मातृ दिवस-शफ़क़ फातमा - गद्य गुँजन

मातृ दिवस-शफ़क़ फातमा

मदर्स डे सभी माँओं को समर्पित एक दिवस

          हमारे जीवन में कई ऐसे रिश्ते हैं जिन्हें साल भर के कैलेंडर से एक दिन (दिवस) निकाल कर उन्हें समर्पित करते हैं, उनके सम्मान में कुछ नया करते हैं। जैसे कि – फ्रेंडशिप डे, टीचर्स डे, मदर्स डे, फादर्स डे इत्यादि। ऐसा नहीं है कि इस एक दिन हम उन्हें खूब सारा सम्मान देते हैं और बाकी के दिनों में भूल जाते हैं। लेकिन इस एक दिन को ही हम उनके जीवन के यादगार पल बन देते हैं।

मदर्स डे (मातृ दिवस) एक माँ को सम्मान और आदर देने के लिए प्रत्येक वर्ष एक वार्षिक कार्यक्रम के रूप में मनाया जाता है। विश्व के अलग-अलग देशों में यह विभिन्न तिथियों में मनाया जाता है। भारत मेें प्रत्येक वर्ष यह मई महीने के दूसरे रविवार को मनाया जाता है। सो इस वर्ष 2021 में मदर्स डे मई महीने के दूसरे रविवार यानी कि 9 मई को मनाया जा रहा है। कहते हैं कि मदर्स डे सर्वप्रथम ग्राफ्टन वेस्ट वर्जिनिया देश के एन्ना जार्विस के द्वारा समस्त माताओं तथा मातृत्व को सम्मान देने के लिए आरम्भ किया गया था। तब से यह प्रचलन बन गया और अलग-अलग राष्ट्र अपनी-अपनी घोषित तिथियों पर इसे बड़े स्नेह भाव से मनाते हैं। हम उनके लिए उपहार, शुभकामनाएँ, सुंदर कपड़े, उनके प्रिय स्थान की सैर आदि की व्यवस्था कर उनके लिए इस दिन को और भी यादगार बनाने का प्रयत्न करते हैं। ये बात सत्य है कि यह सब क्रियाएं आधुनिक ज़माने के उत्सव है।

दुनिया में ईश्वर की बनाई सबसे खूबसूरत कोई रचना है, तो वो माँ है। माँ अपने बच्चों के लिए क्या कुछ नही करती। वो हमें जन्म देती है, अपने आँचल के छाओं में दूध पिलाती है, कोई परेशानी हो तो सबसे आगे खड़ा होती है, किसी तरह के जोखिम होने पर वो स्वयं ही रक्षक बन जाती है। माँ का अपने बच्चों के जीवन मे योगदान अतुलनीय होता है। वो कुछ न होते हुए भी हमारे साथ बनी रहती है। वो अपने बच्चों के लिए हर संभव प्रयास करती है मगर बदले में उसे कुछ भी नही चाहिए होता है। इसीलिए तो किसी शायर ने कहा है कि…..
यारों की मोसर्रत मेरी दौलत पे है, लेकीन
एक माँ ही है जो मेरी खुशी देख के ख़ुश है।

माँ को शब्दों में बांध पाना असंभव है। वो ममता की ऐसी सागर है जहाँ भावनाएं हिलोरें लेती रहती हैं। माँ के गोद में ऐसा सुकून मिलता है जो दुनिया के किसी आरामदायक स्थान में नहीं। सचमुच, माँ के पैरों के नीचे ही तो जन्नत (स्वर्ग) है और यह जन्नत हमें जीते जी ही माँ में देखने को मिलती है। हम जब बच्चे होते हैं तो खूब सारे अटखेलियाँ करते हैं, मां- बाप से बड़ी बड़ी ज़िद्द को पूरी करवा लेते है। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं और वयस्क रूप धारण कर लेते हैं तो हमारे अंदर एक ठहराव आ जाता है और ज़िद्द करना कम कर देते हैं या छोड़ देते है परंतु अपनी मां के लिए हम तब भी ‘बच्चों’ के समान ही होते हैं। हमारी भी मां है जो इस बारे में कहती हैं कि, “तुम कितना भी पढ़-लिख कर मास्टर हो जाओ, बूढ़े होने तक तुम मेरी नज़र में बच्चा ही हो”।

हमारी माएँ शिक्षित हों या अशिक्षित, नौकरी पेशे वाली हों या गृहिणी, अपने बच्चों के लिए उनका प्यार कभी कम नहीं होता। वर्तमान समय में बहुत सी स्त्रियां जो माँ भी हैं, नौकरी करती है जिससे कि उनका आर्थिक पक्ष संतुलित रहे। इस परिस्थिति में भी वो बच्चों के प्रति कर्तव्य से पीछे नही हटती हैं। अपने जीवन में ही कुछ कटौती कर लेती हैं मगर बच्चों के लिए सारी सुविधाओं की व्यवस्था करवा कर रखती है। ऐसी माएँ तो दोहरी भूमिका निभाती हैं- घर भी और नौकरी भी। ‘माँ’ शब्द स्वयं में ही प्रशंसनीय है, इसीलिए तो कहते हैं- ‘MOM’ is just a reflection of ‘WOW’

माँ अपनी जिम्मेदारियों से कभी मुँह नही मोड़ती है। तो आइए हम सब यह प्रण लेते हैं कि इस मदर्स डे पर अपनी मां के लिए कोई उत्सव मनाएं या न मनाएं, उनके साथ बैठकर कुछ पल ज़रूर बिताएंगे। उन्हें यह एहसास दिलाएंगे की हमें उनकी हर पल ज़रूरत होती है। मन में यह लालसा लिए हुए कि………..

मेरी ख्वाहिश है कि मैं फिर से फरिश्ता हो जाउँ
माँ से इस तरह लिपट जाउँ की बच्चा हो जाउँ।

शफ़क़ फातमा
प्राथमिक विद्यालय अहमदपुर
रफीगंज, औरंगाबाद

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