गुरुगोविन्द सिंह एक अलौकिक व्यक्तित्व-हर्ष नारायण दास - गद्य गुँजन

गुरुगोविन्द सिंह एक अलौकिक व्यक्तित्व-हर्ष नारायण दास

Harshnarayan

गुरुगोविन्द सिंह एक अलौकिक व्यक्तित्व

          सिक्खों के दसवें और अन्तिम आध्यात्मिक प्रमुख या धर्मगुरु गुरु गोविन्द सिंह की गणना उन महान विभूतियों में की जाती है जिन्होंने अपने अलौकिक चरित्र के कारण अमरत्व को प्राप्त किया।उन्होंने आत्मा के विवेक को जीवन का मार्गदर्शक सिद्धांत माना और सिक्खों के शारीरिक और मानसिक उत्थान के उद्देश्य से खालसा पंथ का निर्माण किया। उन्होंने जाति-पाति, धर्म और सामाजिक ऊँच-नीच के भेद-भाव को मिटाकर हर मनुष्य को समान बताया। गुरु साहब न सिर्फ एक आध्यात्मिक नेता या धर्म गुरु थे वरण उच्च कोटि के विचारक, चिन्तक, कुशल सेनानायक और मानव मात्र के कल्याण के लिए सतत प्रयत्नशील सामाजिक द्रष्टा भी थे।

प्रतिभा सम्पन्न गुरु साहब सिक्खों के नवें गुरु तेगबहादुर के इकलौते सन्तान थे। उनका जन्म 22 दिसम्बर 1666 में पटना में हुआ। बहुत थोड़े समय तक ही वह यहाँ रहे और जल्द ही अपने पिता के पास आनंदपुर चले गये। उनके बचपन का नाम गोविंद राय था। गुरु साहब बचपन से ही अपने पिता के समान चिन्तन किया करते थे। उन्होंने संस्कृत, हिन्दी, पंजाबी, उर्दू और फ़ारसी भाषाओं का बड़े चाव से अध्ययन किया। उन्होंने अनेक धार्मिक और नीति संबंधी ग्रंथों की रचना की। उनके “गोविन्द रामायण” में रामकथा का सुन्दर वर्णन है। धनुर्विद्या, शिकार और शारीरिक व्यायाम में उन्हें विशेष दिलचस्पी थी।गुरु गोविंद साहेब नौ साल के अल्पायु में ही पितृहीन हो गये। गुरु तेगबहादुर को मुगल शासक से टक्कर लेने के जुर्म में फाँसी दे दी गई। गुरु तेगबहादुर ने हँसते-हँसते प्राण त्याग दिये किन्तु इस्लाम धर्म नहीं स्वीकार। लोगों से भरी दिल्ली में गुरु तेगबहादुर का शव कुछ दिनों तक यूँ ही पड़ा रहा किन्तु मुगल बादशाह के डर से कोई भी उसे उठाने नहीं आया। उस समय गुरु साहब आनन्दपुर में थे। बाद में जब उन्हें इस घटना का पता चला तो वह अत्यन्त विचलित हुए। पिता के शहीद होने के पश्चात गुरु गोविन्द सिंह ने सिक्ख धर्म के स्वरूप में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने की ठानी।

