"होनहार बालक" - श्री विमल कुमार"विनोद" - गद्य गुँजन

“होनहार बालक” – श्री विमल कुमार”विनोद”

Bimal Kumar

पृष्ठभूमि-मनोज एक दिन टहलते हुये गाँधी मैदान पटना पहुंचा।वहाँ उन्होंने एक बालक को एक “कागज का टुकड़ा” उठाकर पढ़ते देखा।बालक जो की गरीबी की मार से त्रस्त था एक पुरानी हॉफ पेंट और एक पुरानी टी-शर्ट पहना हुआ था।उसे
देखकर मनोज ने उस बालक को बुलाया और उसका नाम पूछा।इस पर वह बच्चा उसके पास आकर अपना नाम राजा बताया।
उसके बाद मनोज उस बच्चे को अपने साथ ले जाकर पढ़ाता है।उसकी परवरिश करने का प्रयास करता है,फिर जीवन में तरक्की करता है।
विस्तार- यह घटना आज से लगभग 40 वर्ष पहले की है,जब मोहन पटना के एक लॉज में रहकर अपनी पढ़ाई कर रहा था।एक शाम जब वह घूमने के लिये गाँधी मैदान गया तो उसने देखा कि एक आठ वर्ष का बच्चा जो कि गरीबी की मार से थका हुआ,शरीर पर एक पुरानी टी-शर्ट तथा हॉफ पेंट पहना हुआ,सांवला रंग का जो कि जमीन पर पड़ा हुआ एक कागज को उठाकर पढ़ रहा था।मनोज जब उसको देखा तो लगा कि वह”बालक होनहार” हो सकता है,यह सोचकर मनोज ने उस बालक को कहा कि तुमको पढ़ने की इच्छा है।इतना सुनते ही लड़के ने मनोज को डबडबाई हुई नजर से देख कर मानो अपने पिता की तरह सीने से लिपट गया। उसके बाद मनोज ने उसका नाम पूछा तो वह बालक अपना नाम राजा बताया।फिर मनोज उस बालक को अपने साथ अपने कमरे पर ले जाता है,उसको अपने पुत्र की तरह पालन-पोषण करके,उसका पटना के एक सरकारी विद्यालय में नामांकन करवा देता है। इसके बाद वह प्रतिदिन विद्यालय पढ़ने जाता है।विद्यालय में पिता के नाम के स्थान पर मनोज अपना नाम लिखा देता है।
कुशाग्र बुद्धि का राजा जो कि विद्यालय में लगातार सुन्दर अंक लाकर प्रथम स्थान प्राप्त करता है।विद्यालय के कार्यक्रम में वह अच्छा स्थान लाता है।साथ ही इसको यह भी लगता है कि मैं अपने खर्च का कुछ स्वंय कार्य करके अर्जित कर लूँ तथा वह
अपने बचे हुये समय में कभी कभार कुछ काम करके रूपये अर्जित भी कर लेता है।
आगे वह दसवीं की परीक्षा में अब्बल दर्जे का अंक लाकर विद्यालय का नाम रौशन करता है तथा इसके द्वारा शैक्षणिक क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन को देखते हुये प्रिंसिपल साहब उसके आगे की पढ़ाई को निःशुल्क कर देते है, जिससे राजा के संरक्षक सह अविभावक बहुत खुश होते हैं। इसी बीच सौभाग्य वश मनोज की नौकरी शिक्षक के रूप में हो जाती है,जिससे राजा को आगे की पढ़ाई कराने में सुविधा होती है। इसके राजा बाद स्नातक की उपाधि प्रथम वर्ग से प्राप्त करने के बाद उसके संरक्षक मनोज को राजा के द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में लगातार उन्नति किये जाने से मनोज को बहुत खुशी होती है तथा उसे प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने को कहते हैं और राजा तरह-तरह की प्रतियोगिता परीक्षा देता है,जिसमें वह सफल होता है तथा वह बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षा में सफलता प्राप्त करके जब अपने अविभावक तथा संरक्षक मनोज से मिलता है ,तो मनोज के आँखों में प्रेम,भावना,सदकर्म,परोपकार के आँसू छलक पड़ते हैं।
इसके बाद राजा पदाधिकारी बन कर जनता की सेवा करता है।
संदेश-इस लघुकथा से लोगों के बीच कई प्रकार के संदेश जाते हैं जिसमें कि किसी भी बच्चे को जिसमें होनहार होने की संभावना नजर आती है तो,उसको आगे बढ़ने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये ताकि वह देश की तरक्की तथा विकास को आगे ले जा सके।
दूसरी बात यह है कि मनोज ने गाँधी मैदान में भटकते उस अनाथ बालक को गोद लेकर, वास्तव में परोपकार की परिभाषा
को सरजमीं पर लाकर खड़ा कर दिया।
इस लघुकथा को लेखक ने अपनी सकारात्मक सोच तथा जनहित को ध्यान में रखकर कलमबद्ध करने का प्रयास किया है।
अंत में लेखक की सोच है कि इस प्रकार की लघुकथा बच्चे-बच्चियों को होनहार होने को प्रेरित करेगा।
आलेख साभार-श्री विमल कुमार”विनोद” प्रभारी प्रधानाध्यापक
राज्यसंपोषित उच्च विद्यालय पंजवारा ,बांका(बिहार)।

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