योग ने मेरे जीवन में क्या परिवर्तन लाया
मेरा नाम निखिल है
शुरुआत: जब ज़िंदगी बिखरी हुई थी
बात करीब 2015-16 की है जब मैं गोरखपुर विश्वविद्यालय का छात्र था तब मेरी ज़िंदगी भागती हुई ट्रेन जैसी थी। सुबह 4बजे ट्रेन पकड़ कर सिवान से गोरखपुर जाना. शाम को करीब 8 बजे घर आना। रोज थका होना,26 की उम्र में BP का सामना करना पड़ रहा था। डॉक्टर ने कहा “लाइफस्टाइल बदलो वरना दवाई शुरू करनी पड़ेगी”। नींद गोलियों से आती थी। गुस्सा नाक पर रहता था। फिर मैं गोरखपुर में दाऊदपुर एरिया में कमरा लिया और माँ को साथ ले गया।
एक दिन माँ ने हाथ पकड़कर कहा, “बेटा, 10 मिनट सुबह मेरे साथ योग कर ले। कुछ नहीं तो सूर्य नमस्कार ही कर ले।” मैंने मज़ाक में कहा, “माँ, ये बूढ़ों के काम हैं”। पर उनकी आँखों में फिक्र देखकर अगले दिन चटाई बिछा दी। वही दिन मेरी ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट बन गया।
पहला महीना: शरीर ने जवाब देना शुरू किया
शुरू में सूर्य नमस्कार के 2 राउंड में ही सांस फूल जाती थी। कमर पकड़ लेती थी। ताड़ासन में 30 सेकंड खड़ा होना पहाड़ लगता था। पर माँ रोज़ साथ देती रहीं।
15 दिन बाद पहला बदलाव दिखा। सुबह उठकर फ्रेश फील होने लगा। पहले कॉफी के बिना आँख नहीं खुलती थी, अब 6 बजे नींद खुद टूट जाती। कुर्सी पर 8 घंटे बैठने के बाद जो पीठ में दर्द होता था, वो 70% कम हो गया। भुजंगासन और मर्कटासन ने रीढ़ की अकड़न खोल दी।
सबसे बड़ा फर्क पाचन में आया। रात को हैवी खाने के बाद वज्रासन में 5 मिनट बैठता। गैस, एसिडिटी गायब। वजन 4 किलो कम हुआ बिना डाइटिंग के। बस शरीर हिलने लगा था।
तीसरा महीना: मन पर काबू
आसन से आगे बढ़कर मैंने अनुलोम-विलोम शुरू किया। शुरू में 2 मिनट में मन भटक जाता था। पर धीरे-धीरे 10 मिनट बैठने लगा।
रात को नींद न आने की बीमारी थी। डॉक्टर ने नींद की गोली दी थी। योग शुरू करने के 2 महीने बाद मैंने योग निद्रा ट्राई की। यूट्यूब पर 20 मिनट की योग निद्रा लगाकर लेट जाता। 10 दिन में गोली छूट गई। अब रात 11 बजे बिस्तर पर जाते ही 10 मिनट में नींद आ जाती है।
छठा महीना: सोच बदली, रिश्ते सुधरे
योग सिर्फ शरीर का व्यायाम नहीं है, ये बात अब समझ आई। यम-नियम पढ़े। ‘सत्य’ और ‘अपरिग्रह’ पर काम शुरू किया।
पहले मैं हर चीज़ में परफेक्ट चाहता था। बेवजह किसी पर भी चिल्लाता था। योग ने सिखाया कि ‘संतोष’ क्या होता है। अब कोशिश पूरी करता हूँ, रिजल्ट की टेंशन छोड़ देता हूँ। गीता का ‘कर्म करो, फल की चिंता मत करो’ प्रैक्टिकल में समझ आया।
घर में सबसे बड़ा बदलाव आया। पहले माँ-पापा से बात करने का टाइम नहीं था। अब उन्हें थोड़ा वक्त दे पता हूँ , साथ में ताड़ासन करता हूँ। पापा के घुटने का दर्द मेरी वजह से उन्होंने भी योग शुरू किया। अब हम बाप-बेटे साथ में सूर्य नमस्कार करते हैं। माँ कहती है, “मेरा बेटा मुझे वापस मिल गया”।*एक साल बाद: मैं नया इंसान बना।
