परीक्षा के बाद स्कूल में गर्मी की लंबी छुट्टी होते ही हम खुशी से उछल पड़ते थे। सबसे बड़ी ख़ुशी होती थी कुछ दिन पढ़ाई से छुटकारा मिलने की । उन दिनों हमारा सबसे बड़ा टूरिस्ट स्पॉट मेरा ननिहाल बरहारा कोठी था ।
मां रात में ही झोला- झंडा कसने लगती थी भाई के लिए अचार, भतीजे के लिए चावल से बने कुरकुरे भौजाय के लिए पटूवा साग , नानी के लिए अदौरी और नाना के लिए मकई का आटा । फिर जब सुबह सबेरे चलने का समय होता तो मां मुझे छप्पर पर चढ़ाते हुए कहती – एक ठो बढ़िया वाला कद्दू तोड़ो तो कमलपुर वाली बड़की भौजी को कद्दू की तरकारी बहुत पसंद है।
फिर मैं छप्पर पर फ़ैले हरी-हरी कद्दू की लत्ती से सुडौल कद्दू तोड़कर मां की झोली में डाल देता।
प्लास्टिक का उजला बोरा जबतक नही भरता मां बोरे का जान नहीं छोड़ती थी । फिर रमेसर काका की बुलाहट होती , काका बोरे को साइकिल पर लौड करते हुए कहते – “इसबार की मोटरी बड़ी धमसगर है भौजी ” मां मुस्कुरा देती ।
उस वक्त भरगामा से बनमनखी जाने के लिए नहरिया टोल , बुटी कुमर धार , बैजु पट्टी की चमकती रैगिस्तानी बालू से होकर लगभग दस किलोमीटर पैदल चलकर भटगामा पहुंचना पड़ता था । फिर भटगामा से बनमनखी जाने का एक मात्र साधन था टमटम।
रमेसर काका भटगामा में हम लोगों को टमटम पर बैठाकर लौट आते थे। दांत निकाले टूटी-फूटी ईंट सोलिंग पर टमटम टिक.. टिक.. टिक..टिक.. टिक.. टिक…..गिर्र..गिर्र….गिर्र..ची..ची..चु..चु..चु… करते चलती तो घोड़ा बेदम हो जाता ।
ऊपर से गाड़ीवान की…चाबुक.. हे..हे..हे..”चटाक’..धत..कोढिया..
चल.. उड़..के… । हिगवा, हरिपुर,मखनहा, धरहरा होते टमटम जब बनमनखी पहुंचती तब जाकर हमलोगों को जान में जान आती थी। क्योंकि उस धूल फांकती संकरी रास्ते पर हमेशा टमटम के पलटने का खतरा बना रहता था।
स्टेशन पहुंचने पर मां बगैर पुछे मुझे बनमनखी का झिलिया -मुरही, कचरी खिलाती , नैयहर के लिए मिठाई खरीदती और फिर हमलोग बरबजिया ट्रेन में आकर बैठ जाते थे । जैसे -जैसे ट्रेन खुलने का समय नजदीक आता जाता,वैसे –वैसे स्टेशन पर यात्रियों की चहल-पहल तेज हो जाती । साथ ही स्टेशन पर भीड़ से आवाज आती . ऐ… चिनिया…बदाम.ऐ…मूमफली…ऐ..खिरा..ये..।
फिर देखते ही देखते बिहारी गंज जाने वाली इकलौती ट्रेन में ऊपर -नीचे ऐसी ठसम- ठस भीड़ हो जाती मानो पेड़ पर चमबादुर लटके हो । कुछ चालाक यात्री भीड़ में अपनी जगह सुनिश्चित करने के लिए मुंह से मिठास निकालते हुए कहते — हीहीही…भाय..थोड़ा..सा..चार..ओंगरी..कनी..डोलते..तो..हम..भी..बैठ..जाते..।
हे.इने..कौन..ठेल..रहे..है..हो..।
हे.. गाड़ी..किन..लिए..हैं.. क्या ? पूरे पैर फैलाकर.. बैठे..हैं ।
दिव्यांग खंजरी पीटते हुए ट्रेन में गाते — सब.. दिन..होत..ना..एक.. समाना..हो…सब..दिन..
