समझू-विजय सिंह नीलकण्ठ - गद्य गुँजन

समझू-विजय सिंह नीलकण्ठ

समझू

          मे आई कम इन सर? समझू ने वर्ग कक्ष के दरवाजे पर खड़े होकर वर्ग शिक्षक से पूछा। हॉं-हॉं आईए, आईए, आप ही का तो वर्ग कक्ष है। आईए अंदर आईए। समझू सिर झुकाए वर्ग कक्ष में प्रवेश कर सबसे पीछे खाली पड़े बेंच पर जाकर बैठ जाता है। तभी मास्टर जी कहते हैं, मुझे यह बात समझ में नहीं आ रही है समझू कि तुम हर दिन प्रथम घंटी की समाप्ति से पॉंच-दस मिनट पहले कक्षा में आते हो। देखो तो, सभी बच्चे ससमय विद्यालय आते हैं लेकिन तुम इतनी देर से क्यों आते हो? लेकिन समझू सिर झुकाए चुपचाप रहता है। वह कुछ नहीं बोलता है। फिर घंटी बजती है और गुरु जी अपनी कक्षा से बाहर चले जाते हैं। बगल में बैठे बच्चे भी समझू से पूछते हैं कि अरे समझू तुम हर दिन लेट क्यों करते हो? लेकिन वह किसी से कुछ नहीं कहता है।
          अगले दिन जब गुरुजी विद्यालय आ रहे होते हैं तो समझू के पिता पर उनकी नजर पड़ती है। फिर क्या जो एक आदर्श गुरुजी का काम है वही शुरू हुआ। जैसे हीं समझू के पिता ने प्रणाम मास्टर साहब कहा तभी मास्टर जी ने पूछा कि आपका बेटा समझू हर दिन देर से विद्यालय क्यों आता है? थोड़ा ध्यान दीजिए। उसकी हर दिन के प्रथम घंटी की पढ़ाई छूट जाती है। यह अलग बात है कि छूटी पढ़ाई को वह अन्य बच्चों से ज्ञात कर लेता है लेकिन यदि वह समय पर आएगा तो और भी अधिक ज्ञान होगा ना।
          समझू का पिताजी आश्चर्यचकित होकर सब सुन रहा था। गुरु जी की बातें समाप्त होते ही बोला, नहीं मास्टर साहब, समझू तो प्रतिदिन नौ बजे से पहले तैयार होकर विद्यालय के लिए निकल पड़ता है तो फिर देर से क्यों पहुॅंचता है! वह तो बहुत ही समझदार है जिस कारण उसका नाम भी समझू रखा गया है, पता नहीं! मास्टर जी ने कहा, ठीक है कोई बात नहीं आप समझू से कुछ नहीं कहियेगा। मैं ही पता करता हूॅं कि वह कहॉं जाता है।
          अगले दिन मास्टरजी सुबह 8:30 बजे चुपचाप समझू के पड़ोसी के दरवाजे पर आकर बैठ गया और समझू के घर से निकलकर विद्यालय जाने की प्रतीक्षा करने लगा। जैसे ही समझू बस्ता लेकर विद्यालय के लिए निकला गुरुजी भी उसके कुछ देर बाद उसके पीछे चल दिया। समझू बड़ी तेजी से पास के गांव की ओर जा रहा था। तभी गुरु जी ने देखा कि उस गांव के दो-चार घर के बाद समझू एक झोपड़ीनूमा घर में घुसा और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। मास्टर जी दौड़कर उस घर के पीछे जाकर बैठ गए।
