राज योग- मधुमिता - गद्य गुँजन

राज योग- मधुमिता

Madhumita

राज योग

            राजयोग को समझने के लिए सबसे पहले हम योग को समझते हैं| योग अर्थात मेल, जैसे गणित में 2 + 2=4 होता है। दो और दो मिल जाने पर चार हो गए, उसी प्रकार हम मनुष्य जब किसी दूसरे मनुष्य को याद करते हैं, तो उस मनुष्य के साथ हमारा योग हो जाता है| मैं कौन?……. अब समझते हैं कि मैं कौन हूं? क्या मैं केवल शरीर हूं, एक मानव शरीर या फिर वो नाम जो हमारे माता-पिता ने हमें दिया या फिर वो पद जो हमने अपनी क्षमता से अपनी मेहनत से प्राप्त की है। जैसे मैं मधुमिता, मधुमिता मेरा नाम है, मैं एक शिक्षिका हूं जिसे मैंने अपनी क्षमता और अपनी मेहनत से प्राप्त किया है। मैं किसी की बेटी हूं, किसी की बहन हूं, किसी की शिक्षिका हूं, किसी की सहेली हूं। इस प्रकार भिन्न भिन्न पहचान है मेरे पर वास्तविक रूप में मैं कौन हूं? मैं एक आत्मा हूं, मैंने इस शरीर में प्रवेश किया है, मधुमिता मेरे शरीर का नाम है, सारे रिश्ते इस शरीर से जुड़े हुए हैं और सारे पद भी इस शरीर ने प्राप्त किए हैंं। यह सब कुछ इस शरीर के साथ समाप्त हो जाएगी, यह नाम यह पद यह रिश्ते, शरीर के समाप्त होते ही समाप्त हो जाएंगे।

राजयोग को समझने के लिए सबसे पहले समझना होगा कि मैं कौन हूं? मैं एक अजर, अमर, अविनाशी आत्मा हूं। मैं एक उर्जा हूं, ऊर्जा का कभी विनाश नहीं होता, हां ऊर्जा का रूपांतरण होता है। मुझ आत्मा ने इस शरीर में कितने ही जन्म लिए, कितने ही शरीरों को त्यागा पर मैं कभी मरती नहीं। मैं आत्मा इस शरीर के द्वारा कर्म करती हूँ। इस संसार की स्टेज पर अपना पार्ट बजा रही हूं। इस मानव शरीर को चलाने वाली शक्ति हूं मैंं। मैं परमाणु की तरह शक्तिशाली और सूक्ष्म हूं, चमकते हुए सितारे की तरह जगमगाती ज्योति हूँ। मैं मानव शरीर के मस्तक पर दोनों भृकुटियों के मध्य निवास करती हूं। जैसे कार का ड्राइवर सीट पर बैठ कर गाड़ी ड्राइव करता है ठीक उसी प्रकार मैं आत्मा इस शरीर रूपी गाड़ी को चलाती हूं। मैं आत्मा आंखो द्वारा देखती हूं, कानों द्वारा सुनती हूं, मस्तिष्क द्वारा सोचती हूं, मुख के द्वारा बोलती हूं। अगर कार का ड्राइवर कार से निकल जाए तो तो कार आगे नहीं बढ़ सकती, ठीक उसी प्रकार मैं आत्मा इस शरीर से निकल जाऊं तो यह शरीर कुछ नहीं कर सकता। मैं आत्मा, परमात्मा की संतान उनकी ही तरह असीम शक्तियों का स्वामी हूँ। सारे गुण जो परमात्मा में हैं, मुझमे भी है, आवश्यकता है तो बस अपनी शक्ति को पहचानने की, उसका उपयोग करने की| आज मैं आत्मा स्वयं को भूलकर शरीर को ही सत्य समझ बैठी हूँ, जो शरीर नस्वर है उसपर ही सारा ध्यान केंद्रित कर दिया है। यही कारण है भय, चिंता, मोह, लोभ, क्रोध और ईर्ष्या का। आत्मा कभी मरती नहीं वो तो शाश्वत है।जिसने ये जान लिया, उसे कभी मृत्यु का भय नहीं होगा। इसलिए एक सुन्दर और खुशहाल जीवन जीने के लिए इस स्मृति को पक्का करें कि मैं अजर, अमर, अविनाशी, चैतन्य आत्मा हूँ जिसका पिता सर्वशक्तिमान परमात्मा है। जब हम स्वयं को आत्मा निश्चय कर अपने परम पिता परमात्मा को याद करते हैं, उसे राजयोग कहते हैं। अर्थात आत्मा से परमात्मा के मिलन को राजयोग कहते हैं।

मधुमिता

पूर्णिया (बिहार)

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