ऐसे ही शोर- शराबे के बीच काला -कलुटा कोयला इंजन ढेर सारा धुआं उगलता–..कुउ.उ.उ.उ.उ.उ.उ.उ..की सीटी..मारता….जय..जय..काली..
जय..जय.. काली.. करती हरियाली की चादर ओढ़े खेत-पथार , नदी,नहर, गढ्ढें, गांव -घर को पीछे छोड़ती बरहारा कोठी की ओर निकल पड़ती थी ।
नैयहर का अपना घर ही सिर्फ अपना घर नहीं होता है , पुरा टोला ही अपना घर होता है । हमलोगों को अक्सर बरहारा रेलवे स्टेशन पर रिक्शा वाले सरफराज मामा मिल जाते थे । सरफराज मामा का घर और मेरे मामा जी का घर आमने-सामने ही थे।
मां रिक्शा का भाड़ा देती तो मामा दांत से जीभ दबाकर मुड़ी हीलाते हुए बोलते — नाय..अहिलया.दाय. .नाय..तुमसे.. ..
भाड़ा..कैसे .ले.सकते है । मगर मां नहीं मानती, उनका वाजिब भाड़ा उसके कूरते की जेब में डाल देती थी।
ननिहाल में पैर छूने पर सब आशीर्वाद देते थे । मगर जो रिश्ते में मामी लगती थी उनका पैर छूने जाते तो वो मेरा हाथ पकड़ते हुए कहती ” ने..ने..आ..हा..हा..भेगना..ते.. भगवान..हेय.. छै….।
वैसे मेरी मामी तो मामा से भी ज्यादा मानती थी । जबतक हमलोग वहां रहते हर तरह का व्यंजन, पकवान और रोज मामा से कहकर मेरी पसंद की हर चीजें उपलब्ध करवाना उनका आदत बन जाता था।
मामी कहती–” अभी खेलने -खाने का उमर है , ब्याह -शादी हो जाएगा, जिम्मेदारी आ जाएगी तो बेचारा ननिहर थोड़ी न आ पाएगा ?।”
मामी की वो बातें अब याद आती है तो मानस पटल पर एक भावुक रेखाचित्र उभर आती है। वाकई परिवार के सभी लोगों की जरूरतों के बोझ तले दबकर कब हम अपनी ज़िन्दगी जीना छोड़ देते हैं , पता भी नही चलता है।
बरहारा में मामा का संयुक्त परिवार था वहां ढेरों बच्चें थे । सब बारी-बारी से आकर मेरी मां के पैर छूते। मां बोरा खोलकर सबके पसंद की चीजें बांटती।
फिर कुछ समय बाद मां निकल पड़ती बस्ती की ओर सबसे भेंट मुलाकात करने । यहां ना जाति का बंधन था ना धर्म का तकाजा मां के लिए यहां के सभी लोग या तो उनके भाई थे, या भतीजे या फिर भौजाई थी ।
मां को देखकर मुझे ऐसा लगता मानो वो यहां सिर्फ घुमने नही आती है । बल्कि अपने बचपन को जीने आती है। यहाँ की मिट्टी, नदी, पेड़-पौधों में वो अपना बचपन तलाशती है। अपनी सहेलियों को याद करती हैं। आंगन में खड़े नीम की छांव में बैठकर बीते दिनों के सुनहरे पलों को याद करती हैं। वाकई किसी भी महिला के लिए उनका नैयहर जीवन की संजीवनी है।
खैर, वहां पहुंचने के बाद मैं भी सबकुछ भूलकर वहां के लड़कों के साथ महीनों दिन धमाचौकड़ी करता। तिवारी जी के कलमबारी में आम चुनता, पेड़ पर चढ़कर कोमिक्स पढ़ता, नहर में नहाता, जमीन पर डिगिर फाड़कर गोटी कट्टो खेलता, लुडो, कैरमबोर्ड और फिर शाम में पुल्ली- डंडा का खेल, खेलते-खेलते शाम हो जाती थी । लेकिन समय को विश्राम कहां धीरे-धीरे छुट्टी बीत जाती थी, पता भी नहीं चलता था ।
वहां आज की तरह न जिम्मेदारीएँ थीं न भविष्य की चिंता, हम उन्मुक्त गगन के पंछी थे।
अरविंद कुमार, भरगामा,अररिया ✍️✍️
गर्मी से बचें,अपना ख्याल रखें, खूब पानी पीएं।