दीपावली और लक्ष्मी के अष्टरुप-सुरेश कुमार गौरव - गद्य गुँजन

दीपावली और लक्ष्मी के अष्टरुप-सुरेश कुमार गौरव

Suresh

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दीपावली और लक्ष्मी के अष्टरुप

          भारतीय मानव जीवन पद्धति में दीपावली पर्व त्योहार का भी एक अलग ही महत्व व स्थान है।
विभिन्न किंवदंतियों, मान्यताओं और ग्रंथों में उल्लिखित बातों से पता चलता है कि यह पर्व जीवन को उत्साह, साहस, समृद्धि और खुशहाल रहने की प्रेरणा देता है। कहीं समुद्र मंथन से निकली लक्ष्मी की उत्पत्ति की कहानी हैं कहीं देवराज इंद्र द्वारा महालक्ष्मी अष्टक्रम रुपा की बात की गई है।
सभी के अध्यययन उपरांत यह पता चलता है कि यह अष्ट लक्ष्मी के आठ रुप जीवन के हर क्षेत्र में सुख और समृद्धि लाने वाले होते हैं। आईए हम जानते हैं लक्ष्मी के उन आठो रुपों के बारे में जिन्हें जानना भी जरुरी हैं।

१. प्रथम रुप आदि लक्ष्मी का माना जाता है। इसका मतलब मूल लक्ष्मी अथवा महालक्ष्मी भी कहा जाता है। यानी आदि शक्ति लक्ष्मी ने ही सृष्टि की रचना की।उन्हीं से महाकाली, लक्ष्मी और सरस्वती प्रकट हुईं। सृष्टि निर्माण हेतु लक्ष्मी ने विष्णु से विवाह रचाया।

२. दूसरा रुप धारिता लक्ष्मी के नाम से जाना जाता है। इन्हें वीर लक्ष्मी के रुप में भी जानते हैं। यह रुप भौतिक और आध्यात्मिक जरुरतों को पूरा करने में जो बाधाएं आती हैं उनका निराकरण करती हैं। इन्हें कात्यायनी का रुप भी माना जाता है जो अकाल मृत्यु से भी बचाती हैं। इस रुप ने ही महिषासुर का वध किया था। धार्या लक्ष्मी युद्ध के समय विजयी दिलाती है। और इनका कार्य वीरों की रक्षा करनी भी है।

३. तीसरा रुप व नाम संतान लक्ष्मी का आता है जो स्कंदमाता के रुप में भी जानते हैं। ये गुणवान और लंबी उम्र व स्वस्थ जीवन की मंगलकारी के लिए जानी जाती हैं। यह रुप बच्चे के लिए मंगलकारी का प्रतीक माना जाता है। ये एक पिता को उनके कर्तव्य और मां को सुख आनंद की अनुभूति प्रदान करती हैं।

४. चौथा रुप विद्या लक्ष्मी का माना गया है जो शिक्षा, ज्ञान और विवेक का प्रतीक हैं। ये आत्म संदेह और असुरक्षा की भावना को दूर करती हैं। आत्मविश्वास पैदा करती हैं। व्यक्ति को विद्या लक्ष्मी विकर्षण के अलावे यह आध्यात्मिक जीवन जीना भी सीखाती है। व्यक्ति की क्षमता और प्रतिभा में निखार लाती हैं।

५. पांचवां धान्य लक्ष्मी के रुप में जानी जाती है। यह रुप प्रकृति के चमत्कारों का प्रतीक भी है। यह प्रकृति के अनुसार समानता में रहना सिखाती हैं। इन्हें अन्नपूर्णा भी कहते हैं। जिनमें कृषि, अनाज और पोषण का प्रतीक भी माना जाता है।

६. छठा रुप गज लक्ष्मी का होता है जो भूमि की उर्वरा को बढ़ाने में सहयोग करती हैं। गज लक्ष्मी के चार हाथ हैं जिनमें कमल का फूल, अमृत कलश, बेल और शंख धारित हैं। यह पशुधन और इससे समृद्धि का प्रतीक है।

७. सातवां रुप जय लक्ष्मी का है जो लोगों को अभयता दिलाने के लिए जानी जाती हैं। विभिन्न प्रकार की चिंताओं से मुक्त करने वाली होती हैं।मुश्किल परिस्थितियों में भी साहस बनाए रखने की प्रेरणा देती है।

८. आठवां रुप धन लक्ष्मी का होता है जो कर्जमुक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। ऐसी मान्यता है कि विष्णु ने कुबेर से धन उधार स्वरुप लिया था। कर्जमुक्ति के लिए ही यह रुप धरा। धन लक्ष्मी सोना, पैसा, धन और वैभव तो देती ही है साथ ही साथ इच्छाशक्ति, साहस, दृढ़ निश्चय, संकल्प और उत्साह भी पैदा करती है।

अतः लक्ष्मी के इन आठो रुपों, प्रतीकों और आधारों से मानव को प्रेरणा लेनी चाहिए और अपने कर्तव्य और कर्मों में ही प्रथमत: विश्वास रखनी चाहिए।
हमें सिर्फ हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रहकर कुछ अच्छा करते भी रहने चाहिए। सिर्फ किसी पर आश्रय न रहकर मेहनत और अपने-अपने कमाई के श्रोत जिनके लिए कर्तव्य पथ पर रहते हैं, रहने चाहिए तभी अवश्य ही सफलता कदम चूमेगी।

आपसबों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

सुरेश कुमार गौरव, शिक्षक

पटना (बिहार)

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