प्रसन्नता का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। प्रसन्न मन में उमंग, उल्लास, उत्साह सदैव भरा होता है।
… शुभ, श्रेष्ठ व अर्थपूर्ण कार्यों, शुभ व श्रेष्ठ चिंतन में अनुरक्त एवं व्यस्त मन सदैव प्रसन्न रहता है।
…. प्रसन्नता का उपाय है- अन्तर्मुखी रूप में वर्तमान में जीएं, सहज भाव में रहें, समय के प्रवाह पर चिंतन, भावी कल का थोड़ा बहुत चिंतन आदि, साथ ही बहिर्मुखी रूप में सभी से बातचीत, हंसी-मजाक, कार्यक्रमों, सेमिनार आदि में भाग लेना आदि ।
…. प्रसन्नता पर संस्कृत के कुछ श्लोक अधोलिखित हैं।-
मा भज दैन्यं मा भज शोकम्।
मुदितमना भव मोदय लोकम् ।।…. संस्कृत का एक सुभाषित
(दीनता को मत ग्रहण करो, शोक-दु:ख को मत अपनाओ। मन में मुदिता को, प्रसन्नता को धारण करो तथा दूसरों को भी प्रसन्नता बांटो ।)
वदनं प्रसादसदनं सदयं हृदयं सुधामुचो वाचः।
करणं परोपकरणं येषां केषां न ते वन्द्याः॥(एक सुभाषित)
अर्थात् सदैव प्रसन्न-वदन (हँसमुख), हृदय में दया की भावना रखने वाले, अमृत के समान मीठे वचन बोलने वाले तथा परोपकार में लिप्त रहने वाले व्यक्ति भला किसके लिए वन्दनीय नहीं होगा?
प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशुबुद्धिपर्यवतिष्ठते ।।(श्रीमद्भगवद्गीता, २/६५)
अर्थात् मन की प्रसन्नता प्राप्त होने पर सारे दुखों का नाश हो जाता है। प्रसन्नचित्त व्यक्ति की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।
मन: प्रसाद सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रह: ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ।।(श्रीमद्भगवद्गीता, १७/१६)
अर्थात् मन की प्रसन्नता, विनम्रता, मौन, आत्म-नियंत्रण, विचारों/भावों की शुद्धता ये सब मानसिक तप कहलाते हैं।
….. अंग्रेजी का एक कहावत है, Don’t worry, Be happy.
….. जीवन-दर्शन है, “मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह अपने जीवन के सुदीर्घ पथ को देखें और अपनी जीवन-यात्रा पर फोकस करे। साथ ही, उसका जीवन सहज, पवित्र, अर्थपूर्ण और परोपकारमय हो ।”
…. भारतीय दर्शन है, “सदा अपने आप में प्रसन्न रहें, शुभ सोचें, शुभ देखें, शुभ व श्रेष्ठ करें।- तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु(आपका मन शुभ संकल्पों से युक्त हो।)”
….. शोध के अनुसार, सुबह में 30 मिनट टहलना, आसन-प्राणायाम-व्यायाम, साईकिल चला लेने, दिन में कुछ समय अर्थपूर्ण व उद्देश्यपूर्ण शारीरिक कार्य कर लेने, किताबें पढ़ लेने से, लेखन आदि रचनात्मक कार्य कर लेने से, वृक्षारोपण , पुष्प, वृक्षादि को सींचने से भी प्रसन्नता से संबंधित हार्मोन्स मुक्त होते हैं।
….मेरी एक रचित पंक्ति है।-
तू सदा खुशियों के गीत गुनगुनाता जा,
चाहे जो हो, तू हंसता औ’ हंसाता जा,
रब की बहुत बड़ी नेमत है यह जिंदगी,
इसे शुभ और श्रेष्ठ कार्यों में बिताता जा ।
……गिरीन्द्र मोहन झा
+२ भागीरथ उच्च विद्यालय, चैनपुर-पड़री, सहरसा