धैर्य वन मुर्गी की-लवली कुमारी - गद्य गुँजन

धैर्य वन मुर्गी की-लवली कुमारी

Lovely

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धैर्य वन मुर्गी की

          एक दिन मैं खिड़की से झांक रही थी कि मेरी नजर उस वन मुर्गी पर पड़ी जो मेरे घर के पोखर में अपने मुंह में कुछ पत्तों को दबाए हुए जा रही थी। मुझे बेचैनी लगी देखने की तो देखा कि वह उस पत्तों को दूर-दूर से लाकर एक जगह जमा करअपना घोंसला बना रही थी। एक तरफ उसके तीन बच्चे और उसका पति पानी में तैर रहा था और वह पत्तों को चोंच में दबा-दबाकर ला रही थी क्योंकि रात को बहुत आंधी आया था जिससे उसका घोंसला टूटकर बिखर गया था। फिर से अपनी आशियाना बनाने के लिए वह पत्ता लाकर जमा कर रही थी। काफी मेहनत के बाद उसने अपना घोंसला तैयार कर ही लिया। फिर अपने बच्चों तथा पति को बुला लाई। फिर रात हुई तो अचानक बहुत भयंकर बारिश शुरूहो गई। मेरा मन बेचैन हो उठा कि उसने कितनी मेहनत से अपना घोंसला बनाया फिर उसका घोंंसला टूट जाएगा। सुबह देखा तो सचमुच उसका घोंसला टूट चुका था। मुझे काफी दु:ख पहुंचा पर मैं कुछ कर भी नहीं सकती थी लेकिन मैंने देखा कि फिर वह अपने चोंच में पत्तों को दबाकर पानी में तैरते हुए उसी पौधे पर अपना घोंसला बनाने लगी। ऐसा कई बार हुआ। उसका घोंसला टूटा लेकिन उसने अपनी हिम्मत ना हारी। वह फिर अपना घोंसला पानी के बीचोबीच तैयार कर ही ली ।

इस हकीकत भरी कहानी को देखकर हमें यही शिक्षा मिली कि जब एक छोटी सी चिड़िया धैर्य के साथ अपनी हिम्मत से हार न मानी तो हम मनुष्य कोरोना से हार कैसे मान लें।
शिक्षा
धीरज के सामने भयंकर संकट भी धुएं की बादलों की तरह उड़ जाते हैैं।

लवली कुमारी
उत्क्रमित विद्यालय अनुपनगर
बारसोई कटिहार

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