गुरु गोविन्द सिंह की उपलब्धि सिर्फ सिक्ख सम्प्रदाय को संगठित करने की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, उन्होंने एक राष्ट्र की सोयी हुई चेतना और क्षमता को जगाया और भारतवासियों को राष्ट्रीयता के आदर्श का बोध कराया। गुरु साहब ने लोगों के समक्ष यह आदर्श प्रस्तुत किया कि ईश्वर के प्रति पूर्ण निष्ठा भाव रखते हुए सांसारिक कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। उन्होंने राष्ट्र की एकता के लिए सामाजिक एकता और धार्मिक अनुशासन पर बल दिया और धर्म की रक्षा के लिए सिक्खों को सर्वस्व बलिदान करने के लिए प्रेरित किया। अर्थात गुरु गोविन्द सिंह ने राष्ट्रीयता को ही उनका धर्म बनाने की चेष्टा की। इसलिए उन्होंने समाज में जाति-पाति और धर्म के भेद-भाव को दूर करने के उद्देश्य से 1699 में वैशाख के प्रथम दिन सोच विचार कर एक नई व्यवस्था स्थापित करने का संकल्प लिया, जिसका एकमात्र आदर्श था धर्म के लिए बलिदान। इसका उद्देश्य लोगों में आत्मबल, आत्म गौरव और आत्म बलिदान का भाव भरना था। साथ ही धर्म के रक्षार्थ एक ऐसे दल का निर्माण करना था जो सुगठित दृढ़-संकल्प और त्याग की भावना से ओत प्रोत हो और जिसमें राष्ट्रीयता एवं आध्यात्मिक आस्था की भावना भरी हो। इसलिए गुरु ने यह संकल्प लिया कि वे लोगों में ऐसी प्रबल शक्ति का संचार करेंगे जिसमें वे किसी प्रकार की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक गुलामी नहीं स्वीकार करेंगे।इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए वे शस्त्रों के भी इस्तेमाल से नहीं हिचकेंगे। गुरु ने अपने आदर्श समाज की स्थापना में शस्त्र के उपयोग के महत्व को समझा ताकि कोई किसी का हक न छीने और सबको अपने जीवन का मार्ग चुनने की स्वतन्त्रता मिले। गुरु साहब ने अपने विचारों में व्यक्ति की आजादी और सामाजिक समानता पर बहुत बल दिया।

गुरु साहब ने अपने पाँच शिष्यों के साथ इस व्यवस्था की शुरुआत की और इसे खालसा अर्थात “पवित्र” कहकर इसका सम्मान किया। रोचक बात यह है कि उनके ये पाँच प्यारे शिष्य अर्थात “पाँच प्यारे” जाति के अछूत थे। “खालसा पंथ” के स्थापना की कथा बड़ी रोचक है–वैशाखी के शुभ दिन आनन्द पुर में गुरु के दर्शन के लिए इकट्ठे विशाल जन समूह के समक्ष जब गुरु ने धर्म के लिए बलिदान होने के लिए सिक्खों का आह्वान किया तो सभा में सन्नाटा छा गया। गुरु ने सिक्खों से अपनी गर्दन भेंट करने को कही। मौत के ख़ौफ़ से मुक्त होकर क्रमशः पाँच शिष्य दयाराम, धरमदास, मोखमचंद, साहब चंद और हिम्मत आगे आये। सिर कटाने को तैयार इन पाँच शिष्यों के साथ गुरु साहब ने “अमृत पान” करके इस “खालसा पंथ” की शुरुआत की। गुरु ने खालसा पंथ का अनुसरण करने वालों को कहा कि इसमें न कोई बड़ा होगा, न कोई छोटा, इसमें सभी बराबर तथा एक परमात्मा में विश्वास करने वाले शामिल होंगे। अंधविश्वास का विरोध किया। किसी प्रकार के कठोर जीवन की आवश्यकता नहीं। पवित्र गृहस्थ जीवन पर बल दिया, पर धर्म के नाम पर बलिदान होने के लिए सदैव तत्पर रहना होगा। गुरु ने स्वयं आजीवन गृहस्थ जीवन बिताया। उनकी तीन पत्नियाँ और चार पुत्र थे। गुरु साहब के चारों पुत्रों की मृत्यु उनके जीवन काल में ही हो गयी।।खालसा पंथ में स्त्रियों को सब प्रकार से पुरुषों के बराबर का दर्जा दिया गया। खालसा पंथ में गुरु के समक्ष समर्पण की शपथ के रूप में पाँच “क” कार को धारण करना अर्थात केश, कंघी, कच्छा, कृपाण और कड़ा जरूरी है। खालसा पंथ में गरीबों की सेवा पर विशेष बल दिया गया है। उन्होंने अपने अनुयायियों से एक दूसरे की सहायता करने, अपने आय का दसवाँ भाग गुरु को भेंट करने और सारी मानव जाति को एक समझने को कहा।

