हमारी संस्कृति का प्रतीक गंगा-देव कांत मिश्र 'दिव्य' - गद्य गुँजन

हमारी संस्कृति का प्रतीक गंगा-देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

Devkant

 हमारी संस्कृति का प्रतीक गंगा

पापनाशिनी मोक्षदायिनी
पुण्यसलिला अमरतरंगिनी।
ताप त्रिविध माँ तू नसावनी
तरल तरंग तुंग मन भावनी।।

          हमारा देश भारत धर्म व संस्कृति प्रधान देश है। यहाँ नदियों का अहम् स्थान है। यहाँ की सभी नदियों में गंगा अतिश्रेष्ठ, प्रधान व पावन नदी है। यह पाप तथा त्रिविध ताप आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक को मिटाकर मोक्ष प्रदान करती है। कल-कल करती हुई इसकी पावन धारा को जब देखते हैं तो मन मयूर हो जाता है और नयनों को अपार सुख मिलता है। एक बात दीगर है कि हम पतित पावनी गंगा तट पर जैसे ही अपना कदम रखते हैं पुण्य सलिला गंगा की धार देखकर अनुपम व नयनाभिराम दृश्य उपस्थित हो जाता है।
वाकई गंगा हमारे देश की धार्मिक विचारधारा की पारिचायिका है। अब हम माँ गंगा की पौराणिक तथा भौगोलिक कथा से रू-ब-रू होते हैं।

पौराणिक कथा: राजा सगर का प्रपोत्र अंशुमान ने गंगा जी को पृथ्वी पर लाने की कामना से बहुत वर्षों तक घोर तपस्या की लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली तत्पश्चात उनके पुत्र दिलीप ने भी काफी तपस्या की लेकिन सफलता हाथ न लगी। फिर राजा दिलीप के पुत्र भगीरथ ने बहुत बड़ी तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माँ गंगा ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि मैं तुम्हें वर देने के लिए आयी हूँ। राजा ने उन्हें विनम्रतापूर्वक कहा कि ‘आप मर्त्य लोक में चलिये।’ गंगा जी ने कहा- ठीक है। पर जिस समय मैं स्वर्ग से पृथ्वी तल पर गिरूँ उस समय मेरे वेग को कोई धारण करने वाला होना चाहिये। राजा भगीरथ ने तपस्या के द्वारा समस्त प्राणियों के आत्मा रुद्रदेव देवाधिदेव महादेव को प्रसन्न किया। सम्पूर्ण विश्व का कल्याण करने वाले महादेव ने गंगा जी को अपने सिर पर धारण किया। इस तरह माँ गंगा पृथ्वी पर आई और राजा सगर के पुत्रों का उद्धार किया।

भौगोलिक उत्पत्ति:- गंगा नदी का मुख्य स्रोत गंगोत्री हिमनद है जो केदारनाथ चोटी के उत्तर में गऊमुख नामक स्थान पर ६,६०० मीटर की ऊँचाई पर है। इसी से नीचे उतर कर गंगोत्री का पवित्र स्थान है। इस हिमानी के निकट सातोपंथ, शिवलिंग आदि कई चोटियाँ हैं। मुख्य हिमालय के कुछ उत्तर में जाह्नवी नदी निकलकर भागीरथी से गंगोत्री के निकट मिलती है। भूगर्भशास्त्रियों का विश्वास है कि गंगा का अपवाह पूर्वगामी है। यह हिमालय की श्रेणियों से भी पुरातन है। गंगा नदी की लम्बाई २५१० किलोमीटर है। यह हिमालय से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

गंगा का महत्व:
* यह हिन्दुओं की सबसे प्रमुख धार्मिक नदी है।
* इसके अपवाह प्रदेश में भारत के सबसे घने बसे और उपजाऊ राज्य उत्तरप्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल हैं जहाँ आर्यों की आदि- सभ्यता का आविर्भाव हुआ था।
* किसी भी तरह के धार्मिक कार्यों में गंगा जल का प्रयोग किया जाता है क्योंकि इस जल में कीटाणु कभी नहीं पनपते हैं।
* गंगा की मिट्टी का भी प्रयोग धार्मिक उत्सव में किया जाता है। साथ ही ऐसी मान्यता है कि इस मिट्टी को शरीर में लगाने से चर्मरोग ठीक हो जाते हैं।
* गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सारे पापों का नाश हो जाता है।
* पतित पावनी गंगा तट पर मांगलिक कार्य जैसे- मुंडन कार्य तथा छठ पर्व के अवसर पर अर्घ्य अर्पित किया जाता है।
* मरणोपरांत गंगा में राख विसर्जित करना मोक्ष प्राप्ति हेतु आवश्यक माना जाता है।

इसके साथ-साथ गंगा नदी से करोड़ों लोगों का व्यवसाय जुड़ा हुआ है। जैसे- कृषि, मत्स्य, उद्योग आदि। इसका जल व्यापक रूप से सिंचाई और कृषि प्रयोजन में उपयोग किया जाता है। यह अपने तटों पर उर्वर भूमि से हमें स्वर्ण फसलें प्रदान करती हैं। इसके तट पर अनेक महत्वपूर्ण शहर जैसे हरिद्वार, प्रयाग, वाराणसी, पटना आदि अवस्थित हैं जो धार्मिक के साथ पर्यटक स्थल भी हैं।

इस प्रकार गंगा नदी हमारे देश का पावन धरोहर है। यह माँ के समान है जो हमें निरंतर अमृतमय जल का रसपान कराती है। हमें माँ की तरह सेवा करनी चाहिए। इसे दूषित नहीं करना चाहिए। ऐसा देखा गया है कि उद्योग से नि:सृत गंदगी, रासायनिक पदार्थ, घर से निकलने वाले कूड़े कचरे प्रायः नदी में ही बहा दिये जाते हैं। अभी कोरोना काल में कितनी लाश नदी में फेंक दिये गये। यह कलुषित भाव का परिचायक है। केन्द्र सरकार द्वारा ‘नमामि गंगा’ नाम से नये एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन की स्थापना की गई है। अगस्त २००९ में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित की गई है। परन्तु गंगा को ललित कायम रखने के लिए हमें अपने मन को सुन्दर बनाना होगा। ‘मन सुन्दर तो माँ गंगा भी सुन्दर। ‘ गंगा नदी नित्य पूजनीय, वंदनीय व सेवनीय है। ऐसा भाव हमें सच्चे दिल में लाना चाहिए। ‘गंगा गंगेति यो ब्रूयात् योजनानाम् शतैरपि।’ को जीवन में उतारना चाहिए।

देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

भागलपुर, बिहार

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