एक पेड़ माँ के नाम से जानना एक भावनात्मक अभिव्यक्ति है। इस कार्यक्रम से बाल मन भी प्रभावित होता है, क्योंकि बालमन में माँ से प्रिय कोई नहीं होती है परंतु जैसे-जैसे वह किशोरावस्था में प्रवेश करने लगता है उसके समक्ष विविध भौतिक व विलासिता की वस्तुएं प्रदर्शित होने लगती है, परंतु मनुष्य के जीवन पर्यन्त सम्मानित होने वाली माँ की तुलना किसी से नहीं की जा सकती है। इसलिए जब उन्हें अपनी माँ के नाम के साथ पेड़ लगाना हो तो वह अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर उस जगह की तलाश करने लगता है जहाँ उसकी माँ को पेड़ के रूप में शांति व सुकून मिल सके। इसी संदर्भ में आज एक अप्रत्याशित कहानी को लिखने के लिए मेरी लेखनी उत्सुक हो उठी।
सुबह के आठ बज रहे थे, मैं प्रतिदिन की तरह अखबार की सुर्खियों बटोरने में व्यस्त थी और बीच-बीच में चाय की चुस्कियां भी ले रही थी, तभी दरवाजे की कॉल बेल बजी। मैं दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए आवाज लगाई “कौन है” तत्क्षण बाहर से आर्त व करुण भरी आवाज आई — “दीदी, मैं मुनिया, जो प्रतिदिन दुर्गापूजा में फूल देने आती थी।” मैंने दरवाजा खोली तो सामने मुनिया खड़ी थी। मुझे देखते ही बोली “दीदी मेरे पास मिट्टी के कुछ दीये है जो मैंने खुद अपने हाथों से बनाई है, आप इसे ले लो और मुझे कुछ पैसे दे दो। मुझे पैसों की बहुत जरूरत है।”
मैंने सहज भाव से हँसते हुए कहा, “मैं पहले ही बाजार से मिट्टी के पक्के दीये खरीद चुकी हूँ इसलिए तुम्हारे मिट्टी के कच्चे दीये क्या करेंगी और इसमें तेल भी बहुत कम आएगा इसलिए ऐसा दीया मेरे काम में नहीं आएंगे।” –
मुनिया ने निराशा भरी दृष्टि से मेरी तरफ देखते हुए कहा — “दीदी, अगर आप मेरे दिए ले लोगी और कुछ पैसे दे देगी तो मैं उस पैसे से एक फूल का पौधा खरीदूंगी, फिर जब उसमें अधिक फूल होगा उसे बेचकर ज्यादा पैसा मिलने पर एक बड़ा सा आम का पेड़ खरीदूँगी और उस पेड़ को अपनी माँ के नाम से लगाऊँगी।इस पेड़ को देखकर माँ बहुत खुश होगी और इससे हमारा पर्यावरण भी सुरक्षित होगा। इसके फूल, फल और लकड़ी भी उपयोगी होंगे। लेकिन मैं अभी छोटी हूँ, मेरी माँ के अलावा इस दुनिया में कोई नहीं है, इसलिए मैं अपना छोटा सा प्रयास करती हूँ पर्यावरण की सुरक्षा और अपने भरण-पोषण के लिए।”
उसकी बुद्धिमत्तापूर्ण बातों ने मुझे आह्लादित कर दिया। मैंने हाँ भरते हुए कहा, “ले आओ, जितने दीये है।” वह खुशी से भागती हुई अपने घर चली गई और कुछ ही क्षणों में एक छोटी थैला में दीया लेकर आई। मैंने उससे दीये ले लिए और पैसों के साथ दो कॉपी व दो कलम भी दी। मैंने कहा, “मुनिया, पौधे लगाने के साथ पढ़ाई भी करना, तभी तुम अपनी माँ के साथ-साथ देश का नाम भी रोशन कर पाओगी।” पैसे पाकर वह प्रसन्न होकर चली गई।
“एक पेड़, माँ के नाम” कार्यक्रम के अंतर्गत मैं अपने विद्यालय में छात्राओं से बगीचे में तरह-तरह के फूलों और औषधीय पौधे जैसे तुलसी, नीम, एलोवेरा, थूजा, आदि अनेकों पौधे लगवाती हूँ। छात्राओं ने कई पौधे अपनी माँ के नाम पर लगाए हैं, परंतु इस बालमन ने सीमित संसाधन में इतना साहसिक कदम उठाया, यह मुझे अत्यंत मनमोहक लगा, उनकी प्रतिभा एवं सोचने की शक्ति पर मुझे गर्व महसूस हुआ। इस बाल कहानी का उद्देश्य यह प्रेरणा देना है कि विद्या की ज्योति ने समाज के निर्धन व कमजोर वर्ग में भी चेतना जगाई है। बालमन पर इस कार्यक्रम ने गहरा प्रभाव डाला है, जिससे उसके कोमल हृदय पर माँ का स्नेह प्रकट हुआ है। यह कहानी हम सबके लिए प्रेरणादायी है कि सीमित संसाधनों में भी हम अपनी बुद्धिमत्ता से पर्यावरण की रक्षा और अपने जीवन में खुशहाली ला सकते हैं। इस कार्यक्रम से माँ के सम्मान के साथ-साथ प्रकृति से भी भावनात्मक लगाव प्रकट होता है। यह कार्यक्रम सरकार द्वारा चलाया गया एक सराहनीय कदम है।
सुबाला कुमारी,
विशिष्ट शिक्षिका
विद्यालय – उ० उ० म० विद्यालय बिशनपुर, जिच्छो, गोराडीह
जिला भागलपुर, राज्य बिहार
एक पेड़ माँ के नाम : सुबाला कुमारी
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