गुरु गोविंन्द सिंह ने अत्याचारियों से मुकाबला करने के लिए आध्यात्मिक शक्ति और शारीरिक बल दोनों को जरूरी बताया। उन्होंने सम्पूर्ण सिक्ख समुदाय का मानसिक और शारीरिक उत्थान कर उनमें चेतना की एक नयी लहर दौड़ा दी। उन्होंने मुगल सत्ता के ख़ौफ़ से आक्रांत जन-समुदाय में नयी शक्ति का संचार किया। मुगल बादशाह की शक्ति का इन्द्र जाल तोड़ दिया। गुरु साहब ने समस्त वैभव के बीच एक सच्चे संत और साधक का जीवन बिताया और तमाम उम्र एक योद्धा के भाँति अत्याचारियों से मुकाबला कर धर्म की रक्षा की अनेक लड़ाइयाँ लड़ी और जीती पर इंच भर भूमि पर कब्जा नहीं जमाया। उन्होंने सम्मानपूर्वक जीवन जीने का पाठ पढ़ाया। उन्होंने लोगों के समक्ष जुर्म और अत्याचार का डटकर मुकाबला करने का उदाहरण रखा और धर्म के रक्षार्थ मर मिटने का आदर्श रखा। उन्होंने सामाजिक भेद-भाव मिटाकर नीच से नीच को भी सबसे उच्च कहलाने वाले के समकक्ष बनाया। उन्होंने एक धार्मिक अनुशासन की स्थापना की जिससे समाज और राष्ट्र अनुशासित हो सके। उन्होंने समाज को शक्तिशाली बनाने के लिए पुरुष को कर्मशील होने पर बल दिया। गुरु साहब ने समाज के उत्थान के लिए नारी के सम्मान पर बल दिया साथ ही कहा कि जो अपनी कन्या की हत्या करेगा खालसा पंथ उससे कोई सम्बन्ध नहीं रखेगा।

अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए उन्हें तमाम उम्र संघर्ष करनी पड़ी। किन्तु घोर संकट की घड़ियों में भी वे अपने कर्तव्य पथ से विचलित नहीं हुए और ईश्वर की इच्छा समझकर हर कार्य समर्पण की भाव से किया। तमाम उम्र मुगलों और पहाड़ी शासकों से टक्कर ली। उन्हें अपना घर-वार और सर्वस्व शत्रुओं के हाथ छोड़कर आनन्दपुर निवास छोड़ना पड़ा किन्तु धर्म की रक्षा की। उनका परिवार बिखर गया। विपरीत परिस्थितियों में मुगलों से लड़ते हुए उनके दो प्यारे पुत्र और अन्य साथी मारे गए। उसी समय उन्हें अपने दो अन्य पुत्रों की मृत्यु का भी समाचार मिला किन्तु अत्यन्त धैर्य से उन्होंने यह सब सुना और सहा। जब गुरु साहब की पत्नियाँ सुन्दरी और साहिब कौर ने गुरु साहब से अपने नौजवान बेटों के बारे में पूछा तो अपने अनुयायियों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा-
“इन पुत्रण के शीष पर, वार दिये सुत चार।
चार मुए तो क्या हुआ, जीवित कई हजार।।”

गुरु साहब एक साथ धर्म गुरु, कुशल योद्धा, महान विचारक और विधिकर्त्ता थे।। उनका उद्देश्य महान और सराहनीय था और उसकी पूर्ति के लिए उन्होंने जो साधन अपनाया वह उनके जैसे विलक्षण प्रतिभा के धनी व्यक्ति ही कर सकता है। उन्होंने समाज के सामूहिक विवेक पर ही उनके नेतृत्व का भार छोड़ा।उनसे हमारी जाति को सम्पूर्ण मानव बनने का उपदेश मिला। यद्यपि उन्होंने मुगलों और कई अदूरदर्शी हिन्दूओं से तमाम उम्र धर्म की रक्षा के लिए टक्कर ली परन्तु कभी दूसरे धर्म के अनुयायियों का निरादर नहीं किया और उनके अनुयायियों में हिन्दू और मुसलमान दोनों रहें। उन्होंने मानव की स्वतन्त्रता, व्यक्ति की गरिमा अपने जीवन का मार्ग चुनने की स्वाधीनता पर बल दिया। उन्होंने लोगों में सांसारिक जीवन के प्रति आस्था और आध्यात्मिक शक्ति का संचार किया। गुरु का कहना था कि एक ही मनुष्य में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी के कामों को करने की क्षमता होनी चाहिए। ऐसा मनुष्य ही सम्पूर्ण मनुष्य कहलाने का अधिकारी होगा। जन-सेवा और सबके लिए एक ही रसोई(लंगर) को उन्होंने सिक्ख धर्म का अनिवार्य अंग बनाया जिससे सामाजिक एकता को बल मिले क्योंकि समाज में भेद-भाव होने से राष्ट्र कमजोर होता है। उनका उपदेश था-
मेरा मुझमें कुछ नहीं जो है सो तेरा,
तेरा तुझको सौंप दूँ क्या लागे मेरा?

