अपनी माटी-कुमारी निरुपमा - गद्य गुँजन

अपनी माटी-कुमारी निरुपमा

Nirupama

Nirupama

अपनी माटी

          आरुणि के प्रश्नों का जवाब देते देते-देते उसके पापा कभी-कभी झुंझला कर उसे चुप भी करा देते थे। आज आरुणि पापा और कपिल अंकल को समाचार सुनते हुए अफगानिस्तान में वहां के अफगानी लोगों को अपने देश को छोड़कर दूसरे देशों में शरण लेने की बात सुना। काबुल का नाम सुनते ही न जाने क्यों वह विचलित हो जाता है।
कुछ दिन पहले वह रविन्द्र नाथ टैगोर रचित काबुलीवाला कहानी पढ़ा था। वह रहमत को कभी नहीं भूल पाता।

उसने पापा से पूछा- पापा काबुलीवाला अफगानिस्तान से आकर कोलकाता में काजू बादाम अखरोट पिस्ता आदि क्यों बेचता था।”

पापा- जिस समय यह कहानी टैगोर जी ने लिखा उस समय देश का विभाजन नहीं हुआ था। अफगानिस्तान भारत का निकटतम पडोसी था। अतः वहां के लोग अपने मेवे यहां आकर बेचते थे।
आरुणि- पापा, रहमत अपने देश वापस गया या नहीं।क्या उसे अपनी बेटी मिली।
पापा- कहानी का अंत तो इसी बात से हुआ कि पैसा ले लो और अपने देश लौट जाओ।

अफगानिस्तान के बारे में जानकर उसे हमेशा रहमत और उसके परिवार वालों की फ़िक्र रहती थी। आज भी टी.वी पर काबुल के बम धमाके और बिलखते परिजनों को देखते हुए नींद गयी। सपने में उसने देखा कि रहमत अपने देश वापस आ रहा था कि लैंड से पहले बम धमाके से आग में बदल गया। आरुणि रोते हुए उठ गया और बस एक ही रट था कि रहमत को अपनी माटी में लौट जाना चाहिए। उसकी बेटी की शादी होगी…।

कुमारी निरुपमा

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