आज योग मेरी ज़िंदगी का हिस्सा है, मजबूरी नहीं। सुबह 30 मिनट – 12 सूर्य नमस्कार, 10 मिनट प्राणायाम, 5 मिनट ध्यान।
शारीरिक परिवर्तन:
- बीमारी से आज़ादी: BP अब 120/80 रहता है। बिना दवाई। सालों से सर्दी-जुकाम नहीं हुआ। इम्यूनिटी इतनी बढ़ गई है।
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एनर्जी: पहले शाम 6 बजे बैटरी डाउन हो जाती थी। अब रात 10 बजे तक फ्रेश रहता हूँ।
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पॉश्चर: कंधे झुके रहते थे लैपटॉप के सामने। अब रीढ़ सीधी रहती है। लोग कहते हैं लंबा लगने लगा है।
मानसिक परिवर्तन:
- फोकस: ध्यान की वजह से काम 2 घंटे में होता है जो पहले 4 घंटे में होता था। मोबाइल के नोटिफिकेशन अब डिस्टर्ब नहीं करते।
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गुस्सा कंट्रोल: आखिरी बार कब चिल्लाया था, याद नहीं। दोस्त कहते है कि ये शांत कैसे रह लेता है प्रेशर में।
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नींद: 6-7 घंटे की गहरी नींद। सपने भी अच्छे आते हैं। सुबह बिना अलार्म उठ जाता हूँ।
भावनात्मक परिवर्तन:
- खुश रहना सीखा: पहले खुशी का मतलब क्या था पता नहीं,अब धूप में बैठकर चाय पीना भी खुशी देता है। संतोष आ गया है।
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डर कम हुआ: फ्यूचर की टेंशन, bpsc tre 2 का rusult की सफलता ने सब ख़त्म कर दिया। प्राणायाम के बाद लगता है ‘सब ठीक होगा’।
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कृतज्ञता: रात को सोने से पहले 3 चीज़ें सोचता हूँ जिनके लिए थैंकफुल हूँ। ज़िंदगी हल्की लगती है।
आध्यात्मिक झलक
मैं कोई संत नहीं बना। पर कभी-कभी ध्यान में 2 मिनट के लिए ऐसा लगता है जैसे दिमाग बिल्कुल खाली हो गया। कोई टेंशन नहीं, कोई लिस्ट नहीं। बस शांति। पतंजलि ने उसे ‘चित्त वृत्ति निरोध’ कहा है। शायद उसकी पहली झलक मिली है। समझ आया कि हम शरीर नहीं हैं, शरीर के अंदर रहने वाले हैं।
आज मैं क्या करता हूँ कुछ भी हो जाये मैं रोज 45 मिनट काम से काम योगा को देता हूँ।
माँ से मज़ाक में कहा था “ये बूढ़ों का काम है”। आज लगता है ये बुद्धिमानों का काम है। हमारे पूर्वजों ने 5000 साल पहले जो खोजा, वो आज गूगल और AI के जमाने में भी उतना ही काम का है।
अंत में
योग ने मुझे नई बॉडी नहीं दी, नई नज़र दी है ज़िंदगी को देखने की। पहले मैं ज़िंदगी से लड़ रहा था, अब ज़िंदगी के साथ बह रहा हूँ।
अगर आप भी मशीन बन गए हैं, तो 10 मिनट निकालिए। चटाई बिछाइए। आँख बंद करके साँस लीजिए। शायद आपकी ज़िंदगी भी बदल जाए। मेरी तो बदल गई।
जैसा मेरे गुरु कहते हैं: “योग अगेन नहीं है, योग अवेकनिंग है”। मैं जाग गया हूँ। आप कब जाग रहे हैं?
आपका शिक्षक मित्र
निखिल नवेंन्दु
R.N HIGH SCHOOL CUM INTER COLLEGE
PARSAGARH EKMA SARAN