          तभी आवाज आई आ गया बेटा? हॉं मौसा जी, समझू ने कहा और बोला जानते हैं मौसा जी आज आपके सब्जी के लिए करेला खरीद कर लाया हूॅं। आपको करेले का भुंजिया बहुत पसंद है ना। अब मैं जल्दी से इसे काटकर कराही में चढ़ा देता हूॅं फिर घर की सफाई कर आटा गूथ लूॅंगा तब तक सब्जी पक जाएगी फिर रोटी बनाकर जल्दी से विद्यालय चला जाऊॅंगा। ठीक है बेटा समझू के मौसा जी ने समझू से कहा। यह बात सुनते ही मास्टर जी अवाक रह गए कि इतना छोटा बच्चा कितना समझदार है और अपने बूढ़े मौसा जी के लिए बिना किसी की परवाह किए हर दिन आकर खाना पका देता है। मास्टर जी भावुक हो गए और तुरंत उस झोपड़ी के दरवाजे को खटखटाया। कुछ देर बाद समझू के मौसा जी ने दरवाजा खोला और मास्टर जी को सामने देखकर पूछा, कहिए मास्टर साहब क्या बात है? इधर समझू चौकी के नीचे जाकर छुप गया। मास्टर जी ने पूछा समझू कहॉं है? मौसा जी ने कहा- समझू, देखो मास्टर साहब आए हैं और तुम्हीं से मिलने की बात कह रहे हैं। ऐसा कह कर मास्टर जी को घर के अंदर बुलाकर बैठने को कहा लेकिन समझू कहीं दिख नहीं रहा था। अरे तुरंत कहॉं चला गया पता नहीं अभी तो यहीं था।
          तभी मास्टर जी ने कहा समझू बेटा चौकी के नीचे से बाहर आ जाओ। मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूॅंगा। समझू तुरंत चौकी के नीचे से निकलकर खुश होकर बोला, मास्टर जी आप मुझे कुछ नहीं कहेंगे! आप जाइए, मैं मौसा जी के लिए खाना बनाकर तुरंत आ जाऊॅंगा। ऐसा सुनते ही मास्टर जी ने समझू का हाथ पकड़ा और आशीर्वाद देते हुए कहा, बेटा अब मुझे समझ में आ गई कि तुम हर दिन विद्यालय देर से क्यों आते थे। मैं तुमसे बहुत खुश हूॅं। तुम अब अपने मौसा जी के खाने की चिंता छोड़ दो और समय पर विद्यालय आओ। मैं हर दिन तुम्हारे मौसा जी के लिए अपने घर से खाना लाकर दिया करूंगा। सच में मास्टर जी, ऐसा सुनते ही समझू चहक उठा और कहने लगा, जानते हैं सर जी जब से मौसी जी का देहांत हुआ है तब से मौसा जी चिंतित रहने के कारण बीमार रहते हैं। यहाॅं तक कि खाना भी नहीं बना पाते हैं। जब मैंने अपने मम्मी-पापा से कहा तो उन्होंने मुझे डाॅंट दिया और मुझे भी मौसा जी से किसी भी प्रकार का मतलब रखने से मना कर दिया है क्योंकि एक बार मेरे पिताजी और मौसा जी के बीच कुछ कहा-सुनी हो गई थी। इसलिए मैं चुपचाप आकर इनके लिए खाना बना दिया करता हूॅं। मैं ठीक कर रहा हूॅं ना मास्टर जी? हाॅं बेटा। तभी मास्टर जी ने समझू को गले से लगा लिया और बोला, हे ईश्वर! सब को समझू जैसी संतान देना। फिर उसे उस दिन का खाना बनाकर विद्यालय आने को कहा और अगले दिन से स्वयं समझू के मौसा जी के लिए खाना अपने घर से लाकर देने का वचन दिया। अब समझू भी हर दिन ससमय विद्यालय आने लगा।
          इस कहानी से पता चलता है कि हम बड़े लोग छोटी-छोटी बातों पर एक-दूसरे से मतलब रखना बंद कर देते हैं लेकिन समझू जैसे बच्चे हर घर में है जो हमारे सगे संबंधियों को अच्छी तरह जानते हैं। उनकी मदद को हमेशा तैयार रहते हैं।
विजय सिंह नीलकण्ठ
सदस्य टीओबी टीम
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