आँचल-विजय सिंह नीलकण्ठ - गद्य गुँजन

आँचल-विजय सिंह नीलकण्ठ

आँचल

          आँचल शब्द को देखते या सुनते ही सबों को अपनी माँ के आँचल की याद आ जाती है जो हर दुःख-दर्द में कवच का काम करती है। जब बच्चे छोटे होते हैं तो उनकी हर प्रकार की सुरक्षा माँ के आँचल के नीचे ही होती है। कितना भी गहरा चोट क्यों न हो यदि माता का आँचल सिर पर पड़ गया तो चोट तुरंत रफूचक्कर हो जाता है। इस आँचल में ऐसा वात्सल्य छुपा रहता है जो कहीं और नहीं मिलता। इसकी तुलना किसी से करना अतिशयोक्ति होगी। यहाँ आँचल नामक एक ऐसी लड़की की कहानी है जो माता का आँचल बनकर दूसरों का सहारा बनी।
          वर्षा ऋतु का समय था। पिछले दो-तीन घंटे से घनघोर बारिश हो रही थी। दोपहर में शुरू हुई बारिश शाम के चार बजने तक लगातार पड़ रही थी। इधर आँचल नाम की दस-बारह वर्ष की लड़की अपने पिता के साथ खेत में बनी झोपड़ी में वर्षा छूटने की प्रतीक्षा कर रही थी लेकिन जब दोनों पिता-पुत्री को अहसास हुआ कि शायद बारिश नहीं छूटेगी तो फिर भींगते हुए ही घर चलने की बात हुई और दोनों भींगते हुए घर की ओर चल पड़े। पिताजी आगे-आगे और आँचल पीछे-पीछे तेजी से घर की ओर बढ़ रहे थे। गाँव के बाहर सड़क के पुल के पास जब आँचल पहुँची तो किसी बच्चे के रोने की आवाज पर वह पुल से नीचे झाँकने लगी। उसने देखा कि एक नवजात पुल के नीचे रो रहा है। उसे उस पर दया आ गई और उसे अपनी गोद में लेकर घर पहुँच गई। पिताजी पहले पहुँच गए थे। आँचल की गोद में एक नवजात को देखकर पिता अचंभित थे कि यह इसे कहाँ मिल गई। यह तो पीछे- पीछे हीं आ रही थी। फिर आँचल ने सारी बातें बताई। नवजात एक लड़की थी जो देखने में काफी सुंदर थी। आँचल ने उसका नाम कुन्नी रख दिया और अपनी पुत्री की तरह पालन पोषण करने लगी। जहाँ भी जाती हमेशा उसे साथ ले जाती। पास-पड़ोस की महिलाएँ उसे चिढ़ाने के लिए देखते ही कुन्नी की मम्मी कहकर पुकारती लेकिन आँचल को किसी बात की परवाह नहीं थी। वह विद्यालय भी जाती तो अपनी कुन्नी को साथ ले जाती। चुुँकि पढ़ने में काफी ध्यान देती थी और विद्यालय के शिक्षक/शिक्षिकाओं को यह भी पता था कि आँचल की मम्मी बचपन मेें हीं मर चुकी है इसलिए विद्यालय के भी शिक्षक/शिक्षिकाएं कुन्नी को लाने से मना नहीं करते। जब तक उसने मैट्रिक की परीक्षा दी तब तक कुन्नी छः वर्ष की हो गई। फिर कुन्नी का भी नामांकन पहली कक्षा में करा दिया गया। चँकि कुन्नी पहले से ही विद्यालय आती थी इसलिए आँचल उसे छोड़कर चली भी जाती तो वह मजे से विद्यालय में पढ़ाई करती।
