स्नेह-प्रेम के दो शब्द-देव कांत मिश्र 'दिव्य' - गद्य गुँजन

स्नेह-प्रेम के दो शब्द-देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

Devkant

स्नेह-प्रेम के दो शब्द 

          लॉकडाउन का पहला चरण, दूसरा चरण फिर तीसरा चरण को तो मैंने अपनी आँखों में बसा लिया, उसे अच्छी तरह झेल लिया। अब चौथा चरण भी देखो आ ही गया। यानि यह लगता है कि अभी यह पीछा छोड़ने वाला नहीं है, पीछा छोड़ने वाला नहीं है। आगे का चरण भी हो सकता है कि रुकने का नाम नहीं ले। लॉकडाउन के चौथे चरण के पहले हमारे समाज के दो चार लड़के कभी आपस में कानाफूसी, तो कभी एक दूसरे से घुनूर-मुनूर कर रहे थे। एक बार मुझे हवा के झोंकों के साथ हल्की आवाज सुनाई पड़ी। लगता है कि कोई बाहर से — आया, देखो! आया —– हुआ— है। रह रहकर आवाज आ रही थी। बीच-बीच में वे सब मेरी तरफ भी देखते थे। कभी आँखों से ओझल भी हो जाते थे। कभी इधर – उधर ताँक झाँक करते थे। मैंने इतना ही सुना कि उसे झट से पूछ ही लिया क्या बात है बाबू? तनिक मुझे भी बताओ ना। उनमें से किसी एक ने तपाक से कहा भाई , कोई आने वाला है बाहर से। मैंने कहा- कोई बात नहीं, चलो देखते हैं और दो चार लोगों से पता करते हैं। सच में, कोई आने वाला ही था और आ भी चुका था। इसके पहले पाँच दस लोग उसके घर के पास जा चुके थे। उनमें से कुछ भले बुरे कह चुके थे। कोई मार झगड़ा करने हेतु उतावले थे। बात मेरे कानों तक पहुँची। एक तो मन पहले से ही बार बार कुरेद रहा था- क्या करुँ, क्या कहूँ? कैसे समझाऊँ इस परिस्थिति में उसे।इसी बीच मेरी नज़र अपने बच्चों को दाना खिलाती एक चिड़िया पर पड़ी। वह बड़े ही प्यार से बच्चों को दाना खिला रही थी। बड़ा ही सुन्दर दृश्य था। मन उसे देख देखकर तड़प रहा था। उसी वक्त मेरे मन में स्नेह- प्रेम का भाव और ही ज्यादा उमड़ पड़ा। मैं उसी वक्त एक मित्र को साथ लिए चल पड़ा। वह भी कोई और नहीं, एक शिक्षक ही जिनका नाम था चन्द्र कांत। सच में, चाँद की तरह ही बड़ा शांत व सौम्य स्वभाव का था। एक दूसरे को ठीक से पढ़ समझ लेने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। एक दूसरे को प्यार से समझाने की असीम क्षमता व ताकत थी। उनकी भी आंँखों में स्नेह-प्रेम व साहस का भाव छलक रहा था। दोनों उसके घर के पास गए। मैंने उसे प्यार से बुलाया। देखते ही देखते दो चार अभिभावक भी सामने आ गए। वे भी एक दूसरे से दूरी बनाए हुए थे। एक दूसरे से शारीरिक व सामाजिक दूरी का पालन करते हुए, आंँखों-आंँखों से बात करते हुए मैंने उसे प्यार भरे शब्दों में समझाना शुरू किया। देखो! घर किसे प्यारा नहीं लगता ? पक्षीगण भी घोंसलों में रहते हैं। यूँ कहें तो घर सभी प्राणियों को प्यारा लगता है। अच्छा हम सब तो घर ही में ही रहते हैं न। आप बाहर से आए हुए हैं, सो ठीक है। आप सारी बात से अवगत हैं। यह कोरोना वायरस बड़ा ही घातक है, इसकी चपेट में सारी दुनियाँ के लोग हैं। क्या आप जानते हैं इससे बचने का कौन सा सबसे सरल उपाय है? जबाव मिलता है सामाजिक दूरी (Social distancing)। वाह! आपने तो ठीक कहा। लगता है इस विषय में आप बहुत कुछ जानते हैं। इस संकट की घड़ी में हमें स्वयं को सुरक्षित रखना है और दूरी कायम रखके अपने परिवार को भी सुरक्षित रखना है। घर सुरक्षित तो समाज सुरक्षित, समाज सुरक्षित तो अपना राष्ट्र भी सुरक्षित। अब बिल्कुल ठीक से मेरी बातों को वह समझ चुका था। प्रसन्नता की रेखाएँ साफ-साफ झलक रही थीं। मेरी प्यार भरी आँखों को वह ठीक से पढ़ चुका था। वाकई एक शिक्षक ही सामाजिक परिवर्तन ला सकते हैं, लोगों के व्यवहार को स्नेह व प्रेम रूपी जादुई छड़ी से बदल सकते हैं। इसी बीच उनके मुँह से प्रेम के दो शब्द फूट पड़े- वाह भैया! वाह सर! आपके स्नेह-प्रेम का कोई जवाब नहीं। आपके स्नेह रूपी दो शब्द ने मेरी आँखों की पट्टी खोल दी, मेरे विचार में परिवर्तन ला दिया, मेरे दिल को छू लिया। मैं कल नहीं, आज से ही सामाजिक व शारीरिक दूरी बनाकर कोरोना से जंग जीतने में सहायक बनूँगा और दूसरों को भी बताऊँगा। वाकई उसे सही राह पर लाने में स्नेह-प्रेम रूपी दो शब्द ही मेरे लिए काम आया।
स्नेह-प्रेम के जो, शब्द हैं बरसाते।
वो समाज क्या, सारा जग छा जाते।।

  देव कांत मिश्र 'दिव्य'  

मध्य विद्यालय धवलपुरा

सुलतानगंज भागलपुर
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4 thoughts on “स्नेह-प्रेम के दो शब्द-देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

  1. बेहद उत्कृष्ट…. लाजवाब रचना सर👌👌👌
    हार्दिक बधाई💐💐💐💐💐

  2. बहुत ही उम्दा और अनुपम २चना सर। स्नेह का इतना अच्छा परिणाम।वाकई र्काबले तारीफ।

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