गद्य गुँजन आलेख मकान नं -31 : अरविंद

मकान नं -31 : अरविंद



कुछ दिन पहले जनगणना करते -करते हम एक ऋषिदेव टोला पहुंचे। टोले के बीचों – बीच एक टूटी -फुटी सड़क थी । जिसपर बरसाती पानी जमा था। उस पानी के ऊपर मच्छरों की एक बहुत बड़ी जमात पंचायत कर रही थी ।

बगल में बांस बत्ती से घेरा हुआ दीना -भदरी बाबा का गहवर था । गहवर के चबूतरे पर कुछ अर्धनग्न बच्चें गहरी नींद में सोये हुए थे । उसके खुले मुंह पर मक्खियां भिनभिना रही थी ।

वही बग़ल में मैले-कुचैले साड़ी में लिपटी कुछ महिलाएं ,आपस में एक दूसरे के बेजान – रुखरे बालों से ढील निकाल रही थी । माल -मवेशी आंख बंद कर पाज कर रहे थे।

सामने एक बुज़ुर्ग आदमी की टूटी फूटी झोपड़ी थी । जो मिट्टी से घेरा हुआ था। उसके अंदर एक मचान था। जिसपर वे लेटे हुए थे। नीचे बैठा एक कुत्ता जीभ निकाल कर ऐसे हांफ रहा था , मानो ओलंपिक से दौड़ लगाकर आया हो। मुझे देखते ही कुत्ता भौंकने लगा ,
भू.भू.भू.भू.भू । कुत्ते की आवाज सूनकर बाबा उठ बैठे। सामने मुझे अजनबी के रूप में देखकर उसने कुत्ते को डांट पिलाई- तो कुत्ता तत्काल शांत हो गया।

रोज की तरह हमने उससे पूछा — क्या नाम है आपका बाबा —

-फागू ऋषिदेव

-औ

-आपके परिवार में कितने लोग हैं।

-दो लोग

-एक मैं और एक ये मेरा कुत्ता मोती । बाबा फीकी मुस्कान बिखेरते हुए बोले ।

–वैसे मैं तो अकेला ही हूं, मोती मेरे साथ रहता है ,बहुत बफादार है । दिन भर कही रहे मगर रात में मेरे साथ ही सोता है । छोटे में लाए थे इसको रामपुर से,तबसे मेरे साथ ही रहता है इ मोतीया । कुत्ते की पीठ पर हाथ फेरते हुए फागू ऋषिदेव बोला।

— पत्नी चल बसी, बेटे -बहू , पोता -पोती सभी वक्त के बेपरवाह पंछी की तरह इस घोंसले से उड़ गए। जबतक मेरी हड्डी में ताक़त थी । मैं रिक्शा चलाकर, मज़दूरी कर उन लोगों का पेट भरा । मगर अब उन लोगों को मेरी कोई जरूरत नहीं है। फागू का चेहरा और उनकी आंखें आपस में मेल नहीं खा रही थी । उनकी बोझिल आंखों में एक प्रकार की कशिश थी ।

उनकी बातों ने मुझे थोड़ी देर के लिए बिल्कुल शांत कर दिया।

-अच्छा बाबा आपका खाना -पीना कैसे बनता है। ?

-मोबाइल में खाना बनाने वाली बात भी लिखी है बेटा। बाबा ने हंसते हुए पुछा ।

-हां बाबा।

-तो लिख लीजिए खाना नहीं बनाते हैं ।

-क्या?

-तो फिर??

अरे, यही आस-पास में मांग-चांग कर खा लेते हैं ।

मैं स्तब्ध था।

सोच रहा था, ज़िन्दगी के कई रंग हैं। जो जनगणना मकान में ख़ामोश है । खुदगर्जी दीमक की तरह रिश्तों की डोर को कमजोर कर रही है। अकेलापन बुजुर्गों के लिए अभिशाप बनता जा रहा है। रिश्ते ज़िन्दगी को आसान बनाते हैं। मगर टूटते रिश्ते जीवन को अकेलेपन की खाई में धकेल रहा है।

अरविंद

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