          इधर मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद आँचल गाँव के पास के शहर में ही एक कॉलेज में दाखिला ले लिया और साइकिल से ही कॉलेज आने-जाने लगी लेकिन कुन्नी के विद्यालय आने से पहले वह वापस अवश्य आ जाती। बी.ए. पूरा करने के बाद आँचल के पिता ने उसकी शादी लगा दी। जब यह बात आँचल को पता चला तो उसने यह कहकर विवाह करने से मना कर दिया कि जब तक कुन्नी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती तब तक मैं विवाह नहीं करूंगी। पिताजी भी आँचल के जिद के सामने चुप हो गए क्योंकि आँचल की खुशी ही उनके लिए सबसे बड़ी खुशी थी। फिर धीरे-धीरे कुन्नी ने भी मेट्रिक पास कर ली और अब वह भी कॉलेज जाने लगी। अपनी पुत्री की देखभाल करने के कारण आँचल ने स्वयं की नौकरी की बात भी मन में कभी आने ही नहीं दी।
          जैसे ही कुन्नी का स्नातक पूरा हुआ वैसे ही आँचल उसे विभिन्न प्रकार के नौकरियों के लिए आवेदन करने को उत्साहित करने लगी और सहयोग भी। कई परीक्षाएँ देने के बाद कुन्नी का चुनाव बैंक पी.ओ. के पद पर हो गया। यह सुनकर आँचल काफी प्रसन्न थी और यह सोचकर खुश रहती थी कि चलो मेरा जीवन धन्य हो गया। अब कुन्नी की शादी के लिए सगे संबंधियों में पढ़े-लिखे लड़कों की तलाश शुरू की। कुछ दिन के बाद किसी संबंधी से पता चला कि पास के गाँव में बैंक में पी.ओ. के पद पर कार्य कर रहे लड़के की शादी उसके माता-पिता करना चाहते हैं। आँचल अपने पिता के साथ तुरंत उस लड़के के घर पर गई और अपनी पुत्री के विवाह की बात रखी। लड़के वाले भी कुन्नी के बारे में सुनकर तुरंत तैयार हो गए और एक शुभ दिन देखकर दोनों का विवाह करा दिया गया।
          एक दिन एकाएक कुन्नी ने आँचल से अपने पिता के बारे में पूछ लिया क्योंकि अब वह बड़ी हो चुकी थी और शादी के बाद कुन्नी के पति ने उसके पिता के बारे में पूछने के लिए अपनी माँ से कहा था। आँचल कुछ देर चुप रही फिर सारी घटना अपनी बेटी को बता दी। सुनते ही कुन्नी अपनी देवी समान माता के आँचल में मुँह छुपाकर फूट-फूट कर रोने लगी कि किस तरह दूसरे की बच्ची के पालन-पोषण के लिए आँचल ने अपनी सारी सुख-सुविधाओं का त्याग कर दी थी। धन्य है ऐसी स्त्री जिनके अंदर हमेशा आँचल जैसी भावना भरी रहती है। कई वर्ष तक साथ रहने के बाद आँचल बीमार पड़ गई लेकिन उसके मरने से पहले कुन्नी ने “आँचल अनाथालय” बनवाकर अपनी माँ के हाथों से ही उसका उद्घाटन भी करवाया जिसे देखकर आँचल काफी खुश रहती। ऐसी त्याग की भावना केवल बेटियों में ही हो सकती है। हर बेटी में आँचल जैसे भाव हमेशा भरे होते हैं।
विजय सिंह “नीलकण्ठ”
सदस्य टीओबी टीम 
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8 thoughts on “आँचल-विजय सिंह नीलकण्ठ

  1. बहुत अच्छी कहानी सर।
    भगवान करे सभी को अपनी माँ का आँचल नसीब हो। 🙏🙏🙏

  2. बहुत ही बेहतरीन रचना सर….बेहद उम्दा👌👌👌👌

  3. बहुत ही उम्दा सृजन आदरणीय। हर बेटी में आँचल जैसे भाव भरे होते हैं। बहुत ही सुन्दर पंक्ति है।

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