गुरु गोविन्द सिंह ने अल्प अवधि में ही हिंदु संप्रदाय को शक्ति शाली बना दिया। बयालीस वर्ष की अल्पायु में ही मानव जाति के इतिहास के इस गौरवपूर्ण और अद्भुत चरित्र की इह लीला समाप्त हो गयी। गुरु गोविन्द सिंह ने उत्तराधिकार की परम्परा को समाप्त कर दिया। अपने मृत्यु के समय उन्होंने कहा- मेरे लिए शोक मत करना, जहाँ कहीं भी, आपलोगों में से पाँच भक्त मौजूद होंगे, वही मैं रहूँगा।” गुरु गोविन्द सिंह चाहते थे कि उनके जीवन और आदर्शों का तो अनुसरण किया जाय, लेकिन उसकी पूजा न की जाय। वे व्यक्ति पूजा के प्रबल विरोधी थे। उन्होंने यहाँ तक कहा था कि उनकी पूजा भगवान की तरह करने वाले नर्क भोगेंगे। गुरु गोविन्द सिंह तमाम उम्र पहाड़ी शासकों, मुगल हुक्मरानों और शक्तिशाली संबंधियों के षड्यंत्रों से घिरे रहे किन्तु अदम्य साहस का परिचय देते हुए सदैव धर्म की रक्षा की और अपने अनुनायियों का पथ प्रदर्शन किया। गुरु साहब के विचार आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने राष्ट्र की एकता के लिए सामाजिक एकता एवं लोकतंत्र की भावना का समर्थन किया। इसी कारण खालसा का स्वरूप लोकतंत्रात्मक रखा और शक्तियों का स्रोत जनता को बनाया। उन्होनें मानव हृदय में स्वतन्त्रता और प्रभुत्व की आकांक्षा जगायी और मनुष्य को “सम्पूर्ण मनुष्य” का अर्थ समझाया। उन्होंने एक सोये हुए जन-समुदाय को जाग्रत, प्राणमय और संगठित किया। इस प्रकार जिस समाज का निर्माण हुआ वह एक जाति विशेष का न होकर समस्त जनता का संगठन बना।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि गुरुनानक ने जीवन को एक नयी व्याख्या दी और गुरु गोविन्द सिंह ने मृत्यु को एक नया उद्देश्य प्रदान किया। गुरु गोविन्द सिंह की देन का उल्लेख करते हुए इतिहासकार सैय्यद मुहम्मद लतीफ़ कहते हैं- “मंच पर से बोलते हुए वे विधि कर्त्ता थे, युद्ध क्षेत्र में विजेता थे, मसनद पर बैठते थे तो बादशाह थे और खालसाओं के समाज में सन्त थे। “स्वामी विवेकानन्द का भी यही मत था कि हिन्दू और मुसलमानों को एक झंडे के नीचे इकट्ठा करके उन्हें एक ही ध्येेय की पूर्ति में लगाना भारत के इतिहास में एक अद्वितीय घटना होगी।ऐसे महान सन्त कवि समाज सुधारक धर्म गुरु को कोटिशः नमन।

हर्ष नारायण दास
मध्य विद्यालय घीवहा
फारबिसगंज (अररिया)

नोट- उपरोक्त विचार लेखक के स्वयं के हैं। 

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