प्रेमचंद हमारे युगद्रष्टा-देव कांत मिश्र 'दिव्य' - गद्य गुँजन

प्रेमचंद हमारे युगद्रष्टा-देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

Devkant

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प्रेमचंद हमारे युगद्रष्टा

          आज हमारे देश के जाने-माने कथा सम्राट उपन्यासकार, युगद्रष्टा मुंशी प्रेमचंद की जयंती है। जरा कुछ क्षण के लिए विचार किया जाय कि हमलोग जयंती क्यों मनाते हैं? हम जयंती इसलिए मनाते हैं कि आज उनका जन्म दिन है तथा दूसरी ओर उन्होंने अपनी लेखनी से साहित्य व समाज को एक नई जीवंत दिशा प्रदान की। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को बल प्रदान किया। हिन्दी साहित्य को अपनी बुद्धि, विवेक, ज्ञानकौशल व सूझ- बूझ से समृद्ध, रोचक व सरस किया। हिन्दी साहित्य में लोकप्रियता की दृष्टि से मुंशी प्रेमचंद का अहम स्थान है। इन्होंने हिंदी के कथा साहित्य को एक नवीन जीवंतता प्रदान की और हिंदी के उपन्यासों तथा कहानियों को समाज के साथ जोड़ दिया। आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी कथा साहित्य की प्रतिष्ठा करके प्रेमचंद उपन्यास सम्राट ही नहीं, भारतीय जनता के हृदय सम्राट भी बने पर आज हिंदी का दुर्भाग्य है कि भारतीय जनता इनकी साहित्यिक रचनाओं से अपेक्षित लाभ नहीं उठा सकी। इन्होंने भारतीय समाज को उसके समग्र रूप में देखा, परखा तथा समाज के सम्पूर्ण परिवेश को अच्छी तरह से समझा। परंतु विशेष रूप से उनका क्षेत्र भारत के ग्रामीण जन एवं खेतिहर किसानों का हृदय रहा। सच पूछा जाय तो निम्न व मध्य वर्ग का ऐसा संबल पक्षधर कदाचित ही कोई अन्य साहित्यकार मिल सके। वे मानवतावादी लेखक व उच्च कोटि के कलाकार थे। वह किसी वाद विशेष या विचार विशेष के प्रति प्रतिबद्ध नहीं थे। वह सम्पूर्ण समाज के कल्याण में तथा सामाजिक मर्यादा के निर्वाह में भारत का कल्याण देखने वाले सच्चे कलमकार थे।

जीवन परिचय

इनका जन्म 31 जुलाई 1880 ई. को वाराणसी के निकट लमही नामक गाँव में हुआ था। इनके बचपन का नाम धनपतराय था। इनके पिता का नाम श्री अजायबराय तथा इनकी माता का नाम श्रीमती आनंदी देवी था। जब वे आठ वर्ष के थे तब इनकी माता का स्वर्गवास हो गया फलस्वरूप इन्हें अपनी विमाता का भी अत्याचार सहन करना पड़ा। इनका बचपन कष्टों में ही बीता। फिर भी सारी बाधाओं, कठिनाईयों को झेलते व उसे पार करते हुए मैट्रिक की परीक्षा पास की। आगे चलकर बी.ए. की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। 15 वर्ष की अवस्था में इनकी शादी हुई परन्तु यह टिकाऊ नहीं रही। पहली पत्नी के कुविचार से तंग आकर इन्होंने शिवरानी के साथ दूसरी शादी रचा ली। वह उनके जीवन में सफल जीवन संगिनी सिद्ध हुई। मानो वह एक नई रोशनी बनकर आई। आगे चलकर वे सरकारी अध्यापक के साथ-साथ इन्सपेक्टर के पद पर भी पहुंँच गए थे। सन 1920 ई. में गाँधी जी के सम्पर्क में आकर असहयोग आंदोलन में कूद पड़े और कई बार जेल भी गए। आगे चलकर सम्पादन के रंगमंच में प्रवेश करते हुए माधुरी, हंस, जागरण और मर्यादा जैसी उच्च कोटि की पत्रिकाओं का सम्पादन किया।

