिवालक पहलवान, दुरखेली पहलवान, रोहन पहलवान, सुख्खु पहलवान और नारायण पहलवान प्रमुख थे। फौजदारी प्रसाद बताते हैं कि 1988 तक मैंने इस अखाड़े में ‘कुश्ती का दंगल’ देखा है। उसके बाद बंद हो गया, थोड़ा बहुत चला। दंगल के परिपेक्ष में सौहार्द, प्रेम एवं भाईचारा का एक बहुत बड़ा उदाहरण भी है। बाबा के शिष्यों में एक मुसलमान कुश्तीबाज भी था। उसका नाम था: कमरुद्दीन खलीफा। वे तलवारबाजी और लाठी के उस्ताद थे। कुश्ती में भी काफी तेज थे। फौजदारी प्रसाद बताते हैं कि अखाड़े के पास ही खेत में कमरुद्दीन जी का घर था। कुश्ती के बाद दूध में बादाम डालकर शर्बत बनाया जाता था और पहलवानों को पिलाया जाता था, जिससे देह चूर-चूर होने के बाद भी पहलवानों में स्वत: स्फूर्ति एवं ऊर्जा मिलती थी। बाबा एक बड़े यशस्वी योगी थे। वे सूर्य उपासना एवं त्राटक करते थे। योग के समय आंखों से काफी अश्रु धार गिरते थे। त्राटक से आंख में चमक और शक्ति आती है। ऐसी शक्ति कि सामने वाला उनसे आंखें न मिला सके। इसीलिए कहा गया है कि योग में शक्ति है। इस्लाम में नमाज हो या हिंदू धर्म में सूर्य नमस्कार, दोनों ही शक्ति, स्फूर्ति, ध्यान एवं एकाग्रता का संचारक हैं। प्रत्यक्षदर्शी सुरेश दास कहते हैं कि बाबा के पास हमेशा 10-15 आदमी रहते थे जो उनकी सेवा में लगे रहते थे। उनका भोजन सुक्खू जी बनाते थे। वे अपने पास एक गदा भी रखते थे। लोग उनसे डरते भी थे। गदा को लेकर प्रवचन भाव में कहानियां कहते और लोगों को ‘कवित’ सुनाते और उदाहरण से किसी बातों को समझाते। इस तरह उनका प्रवचन दिलों में घर कर जाता और मन-मस्तिष्क में छा जाता और लोग उनकी बातों को मान लेते थे। रामप्रीत केवट उनके दोहे को इस प्रकार सुनाते हैं: जग में तीन सुअर रे भाई जग में तीन सुअर ——। पहला सूअर मछली दूसरा सूअर ‘सूअर’ तीसरा सूअर मनुष्य। जग में तीन सुअर रे भाई जग में तीन सुअर ——। उनका कहने का मतलब था कि मछली सड़े-गले मुर्दों को भी खा जाती है और असली सुअर जो होता है, वह मैला खाता है तथा मनुष्य ऐसा है कि दारू, ताड़ी और मांस-मछली; सब कुछ खा जाता है। बाबा रामावतारी थे, वे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को मानते थे। वे माता शबरी के बारे में भजन गाते थे, जैसा कि राम प्रीत केवट इस प्रकार सुनाते हैं: जात के भेलनिया, कैसे छुअल प्रभु जी के चरणीया, खाई लगी घोंघा-सितुआ और मछलिया, अगे माई डर लगे, कैसे छुअल प्रभु जी के चरणीया। अगे माई छोड़ी देवै घोंघा-सितुआ-मछलिया, तपस्या करके छुई लेवै उनकर चरणीया। लोग उनके चरण पर गिरते, फिर उनका दुख का हरण हो जाता। वह गलत न करते थे और न गलत सुनते थे। वे हमेशा लोगों को निरोगी रहने एवं शरीर को बलशाली बनाने तथा परिश्रम करने के लिए कहते। कुटिया में यज्ञ होता। 7 दिन तक हुमाद जलता रहता। 72 घंटे तक सियाराम का जाप होता रहता, फिर ग्रामीण लोग मिल-जुलकर लंगर का प्रबंध करते। उनका दरवाजा सब के लिए खुला हुआ था। यज्ञ के दौरान 56 प्रकार का भोग का भी प्रबंध किया जाता था। बाबा ने समाज में ‘सामाजिक परिवर्तन’ लाने का काम किया। ग्रामीणों को मछली का कारोबार को छुड़वाना कोई क्रांति से कम नहीं था। इससे प्रेरणा मिलती है कि अपनी जिंदगी को बदलने के लिए या कुछ पाने के लिए अपने प्रिय चीज को भी छोड़ना पड़ता है। श्री श्री 10८ श्री बाबा रघुनंदन स्वामी जी महाराज 8 सितंबर 1978 को तकिया पर, बिहार शरीफ में दिन शुक्रवार को 3:00 बजे अंतर्ध्यान कर गए। शरीर त्यागने से पहले उनकी सेवा-सुश्रुषा उनके शिष्यों ने किया। उनके शिष्यों ने उस समय के मशहूर सर्जन डॉक्टर ईसरी साहब को बुलाया। प्रत्यक्षदर्शी सरयुग केवट बताते हैं कि ईसरी और मिसरी, दोनों रिक्शा पर बाबा को देखने आए। ईसरी और मिसरी, दोनों भाई थे और मुसलमान थे। वे दोनों भी बाबा का काफी सम्मान करते थे। डॉक्टर ईसरी ने शिष्यों से कहा, “बाबा को छेना खिलाइए।” लेकिन यह सुनकर बाबा ने उल्टे डॉक्टर साहब को ही गालियों का आशीर्वाद दे दिया। छेना खाएंगे और उसका रस पिएंगें। डॉक्टर साहब सुनकर हंसते रहे। वे जानते थे कि बाबा का स्वभाव एवं करिश्मा । बाबा ने कहा, “ हमें अब इसी हाल में छोड़ दो। मेरा अब जाने का समय आ गया है।” फिर उनका अंतर्ध्यान हो गया। उनकी समाधि तकिया पर, बिहार शरीफ में ही है। वहां कुटिया और मंदिर नदी के किनारे स्थित है, जहां बाबा के श्रद्धालु जाते रहते हैं।
