प्राकृति का ख्याल-भोला प्रसाद शर्मा - गद्य गुँजन

प्राकृति का ख्याल-भोला प्रसाद शर्मा

प्राकृति का ख्याल

          कोरोना एक जंग है। आप सभी महानुभावों, मेरे भाईयों एवं मेरी दीदी जी! आपको समझाने की आवश्यकता ही नहीं है। आप मुझे खुद समझायें क्योंकि मैंने उस जमाने को अपनें आँखों से नहीं देखा है जो आप लोगों ने देखा है। उनसे जूझा है। जूझकर भी अपने अस्तित्व को कायम रखा है। यह नई बात नहीं कि लोग मरते हैं। ये तो विधि का विधान है। यह काल चक्र है। जो आया है वह एक न एक दिन अवश्य ही जाएगा। ये कटु सत्य है पर हमारी कोशिश में कदापि कमी नहीं होनी चाहिये। हमें दर-दर की ठोकरें ही क्यों न खानी पड़े। फिर भी हम आखिरी साँस तक अपनों की सेवा में लगे रहते हैं।

देखिए बिमारी भी कई तरह के होते हैं- जिसे हम साधारण सी भाषा में आम और खास का रूप देना चाहूँगा। क्या केंसर एक बिमारी नहीं है? क्या ऐड्स एक बिमारी नहीं है? जिसका कोई इलाज है ही नहीं।एकदम सीधी सी बात। मेरी माई भी दुबारा जन्म लेती है। उसे क्या नहीं सहन करना पड़ता है। क्या ! वह मातृत्व पीड़ा देख अपने संतान सुख कभी त्याग पायेंगी क्या ! मातायें अपनी दु:ख पीड़ा के कारण आगे होने वाली अपनी संतान को इस पीड़ा से दूर रख पायेंगे?अपितु कभी नहीं। यह हमारे मन में अटल सत्य की भांति बैठा हुआ है। यह तो छोटी सी समस्या है। इससे क्या डरना। ये तो यूँ ही चुटकी में गायब हो जाता है। क्या इस पल को अगले वर्षो तक याद करके मायूश हो जाते हैं। नहीं! कभी नहीं!

हमारी मौत निश्चित है। हमें मौत से डरना नहीं अपितु लड़ना है। यह सोचकर शायद कहीं जीत हमारी हो। हो सकता है अन्तिम चाभी ही मेरे द्वार खोल दे। कहा जाता है कि कोशिश कभी बेकार नहीं जाती वश हमें जीवन की उन उजालों को याद रखकर जीना है कि हम जिन्दा हैं तो जिन्दा हैं। कल की चिन्ता हम क्यों करें। मैं यह नहीं कहता की चिन्ता मत करें। हाँ! हमें चिंतन भी करनी है। अपने शरीर का अपने अंग-अंग का हमारे दैनिक चर्या का जो हमें स्वस्थ लाभ दे। अरे!कुछ समय हम घर में ही कसरत कर लेंगे। अपने परिवार में दो-चार बातें कर लेंगे। अपने बच्चों के बीच बच्चा ही बन कर जी लें तो हमारा क्या बिगड़ जाएगा।जनाब शुक्र गुजार है इस युग का कि हमें घर बैठे सारी सुविधा उपलब्ध हो जाती है। कहाँ वह जमाना था जो कोसों दूर पैदल चलकर अपने काम को अंजाम देते थे। आज बटन दबाओ पानी पाओ, बटन दबाओ दोस्तों को मनाओ। हद तो तब होती थी जब हमें अपने गलती का एहसास खड़े होकर हाथ जोड़कर मांफी माँगने पड़ते थे। यार अब तो इसमें भी इजाफ़ा हो गया। न तो किसी का डर न ही दोस्तों के बीच खड़े होने का फिक्र। हेलो! यार मुझसे थोड़ी गलती हो गई। सॉरी! बस गलती माँफ़। इतनी सारी खुशियाँ, सुख-सुविधा होने के बाद मेरे दोस्त अगर अभी हम हार गये तो समझो ऊपर बैठे तीनों देव भी हमें समझा नहीं पायेंगे क्योंकि समझाया भी उन्हीं को जाता है जो समझने की कोशिश करता है।

एक जमाना था जब लोग खाने के लिए तरसते थे, अभी तो पिज्जा वाले भी घर छोड़ जाते हैं। शायद प्रकृति हमारी परीक्षा ले रही हो या उनका हमारा मॉडर्न युग का रहन-सहन थोड़ा अच्छा नहीं लगता हो। भूल तो हमारी भी है। हमें सिर्फ अपनों का ही ख्याल आता है। कुछ पल के लिए अपने भी गैरों की पद्धति में पँक्तिबद्ध हो जाती है। ये तो पल भर के लिए आया है। शायद बहुत जल्द ही अपना बोरिया-विस्तर बाँध लें तो क्यों हम इसके लिए परेशान होंगे।अपना ख्याल रखें। सही समय से भोजन लें। बार-बार हाथ धोते रहें। सेनेटाईजर का भी प्रयोग करें। अगर ज्यादा जरुरत हो तो बाहर भी जाएँ। हाँ! याद रहे अपने नियमों का भी पालन करें।

थोड़ी दूरी बनाकर रख लें। मॉस्क भी पहन लें। कितनी वजन होगी, अरे! एक फौजी तो मेरे लिए बीस किलो तक का बोझ लेकर घूमते रहते तो क्या मैं अपने लिए एक मास्क भी नहीं सम्भाल पायेंगे। वस!मन में विश्वास होना चाहिए। अपने जीने की और दूसरों के जीने के लिए। पता है आप पर कितनी निगाहें टिकी है। हो सकता है आपके मुस्कुराहट पर कितने घर आबाद हो रहे होंगे पर हमें क्या! मुझे तो औरो की पड़ी है। उनके बातों को गौर से सुनने की, अफवाहों को गले न लगाने की। भाई जब हम एक परिवार का भरण-पोषण स्वयं अपने बल पर कर सकते हैं। हमें किसी की राय की जरुरत नहीं पड़ती तो हम क्यों उनकी फालतू का बकवास सुनें। क्यों उनके कारण मन में बोझ पालें। हो सकता है हमारे परिवार को जुदा करने का उनमें विचार उत्पन्न हो रहा हो। कहीं हमारी खुशी उसे खल रही हो।

वस! जाते-जाते मैं यही कहूँगा। अगर तुम स्वस्थ हो, धनवान हो, धैर्यवान हो तो सब ही तुम्हारे साथी है। वर्णा झुकी डाल पर तो—-। फिर क्या! हमें एकदम मस्त रहना है, “प्राकृति का ख्याल” रखना है। अपने मन से डर को यूँ निकाल फेंकना है। वस सोंच साकारात्मक होना चाहिए। जीवन-मरण तो किसी के हाथ में नहीं है। जब जो होगा देख लेंगे। सब अपना ख्याल रखें, नियम का पालन करें।

भोला प्रसाद शर्मा (शिक्षक)
डगरूआ, पूर्णिया (बिहार)

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