व्यक्तित्व व कृतित्व

इनका व्यक्तित्व काफी सीधा व सरल था। ऐसा प्रतीत होता है कि माता की मृत्यु, अनमेल विवाह, विधवा विवाह और गरीबी के आधार पर ही इनके व्यक्तित्व का निर्माण हुआ। नमक सत्याग्रह के दिनों में इन्होंने अमीनाबाद में स्वयंसेवकों को खद्दर का धोती-कुर्ता देकर यह कहकर  विदा करते थे कि ‘मेरे बेटो! जाओ, मैं शीघ्र ही तुम्हारे पीछे जेल आ रहा हूंँ।’

इन्होंने अपनी प्रथम उर्दू कहानी दुनियाँ का सबसे अनमोल रत्न में यह दिखाया कि अपनी मातृभूमि की सेवा में बहाये गए खून की बूँद दुनिया की सबसे अधिक महत्वपूर्ण चीज है। सन 1908 में उनका प्रथम कहानी संग्रह शोजेवतन प्रकाशित हुआ। फिर इन्होंने साहित्य को हृदय से सम्यक गले लगा लिया, साहित्यानुराग बढ़ते ही गया। इनके उपन्यासों में सेवा सदन, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि, प्रेमाश्रय व गोदान प्रमुख हैं। कहानी संग्रह में सप्त सरोज नव निधि, प्रेम पचीसी, प्रेम-पीयूष, सप्त सुमन, कफन तथा मानसरोवर प्रसिद्ध हैं तो नाटक में संग्राम, कर्बला व प्रेम की वेदी तो जीवन चरित्र में दुर्गादास तथा मौ. शेख़शादी प्रमुख हैं। प्रेमचंद के प्रथम उपन्यास वरदान में प्रेम विवाह की समस्या का चित्रण, प्रतिज्ञा में विधवाओं की समस्या तथा सेवा सदन में वेश्या- समस्या का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है। प्रेमाश्रय में किसान और जमींदार के संबंधों का चित्रण, निर्मला में दहेज प्रथा एवं अनमेल विवाह की समस्या, कर्मभूमि में हिंदू-मुस्लिम एकता अछूतोद्धार, किसानों के उत्थान का जीता-जागता वर्णन व सुन्दर चित्रण किया गया है। अंतिम व सर्वश्रेष्ठ उपन्यास ‘गोदान’ में हमारे देश के शोषित किसानों के जीवन संबंधी समस्याओं का सटीक चित्रण किया गया है। गोदान में भारतीय किसान होरी अकेला रह जाता है। वह भगवान और भाग्य के नाम पर सब कुछ बर्दाश्त करता है परन्तु उसका लड़का गोबर व्यवस्था के प्रति पूर्ण रूप से विद्रोही हो जाता है। गोबर यहाँ स्पष्ट संकल्प करता है कि भाग्य हमें स्वयं बनाना होगा। तात्पर्य है कि वे अपनी मेहनत व लगन से भाग्य को बदलने के पक्षधर थे।

वाकई प्रेमचंद के उपन्यास अपने युग की परिस्थितियों एवं समस्याओं से रू-ब-रू कराता हुआ एक स्वच्छ आईना है। प्रेमचंद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से यह संदेश मिलता है कि हम गाँव समाज से जुड़कर रहें, समाज में व्याप्त विभिन्न तरह की कुरीतियों का मिलकर समाधान करें तभी राष्ट्र की दिशा बदलेगी। सच में, मुंशी प्रेमचंद दीपक की तरह जलकर प्रकाश प्रदान करने वाले साहित्यकार हैं। उनकी जयंती तभी सफलीभूत होगी जब हम सही दिल से समाज से जुड़कर साहित्य को समृद्ध करने की दिशा में अपना एक कदम सकारात्मक व मजबूती से आगे बढाएँगे।

देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

भागलपुर, बिहार

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